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जीवन की थकान ,लम्बी राह

और वो छोटी छोटी सी पगडंडियाँ ,

जो पहले से नहीं बनी थी

मुझे राह दिखने ..

मेरे थके हुए पैरो ने ..

बना ली थी .उस मंजिल

की चाह में जो अंतहीन थी

वो तपती धूप और

पैरो के छाले..

टीस नहीं उठती यह सोचकर ...

हाँ टीस उठती है ,की

वो दरख्त देखता रहा , जड़ वहीँ

और मेहरूम  रहा….. मै भी

उसकी छाव से …..

मुसाफिर हूँ यही सोचकर

रचनाकार -सतीश अग्निहोत्री

 

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Comment by Satish Agnihotri on September 19, 2012 at 10:43pm

सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्.....Er. Ganesh Jee "Bagi"


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 19, 2012 at 3:46pm

//मुझे राह दिखने ..(दिखाने)

मेरे थके हुए पैरो ने ..//

वाह वाह आदरणीय सतीश अग्निहोत्री जी, बहुत ही अच्छी रचना, इस खुबसूरत अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार करें |

Comment by Satish Agnihotri on September 16, 2012 at 5:17pm

Thanks all..... for making it most popular blog post...

Comment by Satish Agnihotri on September 16, 2012 at 2:11pm

धन्यवाद् मुकेश  जी

Comment by Mukesh Sharma on September 16, 2012 at 2:09pm
Very beautiful lines...Satish Ji.
Comment by Satish Agnihotri on September 16, 2012 at 1:00pm

I thank u books online team for the approval and making my lines reachable to all the peoples having same interest....

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