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राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- २

महीनों बाद भोपाल के घर में बैठा एकांतप्रस्थ मेरा मन.....

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शाम इक दुल्हन की तरह सजी संवरी महक रही है. डूबते सूरज की लालिमा के घूंघट ने उसे और भी युवा बना दिया है, पीतवर्णी क्षितिज जैसे उसकी सुडौल बाहें हैं, सारी धरा इस दुल्हन की सौम्य काया, नीड़ों को लौटते पक्षियों का कलरव जैसे दुल्हन के आभूषणों की कर्णप्रिय ध्वनियाँ हैं, कोयल की आवाज़, जैसे दुल्हन की पाजेब की खनक. अस्तमान सूर्य के अर्धचन्द्राकार वलय से विकीर्ण प्रकाश जैसे इस दुल्हन की मंद स्मितियाँ हैं जिनके आस्वाद से धरा धन्य हो रही है.

आसमान में छाते मेघ इस दुल्हन का नैसर्गिक आतंरिक उद्रेक हैं जो प्रियतम के मिलन को आतुर है. लो अब बयार के मंद मंद कदमों से दुल्हन चल पड़ी है- लजाती, बलखाती प्रियतम के घर; झम झम करके शुरू हो चुकी वर्षा की झडियाँ मानो उसके आह्लाद की अभिव्यक्ति है जो संभाले नहीं संभलता !

महीनों बाद भोपाल के घर में बैठा एकांतप्रस्थ मेरा मन कल्पानाओं की वीथिका में बहुत दूर निकल पड़ा है.

© राज़ नवादवी

भोपाल, संध्याकाल ०४.५५, १६/०६/२०१२

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Comment by राज़ नवादवी on June 27, 2012 at 9:12am

बहुत बहुत धन्यवाद आपका! - राज़ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 27, 2012 at 9:10am

दुल्हन के बिम्ब से सच में भोपाल की शाम कुछ खास हो गई प्रकृति सजीव हो उठी ...बहुत सुन्दर 

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