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लेखक की नई पुस्तक प्रकाशित हुई. कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए कि लेखक व प्रकाशक में युद्ध आरंभ हो गया. कई दिनों तक आरोप–प्रत्यारोप का दौर चला. इस घटनाक्रम से लेखन संसार दुखी हो गया. लेखन जगत ने लेखक व प्रकाशक से इस विवाद को आपस में सुलझा लेने का आग्रह किया. आखिरकार लेखक व प्रकाशक एक निश्चित स्थान पर मिले. दोनों एक-दूसरे के गले मिलकर रोते हुए बोले, “इतना विवाद हुआ फिर भी पुस्तक हिट न हो पाई.”

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Comment by SUMIT PRATAP SINGH on June 19, 2012 at 12:51pm

प्रदीप कुमार जी, अलबेला जी, उमाशंकर जी व निलांश जी टिप्पणियों के लिए आभार...

Comment by Nilansh on June 16, 2012 at 10:11am

behetrin laghu katha bhai sumit ji

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 15, 2012 at 11:21pm

बहेतरीन लघु व्यंग .....

जब से कम्प्यूटर में इंटरनेट ने प्रवेश किया है

तब से लेखकों का हाल और भी बेहाल हो गया है

बेचारे प्रकाशक भी आज कल शादी का कार्ड  लिफाफे, नोट स्लिप

कोरे कागज बेच रहे हैं -रचना में व्यंग के साथ साथ लेखक एवं प्रकाशक का दर्द भी छिपा है

Comment by Albela Khatri on June 15, 2012 at 10:34pm

ha ha ha ha ha ha .........

fir bhi pustak hit  na ho paai........ha ha ha ha ha

gazab !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 15, 2012 at 4:54pm

आज कल इसी अस्त्र का प्रयोग खूब सूरती से किय जा रहा है. बधाई 

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