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ऐसा लगता है की मेरा यों अब गुजरा जमाना है,
बेगाना रुख किये 'साकी'! यहाँ तेरा मैखाना है.

फकीरों को कहाँ यारो कभी मिलता ठिकाना है,
बना था आशियाना, आज जो बिसरा मैखाना है!

कभी अपना बना ले पर कभी बेदर्द ठुकरा दे,
सयाना जाम साकी! और आवारा मैखाना है.

तेरी हर एक हंसी पर ही चहक कर के मचल जाना.
हमेशा हुस्न-ए-जलवो पर जहाँ हारा मैखाना है.

तेरी तस्वीर के बिन ही मै पीने आज बैठा हूँ,
ख़ुशी या गम हो जुर्माना मुझे मारा मैखाना है.
    
हमेशा ही परोसे जाम हर 'शीशे' में वो भर के, 
सरापा पीने के जज्बातों को प्यारा मैखाना है.

छलावे में कभी इन्सान से पाला नहीं पड़ता,
छिपाया है हकीकत से वो एक तारा मैखाना है.

बुढ़ापे में यही बेटों ने 'बस्तीवी' दिया ताना,
जवानी में लुटाया दोस्तों पे सारा मैखाना है.

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Comment

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Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 21, 2012 at 5:13pm
माननीय अश्विनी जी, नमस्कार. जी आपको ये ग़ज़ल पसंद आई, मुझे बहुत प्रसन्नता हुई. मौजूदा रचना बह्रे हज़ज़ मुसम्मन सालिम पर आधारित है, जिनकी मत्रा कुछ इस तरह है, 1222/1222/1222/1222. इसकी एक बहुत खूबसूरत व्याख्या आपको यहाँ मिल जाएगी: http://openbooksonline.com/group/gazal_ki_bateyn/forum/topics/51702.... आपको बहुत बहुत धन्यवाद, एवं आपका स्वागत है.
Comment by अश्विनी कुमार on March 21, 2012 at 3:01pm

प्रिय स्नेही बंधु ॥ऐसा लगता है की मेरा यों अब गुजरा जमाना है,
बेगाना रुख किये 'साकी'! यहाँ तेरा मैखाना है.

फकीरों को कहाँ यारो कभी मिलता ठिकाना है,
बना था आशियाना, आज जो बिसरा मैखाना है!
                                                          ये दोनों शेर बहुत उम्दा बने हैं ...लेकिन बंधु लय या बहर जो भी कहें मुझे समझ नही आ रहा है पूरी गजल मे ,, गजल  विधा से पूरी तरह अनभिज्ञ हूँ थोड़ा समझाने का कष्ट करें ........सादर आभार   

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 21, 2012 at 1:41pm
वाहिद भाई धन्यवाद.
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 21, 2012 at 11:24am

छलावे में कभी इन्सान से पाला नहीं पड़ता,
छिपाया है हकीकत से वो एक तारा मैखाना है

प्रिय राकेश जी,

गहन भावों को प्रेषित किया आपने| बहुत बढ़िया| बधाई लें!

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