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सुन रहा रात की धमनी शिराओं से

बन गया मुसाफिर इस दुनिया में
सुख दुःख की लाँघ सीमाओं को
सुबह से चलता चलता अब
सुन रहा रात की धमनी शिराओं से

 

कोई पुकारता है दूर चट्टानों से
कोई ढूंढ़ता है मुझे मेरे बहानो से
उन झुरमुटों को साथ ले चला आया
मैं अब किस दिशा को बढ़ चला हूँ
कंधे पर भार लगते नहीं हैं
कोई पूछे सवाल कहारों से
सुबह से चलता चलता अब
सुन रहा रात की धमनी शिराओं से

रोक कर कई पूंछते हैं 
शहर  किधर को जाओगे
नक्शा नहीं रास्तों का फिर
नहर पे किस के नहाओगे
इस कदर तलाश पे उमर गुजरी है
गूंजती है सांसे खरे पहारो से
सुबह से चलता चलता अब
सुन रहा रात की धमनी शिराओं से

 

मिलती जाती खुशियाँ उधार पे
अब कोई इंतेज़ार नहीं कर रहा
लिए मधुमख्खी का छत्ता
मैं मीठे की बाट जोह रहा
सरकें पुराणी हो चली हैं
अब थकती हैं टांगे ठिकानो से
सुबह से चलता चलता अब
सुन रहा रात की धमनी शिराओं से

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