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आँखों में बस के दिल में समां कर चले गए
ख्वाब्दीदा ज़िन्दगी थी जगा कर चले गए




चेहरे तक आस्तीन वह लाकर चले गए
क्या राज़ था की जिसको छुपाकर चले गए




रगरग में इस तरह समां कर चले गए
जैसे मुझ ही को मुझसे चुरा के चले गए




आये थे दिल की प्यास बुझाने के वास्ते
एक आग सी वह और लगाकर चले गए




lab थर थरा के रह गए लेकिन वो ऐ "अलीम "
जाते हुए निगाह मिलाकर चले गए .

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Comment

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Comment by Sanjay Kumar Singh on April 16, 2010 at 8:33am
Realy its great, sabhi seher achey hai,bahut badhiya hai,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on April 14, 2010 at 9:25pm
waah bahut badhiya likhe hain.......pehla blog hi itna badhiya hai to aage to aur bhi badhiya aayega ye aasha hai humlogo ko...........
चेहरे तक आस्तीन वह लाकर चले गए
क्या राज़ था की जिसको छुपाकर चले गए
bahut badhiya hai aisehi likhte rahiye.........

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2010 at 3:00pm
लाजवाब, बेहतरीन और बहुत ही उम्द्दा गज़ल है अलीम जी, आप तो अपने पहले पोस्ट मे ही छा गये, मै तो यही कहूगा की -----

"इक गज़ल लिखा आपने, और सबका दिल चुरा कर चले गये"

आपके अगले ब्लॉग का बेसब्री से इन्तजार रहेगा ,
बहुत बहुत धन्यबाद
Comment by Admin on April 14, 2010 at 2:50pm
अलीम साहब नमस्कार !
सबसे पहले तो मै आपका ओपन बुक्स परिवार मे स्वागत करता हू और आपके पहले ब्लॉग के लिये धन्यबाद देता हू, आपका पोस्ट किया हुआ गज़ल बहुत ही खुबसूरत है, क्या खूब लिखा है आपने
आये थे दिल की प्यास बुझाने के वास्ते,
एक आग सी वह और लगाकर चले गए,

वाह वाह बहुत खूब, बेहतरीन रचना है, आगे और भी पोस्ट का सिद्दत से इन्तजार रहेगा, सुक्रिया ,
आपका
ADMIN
Open Books Online
Comment by BIJAY PATHAK on April 14, 2010 at 1:36pm
Alim ,
Bahut Khub
रगरग में इस तरह समां कर चले गए
जैसे मुझ ही को मुझसे चुरा के चले गए
Aapke sayari ka intezar rahega.

Bijay Pathak

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