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दुख से उबर के ओढ़ेगी मुस्कान जिन्दगी -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२
*
बोलो न आप हो गयी  शमशान जिन्दगी
दुख से उबर के ओढ़ेगी मुस्कान जिन्दगी।१।
*
करते हो मुझ से प्रश्न तो उत्तर यही मेरा
होती है यार मौत  का  अवसान जिन्दगी।२।
*
कहते हैं सन्त मीन सी दानों को देखकर
माया के जाल फसती है नादान जिन्दगी।३।
*
आचल में मौत सासों  को लेते न चूकती
भटकी कहीं जो भूल से यूँ ध्यान जिन्दगी।४।
*
जैसे  विचार  वैसी  ही  जग  में  बनाती  है
सच है सभी की आज भी पहचान जिन्दगी।५।
*
करता रहा है प्यार बहुत उस को वो सदा
चाहे  न  दे  गरीब  को  मुस्कान  जिन्दगी।६।
*
उस को रईस  होने  में  दौलत  न काम दे
रिश्ते भी कर न पाये जो धनवान जिन्दगी।७।
*
बेकार शिक्षा मान  लो  इस से भली अपढ
पढ़ के भी हो न पाये जो गुणवान जिन्दगी।८।
*
गौतम से  बुद्ध  होने  का  पथ  पा  नहीं सकी
कारण से दुख के आज भी अनजान जिन्दगी।९।
*
होता अगर ये सत्य जो मिलती ही क्यों भला
कहते मिलन को ब्रह्म  से  व्यवधान जिन्दगी।१०।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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