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ग़ज़ल: हर इक दिन इन फ़ज़ाओं में नई अल्बम लगाता है

1222 1222 1222 1222

हर इक दिन इन फ़ज़ाओं में नई अल्बम लगाता है

कोई तो है हरी सी घास पर शबनम लगाता है

कहीं सुनता नहीं महफ़िल में भी अब दर्द ए दिल कोई

किसे आवाज वीराने में तू हमदम लगाता है

अज़ब है वाक़िया या रब अज़ब साकी मिला दिल को

नमक ज़ख़्मों पे दिल के किस क़दर पैहम लगाता है

धुआँ होकर निकलती हैं ये साँसें दिल के अंदर से

किसी की याद में दिल दम व दम फिर दम लगाता है

चला जाता है महफ़िल में हसीनों की सुलगने को

गम ए फ़ुर्क़त में कोई गम नया हरदम लगाता है

ज़मींनें काँप उठती हैं दहाड़ों से नगाड़ों की

कहीं इक मुल्क जब इक मुल्क पर परचम लगाता है

है हिंदुस्तान मेरी जाँ वतन पागल दीवानों का

के अंदाज़ा तू ओ नादाँ अभी कुछ कम लगाता है

कई मुद्दत से दर्द ए दिल लिये बैठा है सीने में

कई मुद्दत से अल्फ़ाज़ों में नई सरगम लगाता है

बड़ी सिद्दत से लिखता है ग़ज़ल शायर "तमाम आज़ी"

बड़ी सिद्दत से दिल के ज़ख़्मों पर मरहम लगाता है

मौलिक व अप्रकाशित

आज़ी तमाम

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