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ग़ज़ल~ "न मर ही पाये कोई"

बह्र ~ "बह्र-ए- वाफिर मुरब्बा सालिम"  

12112 12112 12112 12112

न चैन पाये है की न सुकूँ .....................ही पाये कोई

ऐसे ले के दर्द ए दिल है जिये.................ही जाये कोई

के चोट जो खाये अपनो से ही ...............अगर
तो ले के भी दिल को अपने कहाँ.............ही जाये कोई

अज़ीब है हाल इश्क में भी.....................सनम है न दवा दिल की
कै कै न सहे है क्या ही बता....................ये कोई

बिछड़ के लो एक हंस ने फ़िर................से काट ली है ज़ुबाँ

करे भी तो क्या बुलाने से भी.................जो लौट के ना ही आये कोई

बयाँ ये हो ही जाती है भले ...................ही लाख छुपाये दिल
छुपा तो ले ज़ख़्म दिल के मगर..............तड़प न छुपा ही पाये कोई

भटकते हैं बेगुनाह सफ़र.......................है तंहा तंहा
सज़ा जो की ख़त्म हो ही न और............ न काट ही पाये कोई

किसी से भी इश्क करना न मे................री जान "तमाम" इश्क में
न जी ही तो पा ये है की न मर................ही पा ये कोई............................. 

(मौलिक व अप्रकाशित) 

✍  आज़ी तमाम................... 

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Comment

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Comment by Aazi Tamaam on February 21, 2021 at 12:43pm

सादर प्रणाम आदरणीय गुरु जी

ठीक है गुरु जी बस एक छोटी सी कोशिश करके देखी थी

आपकी सलाह सर आँखों पर

धन्यवाद

Comment by Samar kabeer on February 21, 2021 at 12:02pm

जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, बह्र-ए-वाफ़िर अरबी की बह्र है, इस पर ग़ज़ल कहना बहुत मुश्किल काम है, आप उर्दू बहूर पर ही अभ्यास करें तो बहतर होगा, इस प्रस्तुति पर बधाई ।

Comment by Aazi Tamaam on February 19, 2021 at 7:39pm

हौसला अफ़ज़ाई के लिये दिल से शुक्रिया

सादर प्रणाम जनाब गुमनाम पिथौरा गढ़ी

धन्यवाद

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 19, 2021 at 6:46pm

भावों को ग़ज़ल होने में अभी वक़्त है। .. भाव अच्छे हैं।

कृपया ध्यान दे...

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