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क्या तुम आज स्कूल आओगे?

अब ये नही होगा.......... कल मुझसे मेरे छोटे भाई ने कहा की दीदी अब तुझसे ये कोई नही कभी कहेगा की आज स्कूल क्यो नही आई या क्या तुम आज स्कूल आओगी? बात बिल्कुल साधारण सी थी पर मे सारा दिन सोचती रही की ये बात कितनी सच हे . बचपन के साथ साथ ये सारे पल भी तो बीत गये जब सारी सहेलिया साथ स्कूल जाती और हर दिन एक दूसरे से पूछती थी की क्या कल स्कूल आओगी?

 

हमारी वो दुनिया ही निराली थी. लूका छुपी का खेल खेलने के लिए हर शाम भगवान जी से बोलना की प्लीज़ भगवान जी लाइट चली जाए ताकी मम्मी हमे बाहर खेलने की इजाज़त दे दे क्योकि तब घर पर इनवेर्टर की व्यवस्था नही थी सो मम्मी के पास कोई रास्ता नही होता था. मम्मी के हाथ के आलू के पराठे और नींबू का आचार जो मुझे कभी खाने नही मिलता था सब मेरी सहेलियो के नाम कुर्बान और होस्टल मे मम्मी के हाथ के बेसन के लड्डू मगर यहा भी रूम मेट के साथ शेयर करना मजबूरी थी. स्कूल जाने और आने के समय अगर बारिश हो गई तो १५ मिनट का रास्ता भी १ घंटे मे तय होता था .

 

घंटो सहेलियो के साथ बैठकर गप्पे मारना और भविष्य की योजनाए बनाना. सहेली का जन्मदिन होने पर उससे हलवे का केक कटवाना ( उस समय केक इस तरह आसानी से नही मिल पता था) . मम्मी पापा का प्यार और फटकार . सुबह देर से  उठने  पर पापा का लंबा लेक्चर और उनका समाचार पत्र पढ़ते हुए चश्मे से तिरछी निगाहो से गुस्से से देखना और कुछ देर बाद मुस्कुरा देना. आस पास के कंपनी बाग मे हमारी पिकनिक और वहा जब मेरी सहेली का टिफिन एक कुत्ता खा गया तो हम सब हंस हंस कर ओंदे हो गये थे.

 

एसी कितनी ही मीठी यादे हे जिनका यदि सिलसिले वार ज़िक्र करने लगे तो कभी ख़त्म ही न हो. सच कितनी मधुर यादे हे जो जिंदगी मे जब भी हम हौसला हारे या जीवन से थकने लगे तो हमारा हौसला बढ़ाती हे .

 

यही तो जिंदगी हे खट्टी और मीठी . आज भाई की एक बात ने मुझे मेरे बचपन की सेर करा दी और मन फिर से पहुच गया उसी मासूमियत और भोली नटखट दुनिया मे जहा सब कुछ अच्छा ही अच्छा था बुरा कुछ भी नही .

और मे खुद को तरो ताज़ा महसूस करने लगी तो सोचा क्यो ना आपको भी इसी ताज़गी का अहसास कराया जाए तो जनाब बचपन की दुनिया की खुश्बू ने आपको भी महका ही दिया आख़िर?

   प्रेषक

मोनिका भट्ट (दुबे)

 

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Comment by PRAVIN KUMAR DUBEY on July 11, 2011 at 4:42pm
Thanks Monika Aapka sansmaran bahut sentimental hai.
Comment by Shanno Aggarwal on July 11, 2011 at 2:12am

मोनिका जी, आपने बहुत अच्छा बचपन का संस्मरण लिखा है. 

 

बचपन की यादों से गुदगुदी होने लगती है :))

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