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ग़ज़ल (उठाओ जितनी भी चाहे क़सम ज़माने की)

1212 / 1122 / 1212 / 22

उठाओ जितनी भी चाहे क़सम ज़माने की 

निकल सकेगी न हसरत हमें मिटाने की 

जहाँ ये सारा हमारा वतन रहेगा, सुनो 

हमारे वास्ते गर्दिश है सब ज़माने की 

जिसे भी देखिये पत्थर लिये हुए है वो 

करेगा बात यहाँ कौन दिल मिलाने की

तड़प के ख़ुद ही मेरी राह पर पड़ा है वो 

बना रहा था जो बातें मुझे भुलाने की 

जिसे भी देखिये वो होश-मंद है यारो

सुनेगा कौन यहाँ बात फिर दिवाने की

किया था हमने इसी वास्ते ये दिल पत्थर

करेंगे बात मुसल्सल वो दिल दुखाने की 

खड़ा है सर पे तेरे मौत का फ़रिश्ता यूँ 

तलाश जैसे उसे हो किसी बहाने की

पुरानी यादों के मिटते नहीं दिलों से नुक़ूश

'अमीर' लाख करो कोशिशें मिटाने की

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 2, 2022 at 12:20pm

पुन: आगमन पर आपका धन्यवाद। 

Comment by Mahendra Kumar on October 2, 2022 at 10:06am

कोई बात नहीं। रचना पर अन्तिम निर्णय लेखक का ही होता। एक बार पुनः बधाई। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 2, 2022 at 10:00am

आदरणीय महेंद्र कुमार जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया, जनाब दूसरे शे'र पर मैंने बहुत मश्क़ की है, इस से बहतर हो सकता है ये बात सही है मगर भाव बदल जाएगा, मैं इस शे'र को ऐसे ही रखना चाहता हूँ। 

Comment by Mahendra Kumar on October 2, 2022 at 7:36am

वैसे दूसरा शेर बेहतर हो सकता है।

Comment by Mahendra Kumar on October 2, 2022 at 7:35am

अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. अमीरुद्दीन जी। हार्दिक बधाई प्रेषित है। 

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