For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

वाहन मुख्य सड़क से उस गांव की सड़क पर आ गया, जिसे सर्वेक्षण के लिए चुना गया था।सारे राज में सरकार द्वारा लोगों को प्रदान की जाने वाली सरकारी सेवाओं के बारे में सर्वेक्षण किया जा रहा था।
सर्वेक्षण फॉर्म में प्रश्न थे, क्या आपके गाँव में इस फॉर्म पर लिखी गई सेवाएँ उपलब्ध हैं? क्या ये सभी सेवाएं लोगों को मिलती हैं या नहीं, यदि नहीं मिलती , तो आपको क्या लगता है कि इन के क्या कारण हो सकते हैं ?
मैं आधिकारिक दौरे पर पहली बार इस गांव में आया था l
गांव की बाहरी सड़क से होते हुए,हमारा वाहन एक सरकारी संस्था के सामने रुका, मैं अपनी कार से बाहर आया और टीम के सदस्य दूसरे वाहन से बाहर आए l
संस्था के कर्मचारियों ने भी बाहर आकर हमारा स्वागत किया।
चाहे ये संस्था सरकार द्वारा संचालित की जा रही थी, और ये गाँव के बड़े गुरुद्वारे के दो कमरों में से संचालित हो रहा थीl
टीम के इक मैंबर ने मेरे पास आ कर कहा कि कुछ समय के बाद, टीमें घरों से जानकारी प्राप्त कर लौट आएँगीl
"सर जी, मेरी बुआ जी यहाँ रहती हैं। उनकी बड़ी बैठक मैंने उनसे बता दिया है कि मेरे साहिब और चार पाँच और लोग आ रहे हैं ।"उनके घर बैठने की जगह भी बहुत है l आप वहाँ आराम कर लेना जी l सभी लोग उनके घर पर ही दोपहर का भोजन करेंगे l उस टीम के मैंबर ने इक बार फिर मुझे कहा
वैसे, तो बचपन में कई बार मैं इस गाँव में आया था l
लेकिन इस का अभी तक किसी को पता नहीं चला था, सभी यही सोच रहे थे कि जैसे मैं पहली बार इस गाँव में आया हूँ , और इस के बारे में कुछ भी न जानता हूँ ?
इससे पहले कि मैं कुछ सोच पाता, मैंने जाने को मना कर दिया, फिर सोचा, क्या मुझे अपने इनकार करने का कारण तो बताना चाहिए ?
मगर क्यूँ, मुझे ये बताने की क्या ज़रूरत है, जब मैं साहिब हूँ, तो जो कह दिया तो कह दियाl
मेरी बुआ भी तो इसी गाँव के दूसरे मुहल्ले में है, बचपन मैं कई बार यहाँ आ कर रहा हूँ l
लेकिन मेरी बुआ का घर तो ....... ? ”मैं सोचने लगा।
तब खुद से कहा, "अगर वह इन सबको अपनी बुआ के घर नहीं ले कर जा सकता, तो फिर क्यूँ मैं उनके घर जा कर भोजन करूँ?
मैं अंदर ही अंदर खुद से लड़ रहा था,
मैं उनके घर खाना नहीं खाऊंगा ,ये फैसला मन कर चूका था l अगर मैं खाना खाऊँगा तो अपनी बुआ के घर से l
ये खुद से कहते हुए मैंने सभी को इशारा करते हुए कहा, "तुम खाना खाओ,मैं नहीं........l
"क्या हुआ? मेरी बुआ के घर जाने के लिए अभी तंग गली पक्की नहीं है,घर का यार्ड खुला नहीं है, बिठाने के लिए अच्छी बैठक भी नहीं हैl
हो सकता है, बुआ के पास खाने पिलाने के लिए भी न हों, लेकिन बुआ का घर तो है। मैंने ड्राइवर को कार स्टार्ट करने के लिए कहा और कार बुआ के घर की तरफ़ ली।

.

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 390

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 9:01pm

आदरणीय मोहन जी लघु कथा के हिसाब से विवरण कुछ ज्यादा लग रहा मुझे...रचना शुरुआत में संस्मरण का आभाष देती है...सादर

Comment by Samar kabeer on October 30, 2020 at 2:36pm

जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब, लघुकथा का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
9 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
16 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service