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अशोक कत्याल "अश्क"'s Blog (15)

शादी बनाम बहुमत

हास्य - व्यंग

शादी बनाम बहुमत



एक दिन श्रीमती जी का आसन डोला ,

मेरा छोटा सुपुत्र…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 24, 2013 at 10:00am — 8 Comments

अभिनंदन

प्रिय मित्र के अमेरिका से अपने देश" भारत " आने पर ,

आपका आपके देश भारत में , तहेदिल से स्वागत है .

                         …

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 22, 2013 at 5:00pm — 3 Comments

तू ये ना समझना

तू ये ना समझना , तेरी याद ने रुलाया है ,

तेरी आँख का कोई आँसू है , मेरी आँख से आया है ,



तू ये ना समझना , तेरे खुशबू ने बुलाया है ,

हवा का कोई झोंका है , तेरे ज़िस्म को छू के आया है ,…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 18, 2013 at 11:00pm — 7 Comments

"शुभ प्रभात"

             "शुभ प्रभात"

उदय सूर्य हुआ , नभ मंडल में , सब दुनिया मे उजियारा हो ,

मन भाव  उठे  , संग शब्द सजे , तब मन का दूर अंधियारा हो .



जब गूँज उठे ,  शंख मंदिर मे , आह्लाद सा…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 18, 2013 at 8:00am — 8 Comments

हास्य - व्यंग . " अंगुली पर नचाती थी "

 हास्य - व्यंग

 "अंगुली पर नचाती थी"

मेरे एक दोस्त ने, किस्सा कुछ यूँ सुनाया ,

एक मामले में बीमा अफ़सर ने , घोटाला था पाया |

बात, इस हद तक थी बिगड़ी ,

इसमें लगी, उन्हें साजिश कुछ तगड़ी |

मामला था, कि एक महिला की अंगुली कटी ,

अंगुली थी मानो , हीरे से पटी |

अंगुली का हुआ लाखों भुगतान…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 17, 2013 at 8:00am — 8 Comments

बहन हमारी

छोटी बहन को सहृदय समर्पित ,



हमेशा खुश रहो , इसी कामना के साथ ,

बहन हमारी ,…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 16, 2013 at 7:30am — 13 Comments

मुझे घर ले चलो बापू ,

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी को समर्पित ,

 

ये रचना लगभग २५ बर्ष पूर्व लिखी गयी ,

जो आज भी प्रासंगिक है |…



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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 15, 2013 at 2:00pm — 11 Comments

माँ , याद तुम्हारी

याद तुम्हारी , कितनी प्यारी ,

धीरे-धीरे मन के आँगन में ,

चुपके से आ जाती हे |



याद तुम्हारी , बड़ी दुलारी ,

आँखों  से  , अंतर मन को ,…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 12, 2013 at 6:00pm — 15 Comments

वफ़ा ए इश्क़

वफ़ा ए इश्क़ इस तरह इज़हार करते हैं ,

हम ही से सीख , हम पे वार करते हैं , 

अहमक समझता हे ज़माना , मुस्तकिल तौर पे,

हम उनसे प्यार और वो इनकार करते  हैं ,

कब ज़नाज़ा मेरे अर्मा का दर से उनके निकले,

फक्र हे हर वक़्त यही इंतज़ार करते हैं…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 11, 2013 at 8:00pm — 8 Comments

मैं

मैं कौन हू ,मैं क्या हू ,

नही जानता ,

 मैं खुद ही स्वयं को ,

नहीं पहचानता ,



 मैं स्वप्न हू या कोई हक़ीकत ,

मैं स्वयं हू या कोई वसीयत ,



जैसे किसी कॅन्वस पर उतारा हुआ ,

रंगों की बौछारों से मारा हुआ ,



हर किसी के स्वप्न की तामिर हू मैं ,

हक़ीकत नही निमित तस्वीर…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:58am — 15 Comments

ख्वाब यूँ तूफ़ानी हो गये

ख्वाब यूँ तूफ़ानी हो गए ,

रिश्ते भी जिस्मानी हो गए

,

बदले करवट ज़िंदगी , हर पल हर छिन ,

लक्ष्य भी आसमानी हो गए ,



क्या दिखाएँ जलवा , अपने अश्कों का ,

गम ही किसी की , मेहरबानी हो गए ,



नहीं आता रोना उनके सितम पे ,

फिक्रे वफ़ा , किस्से कहानी हो गए ,



बेहया हो गया ये आँखों का परदा ,

सुना हे जबसे , वे रूमानी हो गए ,



छोड़ दिया मिलना गैरों से हमने ,

बंधन दिलों के ,बेमानी हो गये…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:48am — 6 Comments

आग चिराग ने लगाई....

देखो जबरदस्त होसला अफजाई ,

बैरी बने बादल और आग चिराग ने लगाई ,



करेंगे अपने बूते , खामोशी से संवाद ,

चौंकाना चाहती हे , दिल से , तन्हाई ,



आशा की लौ मे , मेरी वापसी के संकेत ,

दे ही देगी , तेरी चौतरफ़ा रुसवाई ,



कगार पे आ पहुँचा , अब रोमानी पहलू ,

महज संजोग नहीं है , तेरी बेवफ़ाई ,



थाम ली कमान , आख़िरकार मुहानो की हमने ,

फूटते हुए लावो की , अब…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:00am — 2 Comments

दर्द

जिधर भी देखा दर्द ही दर्द मिले ,

अपने साए से हुए , चेहरे सर्द मिले ,



किया बेगाना सरे राह हमको ,

मिले भी तो , ऐसे हमदर्द मिले ,



था ज़माना गुलाबी कभी जिनका ,

वही दर्द ए दिल के मारे , आज जर्द मिले ,



गुमान ना था इस कदर कहर नाज़िल होगा ,

फाक़त खंडहर , वो भी ज़रज़र मिले ,



आज़िज़ हे हम अपने ही लहजे से ,

दुरुस्त जिनको समझा , वोही ख़ुदग़र्ज़ मिले…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:00am — 10 Comments

तुम

चमका जैसे कोई तारा ,

हलचल जैसे दूर किनारा ,

निर्मल शीतल गंगा की धारा ,

व्यग्र व्यथित बादल आवारा , बांधना चाहूं पल दो पल ,

तुम............................

दूर-दूर तक धँसी सघन ,

प्रफ्फुलित मन कंपित सी धड़कन ,

घना कोहरा शुन्य जतन ,

बस समय सहारा टूटे ना भ्रम ,

थामना चाहूं कोई हलचल ,

तुम................................

धूप उतरे कहीं पेड़ों से ,

सुकून जैसे बारिश की रिमझिम…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 9, 2013 at 4:01pm — 3 Comments

आत्म-विश्लेषण

मेरे पास है --



वैचारिक विमर्श के विविध रूप में 

काम आने वाला कबाड़ ,

प्रेम के अप्कर्श का पथ ,

पिछला बाकी सनसनाता डर ,

संजीदा होती साँसें ,

वही पुरानी मजिलें , और 

प्रतिभावान काया,



मुझे --



करनी है, सार्थक पहल , 

नाक की लड़ाई के लिए ,

पूछने है सवाल, चुपके चुपके ,

लयात्मक खुश्बू के लिए ,

करने है खारिज़ व बेदखल ,

व्यवस्था विरोध के स्वर ,

चलना…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 9, 2013 at 7:30am — 7 Comments

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