For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Mohit mishra (mukt)'s Blog (26)

ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,

मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।

मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,

मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।

गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,

मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।

फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,

मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।

भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on June 10, 2018 at 10:16pm — 6 Comments

भला कैसे(अतुकांत):- मोहित मुक्त

दूर क्षितिज में-

तुम्हारे अधर की ज्यों रंगत चुराकर -

प्राची के प्रान्त पर रक्तिम सी आभा,

हो बिखरने को आकुल तभी मीत मेरे,

मुझे चूमकर तुम जगाने लगो ,

कहो कैसे गाऊँ शुभाषित सुबह के !

प्रणय-छंद ना फिर उच्चारा करूं।



शशि मुख पर-

छिटक आये केश-वेणी से खुल-

प्यारे लट को झटककर झुंझलाती तुम,

हस्त-व्यस्त हों कहीं, होके लाचार सी ,

तुम पुकारो मुझे जब बड़े प्यार से ,

मैं भला कैसे उन्माद से छूट कर ,

रुक जाऊं! तुम्हे ना सताया करूं।

ऐ…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on June 1, 2018 at 3:15pm — 8 Comments

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते:-मोहित मुक्त

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

आंखे गातीं अनुराग राग ,

जी से मिट जाता विराग ,

उन्माद भरे किसलय दोनों ,

अधरों पर ढुल-ढुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

अनुकंपित होता प्राण सखी ,

स्पंदन युत निर्वाण सखी ,

विप्लव, विषाद सूनी रातें ,

सब लम्हों में धुल-धुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

मदमाते पुष्प नवीन विशद ,

उमड़ा आता मधुभावित नद ,

पलकों के अज्ञात-ज्ञात ,

अवगुंठन सब खुल-खुल…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on May 12, 2018 at 10:22pm — 4 Comments

वियोग (कविता):- मोहित मुक्त

नीरव निशा, निःशब्द दिशा में ,

तारे-विहीन अंबर के निचे ,

प्रेम-अनल की हिमशिखा से,

जल-जल अपना अंतस सींचे।

मर्म लक्ष्य कर व्यंग विशिख को ,

निष्ठुर ने ब्याल सरीखे छोडे ,

मैं विकल तड़पता रहा अकिंचन ,

सहला-सहला दिल के फोड़े।

दृग में आँसू की माला टूटी ,

बिखरे मुक्ताहल गालों पर ,

ब्यथा-उर्मि करुणा-सिंधु की ,

देती दस्तक उर-छालों पर |

एक शून्य उतर सा आया ,

इस जीवन के आंगन में ,

और पर्व मना है इसका ,

किसी निर्दय…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on May 6, 2018 at 12:32pm — 10 Comments

सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )

लौटे राघव, जनपद भ्रमण कर, हतोत्साहित उदास ,

स्कंध निचे, द्रवित हृदय, उद्वेलित मन, कम्पित श्वास,

चिंतित मन, बार-बार करते हृदय कठोर,

पर कानों में पुनः-पुनः गुञ्जित होता वहीं शोर,

हाय निष्कपट प्रजा यह, पर बुद्धिहीन ,

अंतः विषाद से हो उठा श्याम-मुख-मलिन,

यह कैसा विकट शत्रु बन खड़ा राजधर्म ,

प्रजा बेध रही ब्यंग-विशिख से राम मर्म ,

और राम ! प्रत्युत्तर में विकल, ठगे से मौन ,

सोच रहे मुझसे हतभागा है धरा पर कौन?

हाय माता का ही नहीं…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on April 5, 2018 at 7:00am — 4 Comments

होली और यादें :-मोहित मुक्त

फिर से होली आ गयी है ,

यादें मन में छा गयीं हैं ,

यादों का है क्या ठिकाना ,

इनका तो है आना जाना।

पर वो होली और थी जब ,

घर की घर में साथ थे सब ,

माँ के हाथों की मिठाई ,

मानो अमृत में डुबाई।

पिताजी का प्यार देना,

स्नेह से यूँ निहार देना ,

उनकी आँखों का मैं तारा ,

उनके प्राणों का सहारा।

आज घर से दूर हूँ मैं ,

दूर क्या मजबूर हूँ मैं ,

रंग होली के मुझे अब,

चुभते हैं काँटों से सब।

फिर से…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on March 1, 2018 at 8:34am — 10 Comments

ये मत सोचो रुक जाऊंगा:-मोहित मुक्त

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

बेताब लहर के धक्कों से -

नौका चूर हो जाएगी,

नियति की वक्र नजर मुझपर -

माना की क्रूर हो जाएगी ,

तूफां हठ ठान भले ही ले-

कर ले चाहे लाख जतन ,

जीवन यज्ञ आहुति में -

हो जाये मेरा सर्वस्व हवन,

पर जबतक धड़कन जिन्दा है-

ये मत सोचो झुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

पग-पग पर शूल मिलें चाहे-

राहों में तप्त अंगारे हों।

पावों में छाले पड़ जाएं या-

रोम-रोम प्यास के मारे…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on February 6, 2018 at 3:31pm — 7 Comments

आवाहन(कविता ):-मोहित मुक्त

अंगार भर लो लोचनों में, श्वांस में फुंफकार हो ,

नस-नस अनल से पूर्ण हो , पुरुष्त्व का संचार हो।

विश्वास जन का खोकर भी सत्तासीन हो जाते हैं।

जो हर चुनावी परिवेश में नए प्रपंच रचाते हैं।

वैसे दागी लोग न जाने क्यों हमारे नायक हैं ?

क्या वे लोग ही हमपर शासन करने लायक हैं ?

जैसे मृगेंद्र के पुत्रों पर भेड़ियों का बर्चस्व हो।

जैसे गर्दभ-दौड़ में कोई हारता सा अश्व हो।

वैसे ही आज अयोग्य हाथों में हमारा देश है।

फिर भी सुप्त…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on January 6, 2018 at 9:30pm — 12 Comments

ऐ जाने वाले पल कह दे, इस आने वाले पल से:-मोहित मुक्त

उम्मीदें बहुत हैं, आने वाले कल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे,

इस आने वाले पल से।

यह वर्ष भला हो मधुमय हो,

सत्पथ की राह पे तन्मय हो,

यह खुशियों का उजियाला लाये ,

यह शांति-प्रेम का भाव सिखाये ,

इस वर्ष खड़ें हों हटकर ,

कपट-द्वेष से, छल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे, .

इस आने वाले पल से।

यह साल नए कुछ घाव न दे ,

असमय-अनुचित वर्ताव न दे ,

इस साल कोई अवसाद न हो ,

किसी से कुछ दुर्वाद न…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on January 1, 2018 at 12:30am — 14 Comments

आज फिर दर्द छलका:-मोहित मुक्त

आज फिर दर्द छलका।

आँख फिर आज रोयी।

प्रिये, दिल ने फिर से-

स्मृतियाँ संजोई।

शिशिर रात में वह-

प्रणय के मधुर क्षण।

चांदनी की चादर पर -

हम और तुहिन-कण।

नर्म लबों पर-

पीयूष सा वो पानी।

हौले हवा में -

वो घुलती जवानी।

पल पास हैं सब-

तुम हीं हो खोयी।

आज फिर दर्द छलका।

आँख फिर आज रोयी।



शलभ बन जला मैं,

शिखा प्यार की थी।

बात इच्छाओं के,

बस सत्कार की थी।

जुदा मोड़ पर ,

आज दोनों खड़े…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on November 20, 2017 at 8:30am — 13 Comments

भारत-शब्दचित्र:-मोहित मुक्त

लोकतंत्र-शोकतंत्र-जनतंत्र-भजनतंत्र।

जन को दुत्कार-सत्ता से प्यार।

प्रजातंत्र में उगते राजकुमार।

विदेश की रानी, भाषण का नरेश।

समता के वादे, भय का परिवेश।

राजनीती-ताजनीति।

कूटनीति-झुठनीति।

प्रतिबद्धता-आबद्धता।

दिखावे की संबद्धता।

कुविचार-भ्रष्टाचार।

बेईमानों की सरकार।

वादे वादे और वादे।

कोष लूटने के इरादे।

भूख-बेरोजगारी।

पीड़ा-लाचारी।

दंश-बीमारी।

प्रजा-बिचारी।

स्त्री-असुरक्षा।

गौ की रक्षा।

समाज-गंदे।…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on November 6, 2017 at 8:43am — 8 Comments

क्या यहीं भारत का भाग्य है?

विच्छुरित है अन्नदाता का सपना। 

तृषित रक्त के नेता अपना। 



माँ भारती के सेवा-कर्ता ,

आज भूख से पोषित हैं। 

पैदावार देकर भी ,

रक्तरंजित और शोषित हैं। 



तपोनिष्ठ इतिहास का ,

क्या यहीं त्याग है?

क्या यहीं भारत का भाग्य है ?

क्या यहीं भारत का भाग्य है ?

.

सुधार-विकास के नारों से।

अंधभक्ति या अंधप्रचारों से।

.

साथ पर्व…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on November 1, 2017 at 4:00pm — 10 Comments

हर मुख हिंदी कब गायेगा ?:-मोहित मुक्त

विश्व पटल की बात तो छोडो ,

भारत के सर्वस्व भूमि पर ,

त्याग आपसी रंजिश को ,

हर मुख हिंदी कब गायेगा ?

जाने वह क्षण कब आएगा ?

विदेशी भाषाओं से कबतक ,

टूटेगा सबका सम्मोहन ?

हेमलेट को छोड़ जन-मन ,

मेघदूत कब गायेगा ?

जाने वह क्षण कब आएगा ?

निराला, दिनकर, प्रसाद से ,

जिसके प्रखर सपूत हुवे ,

उस माँ को सम्मान दिलाने ,

नव-भारत कब जग पायेगा ?

जाने वह क्षण कब आएगा ?

गर्वान्वित होगा भारत-वर्ष ,

कब…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on September 14, 2017 at 12:00pm — 24 Comments

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था:-मोहित मुक्त

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था।

सूखे तटबंधों को तुमने ,

प्रेम सलिल से सिंचित करके ,

वैरागी बंजर अंतर में ,

आसक्ति के अंकुर बोकर ,

तुमने प्रीत जगाया था ,

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था।

जीवन के भूसर रंगों को ,

प्रेम वर्ण से हरित रंजित कर ,

अनल जलन से पीड़ित को ,

हिमानिल सा तन-मन छू-छूकर ,

तुमने प्रीत जगाया था ,

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था।

चिर तृषार्त कोरे हृदय को ,

मधु-द्राक्षासव पान कराकर ,…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on September 12, 2017 at 9:30am — 10 Comments

अभिमन्यु की प्रेयसी:- मोहित मुक्त

गतांक से आगे

बैठी हुइ निज कक्ष में कुशुमाभूषणों से सजी।

अनभिज्ञ होनी के लेख से अभिमन्यु की प्रेयसी।

अभी-अभी कर गयी है दासी दिब्य श्रृंगार।

चूड़ामणि, कानो में कुण्डल, गले में पुष्पाहार।

स्वर्णाभूषणों से प्रखर हो चमक रहा है मस्तक।

बालपन की चौखट पर दे गया यौवन दस्तक।

अभी-अभी तो बंधी है प्रणय की रश्मि बंधों से।

नया-नया परिचय हुआ है शाश्वत प्रेम संबंधों से।

अभी तो हाथों से नहीं उतरी सुहाग की लाली।

अब तक महक रही…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 21, 2017 at 9:14am — 4 Comments

माँ मै तेरे दामन में फिर लौट आऊंगा:- मोहित मुक्त

आज निकला हूँ उड़ने की ख़्वाहिश लिये ,

पर दुनिया के आसमान में कहाँ तक जाऊंगा ,

माँ मै तेरे दामन में फिर लौट आऊंगा।

दूर आँचल से तेरे तलाशता हूँ जो ,

कुछ साथी ,कुछ सपने,कुछ अपने ,

हो सकता है मिल जाये मंज़िल मेरी ,

पर स्नेहमयी बातों का सुख कहाँ पाउँगा ,

माँ मै तेरे दामन में फिर लौट आऊंगा।

मुझे पता है समेट लोगी अंतर में अपने ,

भूल शैतानियाँ मेरी, भूल नादानियाँ मेरी ,

जीवन के हर पल हर गलती पर क्षमादान ,

भला तेरे हृदय…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 20, 2017 at 8:00am — 14 Comments

पार्थनंदन (भाग-२):- मोहित मुक्त

गतांक से आगे। .....

ब्यूह भेदन की कला की करते हैं गर बात।

एक रहस्य है गूढ़ अति सुन लीजिये तात।

चक्रब्यूह के रण कौशल से मैं नहीं अंजान हूँ।

गर्भ में पिता से पाया इस कला का ज्ञान हूँ।

पर तुम्हारी उम्र क्या है ब्यूह मध्य में जाने की।

सुकोमल से हाँथों में कठीन अस्त्र उठाने की।

बालपन में क्यों सहो रण की भीषण आग।

मुझको विचलित ना करो आज्ञा रण की मांग।

मोहपाश में फंसा देखकर धर्मराज को वीरव्रती।

बोला ये गंभीर बचन हठ ठानकर उनके…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 17, 2017 at 6:41am — No Comments

पार्थनंदन (भाग १ ):- मोहित मिश्रा

उस दिन रणभूमि में अर्जुन निकल गए थे दूर।

शायद होनी को हीं था दूजा कुछ मंजूर।

पार्थ बिना पांडवों को सोच असंभव बचना।

गुरु द्रोण ने कर डाला चक्रब्यूह की रचना।

अकुल-ब्याकुल हुए युधिष्ठिर देखकर के ये बला।

केवल अर्जुन को पता थी ब्यूह भेदन की कला।

भीम,नकुल,सहदेव,सारे वीर गण हैं कशमशे।

रणधीर द्रोणाचार्य के रणजाल में अब जा फंसे।

निज स्वजनों को देखकर चिंतित और लाचार।

सिंह शावक सा कर गर्जना बोला पार्थ कुमार।

बड़े…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 16, 2017 at 3:23pm — 4 Comments

हाय प्रणय का प्रथम वियोग-मोहित मुक्त

हाय प्रणय का प्रथम वियोग।

स्पंदित हृदय की करुण वेदना,

द्रवित नयन और अनुपम रोग।

हाय प्रणय का प्रथम वियोग।

लुटे लुटे से चितवन अपने ,

ब्यथा ग्रसित सुखदायी सपने ,

पहचान यहीं अब बन रह जाते ,

आँख के आँसू सब कह जाते,

यादों के पल दर्द का मौसम,

रग रग में घुलता सा इक गम,

माँ के हांथ का रुचिकर खाना,

खाकर तिक्त सा मुख बन जाना,

अपनों से मिलने से डरना,

छुपकर ठंढी आहें भरना ,

बार-बार गलियों का चक्कर,

जिन गलियों में रूककर…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 6, 2017 at 11:00pm — 4 Comments

जनता(ब्यथा और प्रण ):-मोहित मुक्त

अन्तर्वेदना से छिन्न-भिन्न

आक्रांत उर की मर्म कराहें ,

अश्रुनिमग्न कातर स्वर में

पूछती हैं किसको पुकारें |

आह भारत-वर्ष हाय

क्या यहीं रह गया है शेष ?

स्वर्णयुक्त इतिहास का-

कुछ ,रहा नहीं भग्न-अवशेष ?

क्यों नहीं कुक्षि तेरी

अब कोई अशोक जन्माती है ?

क्यों नहीं स्वसम्मान की

आज ललकारें लहलहाती हैं ?

जनता कोई खिलौना है-

क्या, गणतंत्रता की सत्ता में ?

नहीं तो फिर गौण-

क्यों ,बन…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on July 23, 2017 at 8:00am — 6 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-1
"सियासी चहरे बदलते रहते हैं । छप्पन इंच का सीना भी हिजड़ा नज़र आ रहा है और कश्मीर ख़ून में नहा रहा है…"
4 hours ago
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post तुम्हारे स्पर्श से....
"आदरणीय कबीर जी नमस्कार, आपकी शिर्कत के लिए बेहद शुक्रिया...., आपको कविता पसंद  आयी ...लिखना…"
4 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Neelam Upadhyaya's blog post पापा तुम्हारी याद में
"वाह। गागर में यथार्थ का सागर! हार्दिक बधाई और आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mohammed Arif's blog post कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-1
"पर सियासद कितने दिन जिंदा रहने देगी कश्मीर को ?  कश्मीर के दर्द को उकेरने के लिए आभार और बधाई…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on gumnaam pithoragarhi's blog post ग़ज़ल .....
"बहुत खूब..."
5 hours ago
Samar kabeer commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)
"जी,बहतर है ।"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)
"आ. भाई तस्दीक अहमद जी, ईद के मौके पर बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
6 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani posted a blog post

मुफ़्त की ऑक्सीजन (लघुकथा)

"नहीं कमली! हम नहीं जायेंगे वहां!" इकलौती बिटिया केमहानगरीय जीवन के दीदार कर लौटी बीवी से उसकी बदली…See More
7 hours ago
Neelam Upadhyaya posted a blog post

पापा तुम्हारी याद में

जीवन की पतंग पापा थे डोरउड़ान हरदम आकाश की ओर पापा सूरज की किरणप्यार का सागर दुःख के हर कोने मेंखड़ा…See More
8 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan posted blog posts
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post पतझड़ -  लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय समर क़बीर साहब जी।आदाब।आपको ईद मुबारक़।"
10 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)
"मुहतरम जनाब समर साहिब आदाब  , ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |…"
12 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service