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Mohit mishra (mukt)'s Blog (32)

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

चानक से,

कर मुझसे,

ठलाता सा पंछी बोला।

श्वर से मानव ने तो,

त्तम ज्ञान-दान था मोला।

पर हो तुम सब जीवों में,

क अकेली जात अनोखी,

सी क्या मजबूरी तुमको-

ट रहे होंठों की शोख़ी?

र सताकर कमज़ोरों को-

अंग तुम्हारा खिल जाता…

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Added by Mohit mishra (mukt) on October 22, 2018 at 8:30am — 1 Comment

श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता

कहा मौत ने श्री अटल से, वक़्त गया जाने का,

स्वर्ग से आदेश मुझे है, आपको वहाँ लिवाने का।

पर साधारण नर नहीं…

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Added by Mohit mishra (mukt) on August 16, 2018 at 10:00pm — 2 Comments

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)

प्रेम का स्वरूप क्या है?

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति ?

असंभव सा है, इस प्रश्न का-

निष्कर्षतः एक समुचित उत्तर। 

प्रकृति और पुरुष ब्रह्म,

युग प्रेम के आदि प्रवर्तक,

आकाश सा उन्मुक्त-

स्वछंद पवन सा-

धरा से भी गंभीर उनका प्यार,

अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना से दूर-

एकात्म में ही लीन दोनों तत्व ,

हो पृथक जिनका नहीं है अर्थ कोई,

चिर-मौन में हैं साधते वे सत्व ,

इसलिए मन को कभी आभास होता,

स्वरबद्ध करने की जरूरत है नहीं-

अपने…

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Added by Mohit mishra (mukt) on August 5, 2018 at 2:12pm — 7 Comments

मेरे प्यार!

उस रात रह गया,

दिये की थरथराती लौ पर,

काँपता सुबकता हमारा प्यार

स्याह निशा की स्तब्धता-

थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान,

निगल लिया था अंधकार ने-

हमारे कितने किरण-पुंज,

अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच,

थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं ,

और साँसों की ऊष्णता से,

थी घुटती हवा हमारे आस-पास,

वेदना-संतप्त मस्तिष्क में ,

गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द,

जो डबडबाई आँखों समेत-

मुँह मोड़ कर तुमने कहा था ,

“यह मिलन आख़िरी…

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Added by Mohit mishra (mukt) on July 17, 2018 at 11:00pm — 5 Comments

अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त

कह रही है दिल की धड़कन, कुछ दिनों से दूर हो तुम,

आह सांसों की, तड़प की, अब मिटा दो पास आओ.

यह अकेलापन मुझे अब काटने को दौड़ता है ,

तन्हा पल की इस चुभन को अब मिटा दो पास आओ.

आलिंगनों के द्वार तुमसे ,कह रहे हैं खोल बाहें,

फूल के श्रृंगार जैसे गोद मेरी तुम सजा दो ,

आंख के अरमान तुमसे कह रहे हैं इंगितों से ,

देख लो तिरछी नजर से औ जरा सा तुम लजा दो ,

होठ जो प्यासे हैं अबतक बोलते हैं सुन लो सजनी ,

तुम जरा सा होठ अपने मेरे होठों से…

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Added by Mohit mishra (mukt) on July 2, 2018 at 6:27pm — 4 Comments

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

पुनः कुठाराघात सह रहीं,

माँ भारती कुछ वर्षों से ।

पीड़ादायी दंश दे रहे ,

नवल विषधर कुछ अरसे से।

फण पर फणधर के नर्तन को,

हलधर के भाई कम हैं।

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर,

देख राजनीति का अंधपतन।

सोच दुर्दशा आम जन-जन की ,

ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन।

मोहित अर्जुन को समझाने को ,

गीता की वाणी कम है।

हिमगिरि की ऑंखें नम है।

सूर्य भारत भू के…

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Added by Mohit mishra (mukt) on June 18, 2018 at 6:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,

मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।

मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,

मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।

गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,

मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।

फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,

मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।

भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा…

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Added by Mohit mishra (mukt) on June 10, 2018 at 10:16pm — 6 Comments

भला कैसे(अतुकांत):- मोहित मुक्त

दूर क्षितिज में-

तुम्हारे अधर की ज्यों रंगत चुराकर -

प्राची के प्रान्त पर रक्तिम सी आभा,

हो बिखरने को आकुल तभी मीत मेरे,

मुझे चूमकर तुम जगाने लगो ,

कहो कैसे गाऊँ शुभाषित सुबह के !

प्रणय-छंद ना फिर उच्चारा करूं।



शशि मुख पर-

छिटक आये केश-वेणी से खुल-

प्यारे लट को झटककर झुंझलाती तुम,

हस्त-व्यस्त हों कहीं, होके लाचार सी ,

तुम पुकारो मुझे जब बड़े प्यार से ,

मैं भला कैसे उन्माद से छूट कर ,

रुक जाऊं! तुम्हे ना सताया करूं।

ऐ…

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Added by Mohit mishra (mukt) on June 1, 2018 at 3:15pm — 8 Comments

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते:-मोहित मुक्त

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

आंखे गातीं अनुराग राग ,

जी से मिट जाता विराग ,

उन्माद भरे किसलय दोनों ,

अधरों पर ढुल-ढुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

अनुकंपित होता प्राण सखी ,

स्पंदन युत निर्वाण सखी ,

विप्लव, विषाद सूनी रातें ,

सब लम्हों में धुल-धुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

मदमाते पुष्प नवीन विशद ,

उमड़ा आता मधुभावित नद ,

पलकों के अज्ञात-ज्ञात ,

अवगुंठन सब खुल-खुल…

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Added by Mohit mishra (mukt) on May 12, 2018 at 10:22pm — 4 Comments

वियोग (कविता):- मोहित मुक्त

नीरव निशा, निःशब्द दिशा में ,

तारे-विहीन अंबर के निचे ,

प्रेम-अनल की हिमशिखा से,

जल-जल अपना अंतस सींचे।

मर्म लक्ष्य कर व्यंग विशिख को ,

निष्ठुर ने ब्याल सरीखे छोडे ,

मैं विकल तड़पता रहा अकिंचन ,

सहला-सहला दिल के फोड़े।

दृग में आँसू की माला टूटी ,

बिखरे मुक्ताहल गालों पर ,

ब्यथा-उर्मि करुणा-सिंधु की ,

देती दस्तक उर-छालों पर |

एक शून्य उतर सा आया ,

इस जीवन के आंगन में ,

और पर्व मना है इसका ,

किसी निर्दय…

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Added by Mohit mishra (mukt) on May 6, 2018 at 12:32pm — 10 Comments

सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )

लौटे राघव, जनपद भ्रमण कर, हतोत्साहित उदास ,

स्कंध निचे, द्रवित हृदय, उद्वेलित मन, कम्पित श्वास,

चिंतित मन, बार-बार करते हृदय कठोर,

पर कानों में पुनः-पुनः गुञ्जित होता वहीं शोर,

हाय निष्कपट प्रजा यह, पर बुद्धिहीन ,

अंतः विषाद से हो उठा श्याम-मुख-मलिन,

यह कैसा विकट शत्रु बन खड़ा राजधर्म ,

प्रजा बेध रही ब्यंग-विशिख से राम मर्म ,

और राम ! प्रत्युत्तर में विकल, ठगे से मौन ,

सोच रहे मुझसे हतभागा है धरा पर कौन?

हाय माता का ही नहीं…

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Added by Mohit mishra (mukt) on April 5, 2018 at 7:00am — 4 Comments

होली और यादें :-मोहित मुक्त

फिर से होली आ गयी है ,

यादें मन में छा गयीं हैं ,

यादों का है क्या ठिकाना ,

इनका तो है आना जाना।

पर वो होली और थी जब ,

घर की घर में साथ थे सब ,

माँ के हाथों की मिठाई ,

मानो अमृत में डुबाई।

पिताजी का प्यार देना,

स्नेह से यूँ निहार देना ,

उनकी आँखों का मैं तारा ,

उनके प्राणों का सहारा।

आज घर से दूर हूँ मैं ,

दूर क्या मजबूर हूँ मैं ,

रंग होली के मुझे अब,

चुभते हैं काँटों से सब।

फिर से…

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Added by Mohit mishra (mukt) on March 1, 2018 at 8:34am — 10 Comments

ये मत सोचो रुक जाऊंगा:-मोहित मुक्त

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

बेताब लहर के धक्कों से -

नौका चूर हो जाएगी,

नियति की वक्र नजर मुझपर -

माना की क्रूर हो जाएगी ,

तूफां हठ ठान भले ही ले-

कर ले चाहे लाख जतन ,

जीवन यज्ञ आहुति में -

हो जाये मेरा सर्वस्व हवन,

पर जबतक धड़कन जिन्दा है-

ये मत सोचो झुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

पग-पग पर शूल मिलें चाहे-

राहों में तप्त अंगारे हों।

पावों में छाले पड़ जाएं या-

रोम-रोम प्यास के मारे…

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Added by Mohit mishra (mukt) on February 6, 2018 at 3:31pm — 7 Comments

आवाहन(कविता ):-मोहित मुक्त

अंगार भर लो लोचनों में, श्वांस में फुंफकार हो ,

नस-नस अनल से पूर्ण हो , पुरुष्त्व का संचार हो।

विश्वास जन का खोकर भी सत्तासीन हो जाते हैं।

जो हर चुनावी परिवेश में नए प्रपंच रचाते हैं।

वैसे दागी लोग न जाने क्यों हमारे नायक हैं ?

क्या वे लोग ही हमपर शासन करने लायक हैं ?

जैसे मृगेंद्र के पुत्रों पर भेड़ियों का बर्चस्व हो।

जैसे गर्दभ-दौड़ में कोई हारता सा अश्व हो।

वैसे ही आज अयोग्य हाथों में हमारा देश है।

फिर भी सुप्त…

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Added by Mohit mishra (mukt) on January 6, 2018 at 9:30pm — 12 Comments

ऐ जाने वाले पल कह दे, इस आने वाले पल से:-मोहित मुक्त

उम्मीदें बहुत हैं, आने वाले कल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे,

इस आने वाले पल से।

यह वर्ष भला हो मधुमय हो,

सत्पथ की राह पे तन्मय हो,

यह खुशियों का उजियाला लाये ,

यह शांति-प्रेम का भाव सिखाये ,

इस वर्ष खड़ें हों हटकर ,

कपट-द्वेष से, छल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे, .

इस आने वाले पल से।

यह साल नए कुछ घाव न दे ,

असमय-अनुचित वर्ताव न दे ,

इस साल कोई अवसाद न हो ,

किसी से कुछ दुर्वाद न…

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Added by Mohit mishra (mukt) on January 1, 2018 at 12:30am — 14 Comments

आज फिर दर्द छलका:-मोहित मुक्त

आज फिर दर्द छलका।

आँख फिर आज रोयी।

प्रिये, दिल ने फिर से-

स्मृतियाँ संजोई।

शिशिर रात में वह-

प्रणय के मधुर क्षण।

चांदनी की चादर पर -

हम और तुहिन-कण।

नर्म लबों पर-

पीयूष सा वो पानी।

हौले हवा में -

वो घुलती जवानी।

पल पास हैं सब-

तुम हीं हो खोयी।

आज फिर दर्द छलका।

आँख फिर आज रोयी।



शलभ बन जला मैं,

शिखा प्यार की थी।

बात इच्छाओं के,

बस सत्कार की थी।

जुदा मोड़ पर ,

आज दोनों खड़े…

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Added by Mohit mishra (mukt) on November 20, 2017 at 8:30am — 13 Comments

भारत-शब्दचित्र:-मोहित मुक्त

लोकतंत्र-शोकतंत्र-जनतंत्र-भजनतंत्र।

जन को दुत्कार-सत्ता से प्यार।

प्रजातंत्र में उगते राजकुमार।

विदेश की रानी, भाषण का नरेश।

समता के वादे, भय का परिवेश।

राजनीती-ताजनीति।

कूटनीति-झुठनीति।

प्रतिबद्धता-आबद्धता।

दिखावे की संबद्धता।

कुविचार-भ्रष्टाचार।

बेईमानों की सरकार।

वादे वादे और वादे।

कोष लूटने के इरादे।

भूख-बेरोजगारी।

पीड़ा-लाचारी।

दंश-बीमारी।

प्रजा-बिचारी।

स्त्री-असुरक्षा।

गौ की रक्षा।

समाज-गंदे।…

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Added by Mohit mishra (mukt) on November 6, 2017 at 8:43am — 8 Comments

क्या यहीं भारत का भाग्य है?

विच्छुरित है अन्नदाता का सपना। 

तृषित रक्त के नेता अपना। 



माँ भारती के सेवा-कर्ता ,

आज भूख से पोषित हैं। 

पैदावार देकर भी ,

रक्तरंजित और शोषित हैं। 



तपोनिष्ठ इतिहास का ,

क्या यहीं त्याग है?

क्या यहीं भारत का भाग्य है ?

क्या यहीं भारत का भाग्य है ?

.

सुधार-विकास के नारों से।

अंधभक्ति या अंधप्रचारों से।

.

साथ पर्व…

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Added by Mohit mishra (mukt) on November 1, 2017 at 4:00pm — 10 Comments

हर मुख हिंदी कब गायेगा ?:-मोहित मुक्त

विश्व पटल की बात तो छोडो ,

भारत के सर्वस्व भूमि पर ,

त्याग आपसी रंजिश को ,

हर मुख हिंदी कब गायेगा ?

जाने वह क्षण कब आएगा ?

विदेशी भाषाओं से कबतक ,

टूटेगा सबका सम्मोहन ?

हेमलेट को छोड़ जन-मन ,

मेघदूत कब गायेगा ?

जाने वह क्षण कब आएगा ?

निराला, दिनकर, प्रसाद से ,

जिसके प्रखर सपूत हुवे ,

उस माँ को सम्मान दिलाने ,

नव-भारत कब जग पायेगा ?

जाने वह क्षण कब आएगा ?

गर्वान्वित होगा भारत-वर्ष ,

कब…

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Added by Mohit mishra (mukt) on September 14, 2017 at 12:00pm — 24 Comments

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था:-मोहित मुक्त

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था।

सूखे तटबंधों को तुमने ,

प्रेम सलिल से सिंचित करके ,

वैरागी बंजर अंतर में ,

आसक्ति के अंकुर बोकर ,

तुमने प्रीत जगाया था ,

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था।

जीवन के भूसर रंगों को ,

प्रेम वर्ण से हरित रंजित कर ,

अनल जलन से पीड़ित को ,

हिमानिल सा तन-मन छू-छूकर ,

तुमने प्रीत जगाया था ,

हाँ, तुमने प्यार सिखाया था।

चिर तृषार्त कोरे हृदय को ,

मधु-द्राक्षासव पान कराकर ,…

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Added by Mohit mishra (mukt) on September 12, 2017 at 9:30am — 10 Comments

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