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बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s Blog (49)

नव वर्ष स्वागत गीत

बहर 1222 1222 1222 1222



करें स्वागत सभी मिल के, नये इस वर्ष सतरह का;

नये सपने नये अवसर, नया ये वर्ष लाएगा।

करें सम्मान इसका हम, नई आशा बसा मन में;

नई उम्मीद ले कर के, नया ये साल आएगा।



मिला के हाथ सब से ही, सभी को दें बधाई हम;

जहाँ हम बाँटते खुशियाँ, वहीं बाँटें सभी के ग़म।

करें संकल्प सब मिल के, उठाएँगे गिरें हैं जो;

तभी कुछ कर गुजरने का, नया इक जोश छाए गा।



दिलों में मैल है बाकी, पुराने साल का कुछ गर;

मिटाएँ उसको पहले हम, नये…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on December 31, 2016 at 12:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल (साँस को छोड़ना भी मना है)

ग़ज़ल (साँस को छोड़ना भी मना है)

(2122 122 122)

बोलना बात का भी मना है,
साँस को छोड़ना भी मना है।

दहशतों में सभी जी रहे है,
दर्द का अब गिला भी मना है।

ख्वाब देखे कभी जो सभी ने,
आज तो सोचना भी मना है।

जख्म गहरे सभी सड़ गये हैं,
खोलना घाव का भी मना है।

सब्र रोके नहीं रुक रहा अब,
बाँध को तोड़ना भी मना है।

अब नहीं है 'नमन' का ठिकाना,
आशियाँ खोजना भी मना है।


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on December 2, 2016 at 12:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल (बना है बोझ ये जीवन।)

1212 1122 1212 1122

(मुज़तस मुसम्मन मखबून)



बना है बोझ ये जीवन कदम थमे थमे से हैं,

कमर दी तोड़ गरीबी बदन झुके झुके से हैं।



लिखा न एक निवाला नसीब हाय ये कैसा,

सहन ना भूख ये होती उदर दबे दबे से हैं।



पड़े दिखाई नहीं अब कहीं भी आस की किरणें,

गगन में आँख गड़ाए नयन थके थके से हैं।



मिली सदा हमें नफरत करे जलील जमाना,

हथेली कान पे रखते वचन चुभे चुभे से हैं।



दिखी कभी न बहारें मिले सदा हमें पतझड़,

मगर हमारे मसीहा कमल खिले खिले… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on November 21, 2016 at 6:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल (अनमोल क्षण)

बहर :- 2212 2212 2212 2212

(हरिगीतिका छंद)



अनमोल क्षण जीवन के जो मन में बसा हरदम रखें,

जो जिंदगी के खाश पल उर से लगा हरदम रखें।



जिन याद से मस्तक हमारा शान से ऊँचा उठे,

उन याद के ख्वाबों को सीने में जगा हरदम रखें।



सन्तोष जो हमको मिला जब स्वप्न पूरे थे हुए,

उन वक्त के रंगीन लमहों को बचा हरदम रखें।



जब कुछ अलग हमने किया सबने बिठाया आँख पे,

उन वाहवाही के पलों को हम सजा हरदम रखें।



जो आग दुश्मन ने लगाई देश में आतंक…

Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on November 3, 2016 at 10:30am — 3 Comments

क्या तूने भी देखी कहीं दिवाली

"क्या तूने भी देखी कहीं दिवाली"



हे अबोध ! क्या तूने भी देखी कहीं दिवाली?

तमपूर्ण निशा में क्या कहीं मिली उजियाली?



मैंने तो उजियालों में उजियाले होते देखे,

विद्युत से जगमग महलों में दिये जलते देखे,

फुलझड़ियों के बीच छूटते कई अनार देखे,

खुले बाज़ारों में जगमग करती देखी दिवाली।

हे नन्हे ! क्या तुझे दिखी अँधियारों में खुशियाली?



कहकहों ठहाकों बीच गरजते हुए पटाखे सुने,

मैंने मधुर आरती बीच सुरीले मंगलगीत सुने,

ना ना बीच और और के आग्रह… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 30, 2016 at 11:55am — 3 Comments

वागीश्वरी सवैया और कलाधर छंद

वागीश्वरी सवैया (122×7 + 12)



दया का महामन्त्र धारो मनों में,दया से सभी को लुभाते चलो।

न हो भेद दुर्भाव कैसा किसी से,सभी को गले से लगाते चलो।

दयाभूषणों से सभी प्राणियों के,मनों को सदा ही सजाते चलो।

दुखाओ मनों को न थोड़ा किसी का,दया की सुधा को बहाते चलो।



कलाधर छंद (गुरु लघु की 15 आवृति के बाद गुरु)



मोह लोभ काम क्रोध वासना समस्त त्याग, पाप भोग को मनोव्यथा बना निकालिए।

ज्ञान ध्यान दान को सजाय रोम रोम मध्य, ध्यान ध्येय पे रखें तटस्थ हो…

Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 25, 2016 at 6:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल (अगर तुम सा मिले दुश्मन तो हसरत और हो जाती)

नहीं जो चाहते रिश्ते अदावत और हो जाती,

अमन की बात ना करते सियासत और हो जाती,



दिखाकर बुज़दिली पर तुम चुभोते पीठ में खंजर,

अगर तुम बाज़ आ जाते मोहब्बत और हो जाती।



घिनौनी हरकतें करना तुम्हारी तो सदा आदत,

बदल जाती अगर आदत तो फितरत और हो जाती।



जो दहशतगर्द हैं पाले यहाँ दहशत वो फैलाते,

इन्हें बस में जो तुम रखते शराफत और हो जाती।



नहीं कश्मीर तेरा था नहीं होगा कभी आगे,

न जाते पास 'हाकिम' के शिकायत और हो जाती।



नहीं औकात तेरी… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 8, 2016 at 1:04pm — 5 Comments

तड़प

(श्रृंगार छंद की रचना। 16 मात्रा आदि 32 अंत 23(21) )



सजन ना प्यास अधूरी छोड़।

हमारा नाजुक दिल ना तोड़।

बहुत हम तड़पे करके याद।

एक दुखिया करती फरियाद।।



सदा तारे गिन काटी रात।

बादलों से करती थी बात।

रही मैं रोज चाँद को ताक।

कलेजा होता रहता खाक।।



मिलन रुत आई बरसों बाद।

करो मत इसको यूँ बरबाद।

गले से लगने की है चाह।

निकलती साँसों से अब आह।।



बाँह में लो निचोड़ तुम आज।

छेड़ दो रग रग के सब साज।

होंठ अब रहे… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 2, 2016 at 7:17pm — 10 Comments

ग़ज़ल (दर्द दे वो चले)

दर्द दे वो चले पर दवा कौन दे,

साँस थमने लगी अब दुआ कौन दे।



चाहतें दफ़्न सब हो के दिल में रही,

जब जफा ही लिखी तो वफ़ा कौन दे।



प्यास बढ़ती रही आप छिपते रहे,

आग दिल में लगी पर बुझा कौन दे।



मंजिलें दूर जब हमसे जाने लगी,

हाथको थाम के आसरा कौन दे।



आशियाँ तक हमारा गया है उजड़,

याद में जो उसे अब बसा कौन दे।



बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

तिनसुकिया



(212 212 212 212 बहर की रचना)



मौलिक व… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 25, 2016 at 11:30am — 8 Comments

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