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Naveen Mani Tripathi's Blog – October 2016 Archive (6)

ग़ज़ल - मेरे गर्दिशों का आलम तुझे देखना न आया

ग़ज़ल



1121 2122 1121 2122

था नसीब का तकाजा वो बना ठना न आया ।

मेरे गर्दिशों का आलम तुझे देखना न आया ।।



कई जख़्म सह गए हम ये निशान कह रहे हैं ।

तेरी बदसलूकियों पे , मुझे रूठना न आया।।



ये वफ़ा की थी तिज़ारत,मैं समझ सका न तुझको ।

है सितम का इन्तिहाँ ये , मुझे टूटना न आया ।।



हुए हम भी बे खबर जब,वो नई नई थी बंदिश।

वो ग़ज़ल की तर्जुमा थी , हमे झूमना न आया ।।



था सराफ़तों का मंजर ,वो झुकी हुई निगाहें ।

बड़ी तेज आंधियाँ थीं ,… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 28, 2016 at 1:00am — 2 Comments

ग़ज़ल - जाती तेरे मिज़ाज से क्यूँ बेरुख़ी नहीं

221 2121 1221 212

बुझते रहे चिराग गई तीरगी नही ।

फिर भी हवा के रुख से मेरी दुश्मनी नही ।।





आ जाइए हुज़ूर मुहब्बत के वास्ते ।

दैरो हरम में आज कहीं बेबसी नहीं ।।





बहकी अदा के साथ बहुत आशिकी हुई ।

गुजरी तमाम रात मिटी तिश्नगी नहीं ।।





कब से नज़र को फेर के बैठी है वो सनम ।

शायद मेरे नसीब में वो बात ही नहीं ।।





माना कि गैर से है ये वादा भी वस्ल का ।

उल्फ़त की बेखुदी में कहीं रौशनी नही ।।





तेरा… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 24, 2016 at 1:00am — 6 Comments

दीवानगी में हम वफ़ा लिखते गए

‌2212 2212 2212

.

दीवानगी में हम वफ़ा लिखते गए ।

तुम बेखुदी में बस जफ़ा पढ़ते गए ।।



पूछा किया वो आईने से रात भर ।

आवारगी में हुस्न क्यूँ ढलते गए ।।



आयी तबस्सुम जब मेरी दहलीज पर ।

देखा चिराग़े अश्क भी जलते गए ।।



नादानियों में फासलो से बेखबर ।

बस जिंदगी भर हाथ को मलते गए ।।



तालीम ले बैठा था जब इन्साफ की ।

क्यूँ मुज़रिमो के फैसले बदले गए ।।



जिसकी बेबाकी के चर्चे थे बहुत ।

तहज़ीब को अक्सर वही छलते गए…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 22, 2016 at 7:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल - ये जिंदगी है यहाँ इम्तहान और भी हैं

1212 1122 1212 112



हमारे जख़्म के गहरे निशान और भी हैं ।

ये जिंदगी है यहाँ इम्तहान और भी हैं ।।



न रोक आज परिंदों की आजमाइश को ।

फ़ना के बाद कई आसमान और भी हैं ।।



समझ सको तो मेरी बात मान लो वरना ।

मेरी किताब में लिक्खी जुबान और भी हैं ।।



जरा सँभल के चलो ये मुकाम ठीक नही ।

यहां तो लोग भी रखते इमान और भी हैं ।।



न जाइयेगा कभी इश्क के समन्दर में ।

वहाँ तो दर्द के बढ़ते उफान और भी हैं ।।



जो हुक्मरां है उसे… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 19, 2016 at 2:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल - हर मयकशी के बीच कई सिलसिले मिले

221 2121 1221 212



हर मयकशी के बीच कई सिलसिले मिले ।

देखा तो मयकदा में कई मयकदे मिले ।।



साकी शराब डाल के हँस कर के यूं कहा।

आ जाइए हुजूर मुकद्दर भले मिले ।।



कैसे कहूँ खुदा की इबादत नहीं वहां ।

रिन्दों के साथ में भी नए फ़लसफ़े मिले ।।



यह बात और है की उसे होश आ गया ।

वरना तमाम रात उसे मनचले मिले ।।



जिसको फ़कीर जान के लिल्लाह कर दिया ।

चर्चा उसी के घर में ख़ज़ाने दबे मिले ।।



मुझ से न पूछिए कि…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 17, 2016 at 3:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212



बिकते रहे ईमान हुकूमत की फेर में ।

मरते गए जवान हिफ़ाज़त की फेर में ।।



नापाक पाक है ये खबर आम हो गई ।

बरबादियाँ तमाम नसीहत की फेर में ।।



कुछ दर्द को बयां वो सरेआम कर गया ।

मिटता रहा ये मुल्क शराफ़त की फेर में ।।



आ जाइए हुजूर ये हिन्दोस्तान है ।

गद्दार बिक रहे हैं रियासत के फेर में ।।



ऐटम की धमकियों का असर कुछ नही हुआ ।

हम भी पड़े हुए हैं हिमाकत की फेर में।।



सुन ले मेरे रकीब जमाना बदल गया… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 7, 2016 at 9:25am — 2 Comments

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