कुंडलिया. . . .
किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।
आँखें उसकी वेदना, नित्य करें साकार ।।
नित्य करें साकार , दर्द यह कहा न जाता ।
उसे भूख का दंश , सदा ही बड़ा सताता ।।
पत्थर पर ही पीठ , टिकाई हरदम इसने ।
भूखी काली रात , भाग्य में लिख दी किसने ।।
सुशील सरना / 9-1-26
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on January 9, 2026 at 1:29pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . क्रोध
मानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।
सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।
बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।
बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।
हर लेता इंसान का, क्रोधी सदा विवेक ।
मिटते इसके ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।
क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम ।
घातक जिसके बाद में, अक्सर हों परिणाम ।।
पर्दे पड़ते अक्ल पर, जब आता है क्रोध ।
दावानल में क्रोध की, बस लेता प्रतिशोध…
Added by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 2:00pm — 4 Comments
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