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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Discussions (5,288)

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"हम गाँव भुला देते , हो जाते नगर के भी  जो कर्ज़ इन गाँवों के , सर अपने नहीं होते इस क…"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आ० भाई अहमद जी , बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है l हार्दिक बधाई l"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आ० भाई नायब जी , इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"अति सुन्दर"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"चुपचाप खड़े थे हम बस बन के तमाशाई हम सबसे निपट लेते गर अपने नहीं होते क्या खूब कहा आ…"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"कुछ राज छिपा लेना, कहना न किसी से भी। मुस्कान भरे चेहरे, हर अपने नहीं होते।। आ० भाई…"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आ० भाई समर कबीर जी , बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकारें l"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"इक मौन ही रहता है, गर अपने नहीं होते घर होते हैं लेकिन वो, घर अपने नहीं होते है जिस…"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आरम्भ से लेकर अंत तक हर शेर लाजवाब है आपकी इस गजल का ..आ० मिथिलेश भाई जी . कोटि कोटि…"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"हो भीड़ भले बेढब  हर अपने नहीं होते परदेश में रहने को घर अपने नहीं होतेवैसे तो  छलकत…"

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied Oct 24, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

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"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
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