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नादिर ख़ान's Discussions (1,566)

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"जनाब शेख साहब खंजर के माध्यम से, समाज की बहुत सी बुराईयों पे आपने खंजर चलाये है । उम…"

नादिर ख़ान replied Jan 9, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"खंजर के कुछ जख्म से, मिले न कुछ दिन चैन। नयन बाण जिस पर चले, रहे सदा बेचैन॥   चार बर…"

नादिर ख़ान replied Jan 9, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"जनाब तस्दीक़ साहब क्या खूब गज़लगोई की है आपने.... सभी शेर पसंद आए वाह भई  वाह .....बहु…"

नादिर ख़ान replied Jan 9, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आदरणीया ममता जी इस उत्कृष्ट रचना कर्म के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ...... "

नादिर ख़ान replied Jan 9, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आदरणीयमंच संचालक जी मै आपके कथन से पूर्णतः सहमत हूँ । आदरणीय सौरभ सर की टिप्पणियों ए…"

नादिर ख़ान replied Jan 9, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"जनाब समर साहब हौसला अफ़ज़ाई  का बहुत बहुत शुक्रिया। ....  आप जैसे रचनाकारों की सकारात्…"

नादिर ख़ान replied Jan 8, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आदरणीय योगराज सर आप जैसे सुधि जनों से रचना को मान मिलना सम्मान की बात है  बहुत बहुत…"

नादिर ख़ान replied Jan 8, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आदरणीय मिथिलेश जी आपकी सकारात्मक टिप्पणी से लेखन को बल मिला बहुत बहुत आभार आपका ...."

नादिर ख़ान replied Jan 8, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"शंकायें निर्मूल हैं, संबंधों के साथ. प्रतिदिन बढ़ती दूरियाँ, कब खुशियाँ फिर हाथ. कहिय…"

नादिर ख़ान replied Jan 8, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

"आदरणीय समर कबीर साहब, आखिरकार आपकी मेहनत रंग लाई और आप महा उत्सव में फीता काटने में…"

नादिर ख़ान replied Jan 8, 2016 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-63

466 Jan 10, 2016
Reply by मिथिलेश वामनकर

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२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
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