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चार माह की

तपती धरा पर

जैसे ही बारिश की बूँदे बरसी

बो दिये , नन्हे-नन्हे अंकुरों को

कई कतारों में

सभी ने मिलकर

नन्हें -नन्हे  से हाथो को

ऊँचा उठाकर

दूर कर दी , मिट्टी की चादर  

धीरे से झाँक ने लगे

इस सुंदर सी दुनिया को

दो से चार और फिर छै:

धीरे-धीरे पत्तियां बढ़ने लगी

ढांकने लगी

अपनी ही छाँव से,

नाजुक जड़ों को

धूप में भी बनाये रखी

अपने-अपने हिस्से की नमी

अपनी  एकता की दीवार से

तेज बारिश के, बहते हुए पानी में

रोके रहे एक-दूसरे  को

बचाये  रखा, अपने अस्तित्व को

छोटे-बड़े संघर्षो से गुजरकर

आ गये भर जवानी पर

संयम बनाए रखा

सभी ने मिलकर ढांके रखा

अपने फूलों को, फिर फल को

धीरे से सावन-भादों बिताया

अब  अश्विन की तेज धूप में

सभी ने मिलकर

पीली  सी चादर ओढ़ ली

खुश है बहुत, अपना सब कुछ

न्यौछावर करने को

मिटा देंगे, अपने पूरे उसी अस्तित्व को

जिसे अपने ही दम पर

बचाये  रखा  

देना चाहते हैं, कुछ मुझे

कुछ तुम्हें

और कुछ कहते है

रखलो, हमें संजो कर

हम फिर...!

संघर्ष करेंगे.

      जितेन्द्र 'गीत'

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 13, 2014 at 11:55pm

रचना पर आपकी उपस्थति पाकर बहुत मनोबल मिला, आपका आभार आदरणीया मीना दीदी. 

सादर!

Comment by Meena Pathak on October 13, 2014 at 3:00pm

अति सुन्दर ....बेहद उम्दा ....हार्दिक बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 2, 2014 at 11:02pm

आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीय गिरिराज जी. स्नेह बनाए रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 2, 2014 at 11:01pm

आपका ह्रदय से आभार आदरणीय सुलभ जी. स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2014 at 9:40pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , सुन्दर रचना हुई है , आपको दिली बधाइयाँ |

Comment by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 9:16pm

बहुत सुन्दर !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 1, 2014 at 10:12am

रचना पर आपके स्नेहिल आशीर्वाद से रचना धन्य हुई आदरणीय डा. विजय जी. आपका ह्रदय से आभारी हूँ, स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 1, 2014 at 10:10am

रचना पर आपकी उपस्थिति से बहुत संबल मिला. आपका हार्दिक आभार आदरणीया महिमा जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 1, 2014 at 10:09am

आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है आदरणीय हरी शर्मा जी. आशाओं को मन में लेकर धरा के गर्भ में बोया गया अंकुर जब स्वयं ही संघर्ष कर बहुत सी खुशियाँ देता है बड़ा अच्छा लगता है मनको. रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ .अपना स्नेह बनाये रखियेगा.

सादर! 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 1, 2014 at 10:04am

रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ , पवन भाई

सादर!

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