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फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)

फुर्सत से कभी मेरी,
ज़िंदगानी देख लेना।
हो सके तो दरिया,
तूफानी देख लेना॥

है मेरी माँ ये,
समझाऊँ तुम्हें कैसे।
भूखा जो रहूँ, मैं
इसकी पेशानी देख लेना॥

आज़ाद परिंदे हो,
तुम उड़ ही जाओगे।
माँ-बाप की कभी खटिया,
पुरानी देख लेना॥

मैं अकेला कब था
मुझ में क़ायनात थी।
किस तरह से हमने, की
बे-ईमानी देख लेना॥

है सहूलियत तो,
मुंह खोलने से पहले।
पिताजी के अपनी,
परेशानी देख लेना॥

पीपल का पेड़ हूँ मैं,
मुझे काटने से पहले।
मन्नतों की लिपटी,
निशानी देख लेना॥


सुधेन्दु ओझा
(14.03.17)

मौलिक एवं अप्रकाशित......

Views: 75

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2017 at 5:22pm
वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2017 at 5:22pm
वाह वाह आदरणीय बहुत ही स
Comment by TEJ VEER SINGH on March 17, 2017 at 10:35am

हार्दिक बधाई आदरणीय सुधेन्दु ओझा जी।बेहतरीन कविता/नज़्म।

आज़ाद परिंदे हो,
तुम उड़ ही जाओगे।
माँ-बाप की कभी खटिया,
पुरानी देख लेना॥

Comment by सतविन्द्र कुमार on March 16, 2017 at 10:34pm
आदरणीय सुधेन्दु ओझा सर,बेहतरीन नज्म कही है आपने।हार्दिक बधाई स्वीकारें।

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