For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)

फुर्सत से कभी मेरी,
ज़िंदगानी देख लेना।
हो सके तो दरिया,
तूफानी देख लेना॥

है मेरी माँ ये,
समझाऊँ तुम्हें कैसे।
भूखा जो रहूँ, मैं
इसकी पेशानी देख लेना॥

आज़ाद परिंदे हो,
तुम उड़ ही जाओगे।
माँ-बाप की कभी खटिया,
पुरानी देख लेना॥

मैं अकेला कब था
मुझ में क़ायनात थी।
किस तरह से हमने, की
बे-ईमानी देख लेना॥

है सहूलियत तो,
मुंह खोलने से पहले।
पिताजी के अपनी,
परेशानी देख लेना॥

पीपल का पेड़ हूँ मैं,
मुझे काटने से पहले।
मन्नतों की लिपटी,
निशानी देख लेना॥


सुधेन्दु ओझा
(14.03.17)

मौलिक एवं अप्रकाशित......

Views: 59

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2017 at 5:22pm
वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2017 at 5:22pm
वाह वाह आदरणीय बहुत ही स
Comment by TEJ VEER SINGH on March 17, 2017 at 10:35am

हार्दिक बधाई आदरणीय सुधेन्दु ओझा जी।बेहतरीन कविता/नज़्म।

आज़ाद परिंदे हो,
तुम उड़ ही जाओगे।
माँ-बाप की कभी खटिया,
पुरानी देख लेना॥

Comment by सतविन्द्र कुमार on March 16, 2017 at 10:34pm
आदरणीय सुधेन्दु ओझा सर,बेहतरीन नज्म कही है आपने।हार्दिक बधाई स्वीकारें।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Anuraag Vashishth replied to Rana Pratap Singh's discussion ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा-अंक 81 में शामिल सभी ग़ज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)
"आदरणीय राणा प्रताप सिंह जी,  'लोकतंत्र की बातें अब किस्सा कहानी हो गईं' की जगह…"
3 hours ago
Anuraag Vashishth replied to Rana Pratap Singh's discussion ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा-अंक 81 में शामिल सभी ग़ज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)
"आदरणीय राणा प्रताप सिंह जी, इस त्वरित प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.    "
4 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Rana Pratap Singh posted a discussion

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा-अंक 81 में शामिल सभी ग़ज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)

परम आत्मीय स्वजन 81वें तरही मुशायरे का संकलन हाज़िर कर रहा हूँ| मिसरों को दो रंगों में चिन्हित किया…See More
5 hours ago
भुवन निस्तेज replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"आदरणीय गुमनाम भाई ग़जल बेशक अच्छी हुई है, पर गिरह का शेर भी नदारद है और रदीफ़ की क्रिया भी एक वचन हो…"
5 hours ago
अजीत शर्मा 'आकाश' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"आदरणीय भाई.... कृपया मेरी बात को हल्की-फुल्की टिप्पणी के रूप में लीजिए !!!"
5 hours ago
Anuraag Vashishth replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"आ. आकाश जी. क्या खूब कहा है ! ज़ालिमों ने बन्द कर दी सारे सूबे में शराब किस क़दर मुश्किल हमें शामें…"
5 hours ago
भुवन निस्तेज replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"सभी अशआर बस मन को भा गए. और बाबा जुकर वाले शेर का तो बस... बधाई हो आदरणीय..."
5 hours ago
भुवन निस्तेज replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"वर्तमान के प्रति आपकी चिन्ता इस ग़ज़ल में बखूबी झलक रही है आ० राजेश दीदी. कृप्या दाद कबूल करें ."
5 hours ago
अजीत शर्मा 'आकाश' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"बहुत आभार नादिर भाई !!!"
5 hours ago
अजीत शर्मा 'आकाश' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"Like.... bhaai !!!  "
5 hours ago
अजीत शर्मा 'आकाश' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"जी, सर.... आप सामने आये, मैं होश में आ गया.... अत्यन्त आभार आपका आदरणीय समर साहब.... बरसी में…"
5 hours ago
Anuraag Vashishth replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"आ. मिथिलेश बहुत अच्छी ग़ज़ल है बधाई हो."
5 hours ago

© 2017   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service