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ग़ज़ल--क्यूं कभी मेरी किसी से या खुदा बनती नहीं।

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

क्यूं कभी मेरी किसी से या खुदा बनती नहीं।
आपने मेरे लिए कोई खुशी सोची नहीं ।

लोग जो अच्छे है मुझको सोच लेते हैं बुरा।
क्या मेरी नादानियों की आदतें अच्छी नहीं ।

मैंने उनसे सिर्फ अपनी भावनाएँ बाँटी थी।
बेवजह गुस्सा ये उनका क्या गलतफहमी नहीं।

मान ली मैंने चलो मुझसे खता कुछ हो गयी।
हो गयी अनजाने में अब क्या मुझे माफी नहीं।

सीख में आकर जमाने की किया है फैसला।
बात की दहलीज तक तो आप पहुँचे भी नहीं।

कर रही है इंतजार उसका अभी तक भी नजर।
इस जहाँ में इससे बढकर मौत और कोई नहीं ।

पहले तुम हो बाद में सारी मुहब्बत सारे फर्ज।
दोस्ती तुमने मेरी अच्छी तरह परखी नहीं ।

याद थी जब तक मुझे वो साँस पर भारी रही।
भूल अब जो मैं गया तो जिन्दगी भाती नहीं ।

सोचकर तुमको शुरू होती है मेरी हर ग़ज़ल ।
शून्य हो जैसे मेरी तुम, तुम बिना गिनती नहीं ।

दो जनों से प्यार है इक तू है और इक मौत है।
तू तो धोखेबाज है ही मौत भी अपनी नहीं ।

साँस काँटों की तरह चुभती है 'राहुल' आजकल।
वो जो बस में थी मिली उसका असर है जी नहीं ।

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Comment by Rahul Dangi Panchal on March 18, 2016 at 8:04pm
सभी गुनीजनों से विन्रम विनती है क्रपया चुन चु कर मेरी कमी बताया करें जिससे मैं गलत दिशा में न जाउ और कहीं पे मंच को बदनाम न करूं
Comment by Rahul Dangi Panchal on March 18, 2016 at 8:03pm
शुक्रिया आदरणीय रामबली जी
Comment by रामबली गुप्ता on March 18, 2016 at 7:43pm
शानदार आदरणीय बधाई स्वीकार करें

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