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कौन किसके साथ (लघुकथा)

"सर, एक छोटा सा प्रार्थना पत्र है, आपकी स्वीकृति चाहिये|" कार्यालय के वरिष्ठ लिपिक ने अपने अधिकारी की तरफ कागज़ और एक कलम बढ़ाते हुए कहा|

अधिकारी ने कलम को छोड़, हाथ से कागज़ लेकर पढ़ना प्रारंभ किया, पढ़ते हुए उसके चेहरे की भंगिमाएं बदल गयीं, आँखों में कुछ तीक्ष्णता भी आ गयी, लेकिन उसने स्वयं को संयत करते हुए कहा, "अभी तीन माह पूर्व ही तो आपके वेतन में असाधारण वृद्धि की थी, अब फिर से...."

"हर संकट में आपका साथ दिया है, इस कुर्सी पर आप बैठे हैं, उसमें कहीं न कहीं मेरा भी तो हाथ है, और आपके अपनों को लाभ नहीं मिलेगा तो फिर किसे मिलेगा? " लिपिक के चेहरे पर कुटिल मुस्कुराहट थी|

"आप समझ नहीं रहे, ये देखिये, आजकल इन नाम रहित पत्रों से बहुत कष्ट है, पता नहीं लोग कैसे बातें जान लेते हैं, अब तो वरिष्ठ अधिकारी भी प्रश्न कर रहे हैं|" अधिकारी चिंतित होते हुए बोले|

"आप स्वीकृति के हस्ताक्षर कीजिये और इन पत्रों की चिंता मुझे दे दीजिये, इन्हें बंद करने का दायित्व मेरा है|"

अधिकारी ने ठीक है की मुद्रा में गर्दन हिलाई और लिपिक के हाथ से कलम लेकर हस्ताक्षर कर, कलम को बेनामी पत्र के ऊपर रख, पत्र और कलम लिपिक को दे दिये|

 

और कलम उस बेनामी पत्र पर अपनी ही स्याही से फिर मिलकर मुस्कुराने लगी|

(मौलिक और अप्रकाशित)

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