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कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में

वक़्त की अठखेलियों से फिर जनाज़े हाय निकले;

एक पिंजरे में कुरेदा तो अनोखे भाव निकले;

कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में;

सुर्ख थे नींदों में सारे जब जगा तो स्याह निकले.

 

जब जलज की पंखुड़ी पर अश्रु थामे तुम खड़े थे;

दुःख तो थोड़े थे हमारे किन्तु तुम कितने बड़े थे;

नीर था चारों तरफ फिर नाव क्यों चलती नहीं थी;

हम किनारे पर डुबे थे तुम तो दरिया पार निकले.

 

सोचता हूँ इस भयावह चित्र में अंकित कहाँ हूँ;

इस अनिश्चित दौर के उपवास में सिंचित कहाँ हूँ;

कर रहा था कोशिशें रिश्ते सजाकर रख सकूँ मैं;

मुट्ठियों से छिटके मोती हाथ में बस तार निकले.

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Comment by neeraj tripathi on March 2, 2011 at 3:01pm
धन्यवाद गणेशजी  ...आप जनों के उत्साहवर्धन से कुछ तुकबंदी कर लेता हूँ...कुछ पंक्तियाँ कभी कभार सटीक बैठ जाती हैं.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 2, 2011 at 2:52pm

कर रहा था कोशिशें रिश्ते सजाकर रख सकूँ मैं;

मुट्ठियों से छिटके मोती हाथ में बस तार निकले....

 

वाह वाह भाई नीरज जी इन दो पक्तियों में तो आपने पूरी कविता का निचोड़ ही रख दिया है | सुंदर भाव समेटे एक खुबसूरत रचना , बधाई कुबूल कीजिये भाई |

Comment by neeraj tripathi on March 2, 2011 at 1:23pm
That's so true...thanks vandana ji
Comment by neeraj tripathi on March 2, 2011 at 12:49pm
Thanks Rashmiji :-)
Comment by rashmi prabha on March 2, 2011 at 12:44pm

कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में;

सुर्ख थे नींदों में सारे जब जगा तो स्याह निकले.

 वाह 

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