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फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन

(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)

वृत्ति जग की क्लिष्ट सी होने लगी

सोच सारी लिजलिजी होने लगी

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 
भावनाओं में कमी होने लगी

चाहना में बजबजाती देह भर 
व्यंजना यूँ प्रेम की होने लगी

धर्म के जब मायने बदले गए 
नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती संवेदना घर-घर दिखे 
चेतना भी ठूँठ सी होने लगी

 

ढूँढ अब लाएँ कहाँ से हम किरण

रात सारी मावसी होने लगी

      -  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on March 4, 2014 at 10:10pm

आदरणीय राम भाई- अनुगृहीत!

Comment by ram shiromani pathak on March 4, 2014 at 8:41pm

इस ग़ज़ल पर एक शब्द। …।अनुपम

Comment by बृजेश नीरज on March 4, 2014 at 7:23pm

आदरणीया माहेश्वरी जी आपका बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 4, 2014 at 7:23pm

आदरणीय शिज्जु जी, आपके स्नेह के लिए आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 4, 2014 at 7:22pm
आदरणीय बैद्यनाथ भाई, आपका बहुत-बहुत आभार!
Comment by बृजेश नीरज on March 4, 2014 at 7:21pm
आदरणीया वंदना जी, आपका हार्दिक आभार!
Comment by Maheshwari Kaneri on March 4, 2014 at 4:45pm

धर्म के जब मायने बदले गए 
नीति सारी आसुरी होने लगी...शेर लाजवाब है बहुत बहुत बधाई आपको।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 4, 2014 at 8:53am

आदरणीय बृजेश जी साहित्य की सच्चे मन से सेवा करने वाला यदि साहित्य के सागर मे गोते लगा कर वापस आये तो उसके हाथ एक मोती ही होगा। आप जैसे रचनाकार से हम जैसे प्रशिक्षु को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आपकी हर रचना आपकी लगन को दर्शाती है, ये ग़ज़ल इसका एक उदाहरण है। हर शेर लाजवाब है बहुत बहुत बधाई आपको।

Comment by Saarthi Baidyanath on March 4, 2014 at 8:47am

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 
भावनाओं में कमी होने लगी....बेजोड़ शे'र , उम्दा ग़ज़ल ! बहुत बहुत मुबारकबाद आदरणीय !

Comment by vandana on March 4, 2014 at 6:37am

चाहना में बजबजाती देह भर 
व्यंजना यूँ प्रेम की होने लगी

धर्म के जब मायने बदले गए 
नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती संवेदना घर-घर दिखे 
चेतना भी ठूँठ सी होने लगी

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय बृजेश जी 

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