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   मन बौराया

कंगना खनका

मन बौराया

ऐसा लगता फागुन आया ।

रूप चंपयी

पीत बसन

फैली खुशबू

ऐसा लगता

यंही कंही  है चन्दन वन ।

पागल मन

उद्वेलित करने

अरे कौन चुपके से आया ?

पनघट पर

छम छम कैसा यह !

कौन वहाँ रह – रह बल खाता ?

मृगनयनी वह परीलोक की

या है वह  –

सोलहवां सावन !

मन का संयम

टूटा जाये

देख देख यौवन गदराया ।

कंगना खनका

मन बौराया

ऐसा लगता फागुन आया ।

  ---- मौलिक एवं अप्रकाशित ---

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Comment

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Comment by S. C. Brahmachari on February 26, 2014 at 8:26pm

रचना की प्रशंसा के लिए आपका हार्दिक आभार डॉ प्राची बहन !

फागुन के मौसम मे बौराये मन को वर्ण भेद का ध्यान रह कहाँ जाता है ?

फिर भी आप द्वारा उठाए गए  बिन्दु पर विद्वतजनों का मार्ग दर्शन अवश्य चाहूँगा ।

पुनश्च रचनाओं पर की जा रही आपकी  समीक्षात्मक टिप्पणी की हार्दिक प्रशंसा करता हूँ ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2014 at 2:11pm

कंगन की खनक और पायल की झंकार से तरंगित फाल्गुल के मन को मतवाला कर देने वाली इस प्रस्तुति के लिए आदरणीय ब्रह्मचारी जी आपको हार्दिक शुभकामनाएं 

मुझे लगता है इन पंक्तियों को स्त्रीलिंग में कहा जाना चाहिए 

पनघट पर

छम छम कैसा यह !

कौन वहाँ रह – रह बल खाता ?....शायद सहमत हों !

Comment by S. C. Brahmachari on February 24, 2014 at 10:20pm

श्रद्धेय योगराज प्रभाकर जी ,

आपकी प्रशंसा से मन फागुनी हुआ जाता है । मन रंगो से खेल रहा , देखूँ अब क्या ले कर आता है । हार्दिक आभार !


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 24, 2014 at 5:22am

फागुन के दिलकश रंगों से सराबोर इस भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें आ० ब्रह्मचारी जी.

Comment by S. C. Brahmachari on February 23, 2014 at 10:25pm

डॉ0 आशुतोष मिश्रा जी ,
मन को छू लेनेवाली रचना की प्रशंसा के लिए आपका आभार !

Comment by S. C. Brahmachari on February 23, 2014 at 10:17pm
बहन अन्नपूर्णा जी,
रचना की प्रशंसा के लिए आभार !
Comment by S. C. Brahmachari on February 23, 2014 at 10:15pm
श्री राम शिरोमणि पाठक जी,
रचना ने आनंद प्रदान किया, जानकर अच्छा लगा । फागुन आपको और आनंदित करे ऐसी कामना है ।
आभार !
Comment by S. C. Brahmachari on February 23, 2014 at 10:07pm
श्री श्याम नारायण वर्मा जी,
हार्दिक आभार !
Comment by S. C. Brahmachari on February 23, 2014 at 10:04pm
श्री लक्ष्मण प्रसाद लाडिवाला जी,

रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार स्वीकार करें ।
Comment by S. C. Brahmachari on February 23, 2014 at 9:58pm
भाई जीतेंद्र गीत जी,
फाल्गुनी रचना की प्रशंसा के लिए आभार स्वीकारें !

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