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याद आ गया फिर

मुझे मेरा बचपन ,

पिता  की उंगली थामे,

नन्हें कदमों से नापना,

दूरियाँ, चलते चलते ,

वो थक कर बैठ जाना ,

झुक कर फिर पिता का ,

मुझको गोदी उठाना ,

चलते चलते मेहनत का,

पाठ वो धीरे से समझाना ।

 

बच्चों पढ़ना है सुखदाई,

मिले इसी मे सभी भलाई,

पहले कुछ दिन कष्ट उठाना,

फिर सब दिन आनंद मनाना,

फिर आ गया याद, 

 उनका ये  गुनगुनाना ,

सिर पर वो उनका हाथ,

भर देता है मुझमे नई,

उमंग,तरंग और स्फूर्ति ।

 

एक हूक सी उठती है ,

आज उनको न अपने,

पास पाती हूँ ,

साया सा महसूस करती हूँ,

 इर्द गिर्द वो शायद ,

मेरे पिता का साया है ,

 किसी कष्ट मे  उनको

अपने पास ही पाया है ,

खुशियों मे उनको दूर ,

मुसकुराते पाया है ।

 

 

आज वो आँगन ,

एकदम खाली सा लगता है,

वो घर भी अब,

अजनबी सा लगता है ,

जिस के हर कोने मे ,

बसते थे मेरे पिता ...... अन्नपूर्णा बाजपेई

 

अप्रकाशित एवं मौलिक        

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Comment

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Comment by coontee mukerji on July 22, 2013 at 9:34pm

अन्न्पूर्णा जी, आपने बचपन की याद दिला दी.

Comment by annapurna bajpai on July 22, 2013 at 7:56pm

आ० केवल जी आपका बहुत आभार ।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 22, 2013 at 7:45pm

आ0 अन्नपूर्णा जी,   अतिसुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

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