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मनमीत तेरी प्रीत की पदचाप मंगल-गीत है

निर्भीत मन, अभिनीत तन, जीवात्मा सुप्रणीत है...

 

हृदयाश्रुओं का अर्घ्य दे

हर भाव को सामर्थ्य दे

विह्वल हृदय में गूँजती

मृदुनाद सी सुरधीत है....

मनमीत तेरी प्रीत की पदचाप मंगल-गीत है

निर्भीत मन, अभिनीत तन, जीवात्मा सुप्रणीत है...

 

सूर्यास्त नें चूमा उदय

दे हस्त में, तुझको हृदय

चिर प्रज्ज्वला तेरी प्रभा

लौ दिव्य दिवसातीत है...

मनमीत तेरी प्रीत की पदचाप मंगल-गीत है

निर्भीत मन, अभिनीत तन, जीवात्मा सुप्रणीत है...

 

कुंदन करे ऐसी अगन

यज्ञाग्नि में आहूत मन

अस्पृष्ट सी शुचिकर छुअन

सुगृहीत देहातीत है...

मनमीत तेरी प्रीत की पदचाप मंगल-गीत है

निर्भीत मन, अभिनीत तन, जीवात्मा सुप्रणीत है...

 

दुर्नीति से दुर्भीत था

व्यक्तित्व जो परिवीत था

सब सींखचों को तोड़कर

वह आज व्योमातीत है...

मनमीत तेरी प्रीत की पदचाप मंगल-गीत है

निर्भीत मन, अभिनीत तन, जीवात्मा सुप्रणीत है...

 

 

निर्भीत=निर्भय , अभिनीत=पूर्णता से सजाया हुआ , सुप्रणीत=सुन्दरता से रचित , सुगृहीत=जिसे ठीक प्रकार से ग्रहण किया गया हो , दुर्नीति=बुरा नीति विरुद्ध आचरण , दुर्भीत=बुरी तरह डरा हुआ , परिवीत=छिपाया हुआ , व्योमातीत=जिसके लिए आकाश भी छोटा हो.

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 16, 2013 at 2:05pm

शब्दों से भाव या भाव से शब्द के ऊहापोह को जीती हुई पंक्तियाँ बहुत कुछ कहती जाती हैं. मन के मंगल-मंगल होने के भाव संयोग की अपेक्षा हैं. यह चेतनता भौतिक सीमाओं के परे होती हैं.

सूर्यास्त नें चूमा उदय
दे हस्त में, तुझको हृदय
चिर प्रज्ज्वला तेरी प्रभा
लौ दिव्य दिवसातीत है...

उपरोक्त पंक्तियों के लिए साधुवाद, डॉ.प्राची. ...

एक बात : शब्द सामर्थ्य है या समर्थ.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 2:04pm

गीत निहित भावोह को अनुमोदित करने के लिए आभार तुषार रस्तोगी जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 2:04pm

रचना के अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार प्रिय परवीन मलिक जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 2:02pm

रचना की सराहना कर रचनाकर्म को मान देने के लिए आभार प्रिय संदीप जी. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 1:59pm

आदरणीय गणेश जी,

आपकी टिप्पणी एक आशीर्वाद सदृश है, आपको रचना का प्रवाह, शब्द संयोजन रुचा यह जान बहुत संतोष मिला है.

इस नवगीत को उदाहरण सदृश कह कर आपने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया है. 

आपकी ह्रदय से आभारी हूँ.

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 1:57pm

प्रिय वेदिका जी, रचना के अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक आभार.

सस्नेह 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 1:56pm

आदरणीय विजय निकोर जी,

यह रचना आपको पसंद आयी, व इसका शब्द चयन आपको  विशिष्ट लगा , यह जान लेखन कर्म को मान मिला है.

उत्साहवर्धन करने के लिए आपका आभार . सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2013 at 1:48pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी, आपको यह रचना रुचिकर लगी, यह जान लेखन को बहुत प्रोत्साहन मिला है, रचना के भाव व शब्दों को अनुमोदित करने के लिए मैं आपकी ह्रदय से आभारी हूँ. सादर 

Comment by Tushar Raj Rastogi on February 16, 2013 at 1:22pm

भावपूर्ण अभिव्यक्ति |  आभार |

Comment by Parveen Malik on February 16, 2013 at 12:40pm

प्राची जी सुन्दर एवं लयात्मक  रचना के लिए बधाई ...

कृपया ध्यान दे...

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