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मेरे दरिया तुम्हें कहाँ कहाँ न ढूँढा बादल ने.....

हम तो बादल हैं ...........
बरसे कभी नहीं बरसे.....

सफ़र किया था शुरू बेपनाह दरिया से,
झूमे खेले लहर की गोदी में,
जिन के सीने में मोती और तन पे चाँदी थी,

तभी पड़ी जो वहां तेज़ किरन सूरज की,
हम थे एक बूंद,हमारी थी भला क्या औकात,
निकल पड़े हम समंदर से पल में भाप हुए,

तमाम रास्तों से चल के बस भटकते हुए,
लोगों को कहते और खुद को सिर्फ सुनते हुए,
किसी आंगन औ किसी सड़क को भिगोते हुए,

कभी पेड़ों औ कभी बस्तियों के जंगल में,
तलाश करते रहे वो ज़मीं जहाँ था कभी,
एक दरिया जो मेरा घर हुआ करता था,

मगर कहीं न दिखे वो ज़मीन और गगन,
किरन जो मुझ को उठा कर यहाँ तलक लायी,
उसी की आँच ने दरिया को भी सुखा डाला,

अब तो एक बेवजह अनाम सफ़र है जारी,
किसी को गर्ज़ क्या हम हैरान रहे या तरसें,
यूँ भी...हम तो बादल हैं....
बरसे कभी नहीं बरसे.....

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Comment

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Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 20, 2012 at 3:39pm

बहुत ख़ूब सरिता जी! बादल का यही मनमौजी रवैया मुझे बहुत पसंद है| हार्दिक बधाई आपको|


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 20, 2012 at 1:24pm

vaah boond jo ban gai moti ,boond jo banke bhaap ja mili baadlon ke jhund se ....baut pyaari rachna.

Comment by Sonam Saini on April 20, 2012 at 11:04am

Good morning maim

kamal ka likhti h aap..............!

Comment by MAHIMA SHREE on April 19, 2012 at 10:24pm

अब तो एक बेवजह अनाम सफ़र है जारी,
किसी को गर्ज़ क्या हम हैरान रहे या तरसें,
यूँ भी...हम तो बादल हैं....
बरसे कभी नहीं बरसे.....

अरे सरिता कब बादल बन बरस कर फिर सरिता में मिल गयी ....पता ही नहीं चला  :)
मन के भावो के रूप अनेक .....बधाई आपको ...

 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 19, 2012 at 6:25pm

अब तो एक बेवजह अनाम सफ़र है जारी,
किसी को गर्ज़ क्या हम हैरान रहे या तरसें,
यूँ भी...हम तो बादल हैं....
बरसे कभी नहीं बरसे.....

ish putri , saadar

aapki har rachna mujhe ek theme deti hai nayi rachna karne hetu. 

कभी पेड़ों औ कभी बस्तियों के जंगल में,
तलाश करते रहे वो ज़मीं जहाँ था कभी,
एक दरिया जो मेरा घर हुआ करता था,

itna kafi hai. badhai. 

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