दोहा सप्तक. . . . प्यार
प्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।
आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।
प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।
इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा अनुराग ।।
प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।
प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।
निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध ।
इसके भावों में छुपे, प्रेम गीत के बंध ।।
प्यार रूह इसरार की, प्यार नहीं इंकार ।
गहरा होता प्यार में, प्यार भरा अभिसार ।।
संकेतों में व्यक्त हो , मौन प्रणय मनुहार ।
कैसे फिर हो प्यार से, इस दिल को इंकार ।।
पावन सच्चे प्यार का, मिलनाहै संजोग ।
प्यार तपस्या रूह की, प्यार नहीं है भोग ।।
सुशील सरना / 16-2-26
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