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2122    1212    22

 

आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में

क्या से क्या हो गए महब्बत में

 

मैं ख़यालों में आ गया उस की

हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में

 

मुझ से मुझ ही को दूर करने को 

आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में

 

तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं

चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में

 

चाट कर के अफीम मज़हब की

मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में

 

ए ग़रीबी है शुक्रिया तेरा

जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत में

 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Jaihind Raipuri on March 3, 2026 at 1:04pm

ग़ज़ल 2122   1212   22

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है

कितने दुःख दर्द से भरा दिल है

ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती

पास उनके जो सुनहरा दिल है

ताज इक सब के मन के अंदर भी

और ये शह्र आगरा दिल है

दिल लगी दिल्लगी नहीं होती

इक गज़ब का मुहावरा दिल है

देख कर उनकी मदभरी आँखें

खो गया मेरा मदभरा दिल है

याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'

आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Comment by Jaihind Raipuri on February 5, 2026 at 9:44pm

क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी 

Comment by Jaihind Raipuri on February 5, 2026 at 11:27am

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला

आपकी हौसलाअफ़ज़ाई का आभारी हूँ 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2026 at 7:49am

आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक बधाई।

Comment by Jaihind Raipuri on February 4, 2026 at 6:52pm

ग़ज़ल 2122   1212  22

आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में

क्या से क्या हो गए महब्बत में

मैं ख़यालों में आ गया उसकी

हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में

मुझ से मुझ ही को दूर करने ये

आयी तन्हाई शाम ए फ़ुर्क़त में

तुम ख़यालों में आ जाते हो यूँ

चीन ज्यूँ आ गया था तिब्बत में

चाट कर के अफ़ीम मज़हब की

मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में

ऐ ग़रीबी है शुक्रिया तेरा

जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत में 

Comment by Jaihind Raipuri on February 4, 2026 at 12:20pm

 

आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन

बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला बढ़ाया

आपके अमूल्य इस्लाह से ग़ज़ल निखर गईं है आपके सारे इस्लाह मंज़ूर अलबत्ता

चीन ज्यूँ आ गया था तिब्बत में ' था ' टंकण त्रुटि थी बहुत बहुत आभारी हूँ आपका शुक्रिया 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 3, 2026 at 8:22pm

आदरणीय Jaihind Raipuri जी, 

अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें।

/आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में/

आदरणीय ये मिस्रा बहर में नहीं है। "शब-ए" का वज़न 12 होता है। इसे "शाम-ए-फ़ुर्क़त कहने से मिस्रा सहीह हो जाएगा।

 

2122  /  1212  /  22 

/तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं/

जी "जाते" में "जा" का मात्रा पतन नहीं किया जा सकता। "कोई", "मेरा", "तेरा" वगैरह को छोड़ कर, केवल शब्द के आखिरी दीर्घ अक्षर को ही गिराकर 1 मात्रिक किया जा सकता है। "तुम ख़्यालों में यूँ हो आ जाते"

/चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में/

 "चीन ज्यूँ आ गया था तिब्बत में"

/चाट कर के अफीम मज़हब की/

अफ़ीम

सादर

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