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दिनेश कुमार's Blog – February 2015 Archive (5)

ग़ज़ल -- तू मेरे लिए है न अजनबी ( बराए इस्लाह )

न तो मंज़िलों की तलाश है, न ही रास्तों की तलाश है

जो सँवार दें मेरी रहगुज़र , उन्हीं रहबरों की तलाश है



तू मुआफ़ करना मुझे ख़ुदा, मुझे मस्जिदों से न वास्ता

मेरे ज़ेहन में तो हैं तितलियाँ, मुझे ख़ुशबुओं की तलाश है



मेरी ख़्वाहिशें हैं दबी दबी, मेरी ज़िन्दगी है बुझी बुझी

मेरा इश्क़ आब-ए-हयात अब, मुझे जन्नतों की तलाश है



तू मेरे लिए है न अजनबी, मैं तेरे लिए हूँ न अजनबी

है हमारे बीच जो राब्ता, उसे क़ुर्बतों की तलाश है



कोई पास मेरे भी बैठता, मेरे… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 23, 2015 at 6:30am — 17 Comments

ग़ज़ल -- आया था जो भी ज़ेहन में काग़ज़ पे लिख दिया ( बराए इस्लाह )

तरतीब से सजे दर-ओ- दीवार घर नहीं

सुख दुख में जब कि साथ तेरे हमसफ़र नहीं



ऐसा नहीं कि राहे सफ़र में शजर नहीं

आसान फिर भी जिन्दगी की रहगुज़र नहीं



उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे

खुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं



रिश्तों की भीड़ में कहीं गुम हो गये सभी

अब रौनकें वो पहले सी, चौपाल पर नहीं



जीवन की भागदौड़, चकाचौंध में बशर

खोया है इस कदर उसे खुद की खबर नहीं



गुटका शराब पीते हैं अब सब के सामने

आया अजीब दौर है बच्चों को ड़र… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल -- सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

तब भी मुश्किल से घर चलाते हैं



ये विरासत में हमको सीख मिली

हम तो मेहनत की रोटी खाते हैं



शाम होते ही हम परिन्दों से

लौट कर अपने घर को आते हैं



जिनके सर पर खुदा का हाथ है वो

आँधियों में दिये जलाते हैं



रोज़-ए-महशर की छोड़ कर चिन्ता

रिन्द मयखाने रोज़ जाते हैं



मुझको दुनिया सराय लगती है

लोग आते हैं लोग जाते हैं



हम तो फुरसत में दिल के छालों को

शे'र के पर्दों में छुपाते… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 7:04am — 27 Comments

ग़ज़ल -- राम नहीं रावण देखा है

राम नहीं रावण देखा है

कलियुग का सज्जन देखा है



माली के ही हाथों उजड़ा

ऐसा भी उपवन देखा है.



काँप गया हूँ भीतर तक मैं

जबसे ये दर्पण देखा है



ढूँढ़ रही है बूढ़ी आँखें

क्या तुमने बचपन देखा है ?



हमने घर के बँटवारे में

रोता ये आँगन देखा है.



दिल का मोर खुशी को तरसे

इसने कब सावन देखा है



दूर कहीं अब धरती के संग

हम ने नील गगन देखा है



धनवानों का अक्सर मैंने

निर्धन अन्तर्मन देखा… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 15, 2015 at 7:47pm — 17 Comments

ग़ज़ल -- दिल है सीने से लापता शायद

दिल है सीने से लापता शायद

इश्क़ मुझको भी हो गया शायद



जिन्दगी उलझनों का नाम हुई

ले रहा इम्तिहाँ ख़ुदा शायद



बिन कहे वो मिरी करे इमदाद

ज़ेह्न में उसके कुछ पका शायद



हर घड़ी वो जो मुस्कुराता है.

जख़्म उसका कोई हरा शायद



झूठ को झूठ अब भी कहता मैं

मुझ में बाक़ी है बचपना शायद



रात भर करवटें बदलता हूँ

बोझ पापों का बढ़ गया शायद



कौन करता लिहाज़ अपनों का

जह्र रिश्तों में अब घुला शायद



नर्म लहज़े में आप… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 9, 2015 at 12:40pm — 33 Comments

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