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Ram Ashery's Blog – January 2016 Archive (5)

ज़िंदगी और मौत के बीच फासला कितना,

ज़िंदगी और मौत के बीच फासला कितना,

पता नहीं किसी को कब आ जाए फरिस्ता ।

मौत के सौदागर उगाते हैं घृणा की फसल

समाज में खड़ी करते हैं नफरत की दीवार ।

बुझाते सभी के सामने जलता हुआ चिराग

सोचो सच और झूठ में अंतर है कितना ॥

एक बंदा भरी में कुछ आंशू बहा के कहता

विश्वास करो मुझपर हूँ भरी सभा में कहता ।

आज हमारे समाज से मिट रही साहिस्णुंता

आज घोल रहे विष देश में कुछ हमारे नेता ॥

मैं तुम्हारे दुख की घड़ी में बेहद गम जुदा हूँ

कोई…

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Added by Ram Ashery on January 29, 2016 at 10:00pm — 3 Comments

सागर की लहरें

सागर की उठती गिरती लहरें, पथ पर चलना सिखा रही ।  

ढूंढती पल पल किनारा, मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं  ।  

सारी व्यथा अपने मन की आपस में एक दूसरे से कहती ।

सागर की गहरी शांति के विरुद्ध रौद्र रूप भरकर बहती ।

ख़तरों से आगाह कराती मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं   ।

हर काल परिस्थिति में हमको जीवन लक्ष्य बता देती ।

घायल, व्यथित खतरों से खेल, किनारों से दांस्ता कहती ।

संदेशा मानव को देकर कुछ खट्टे मीठे अनुभव कहती ।

आदि से लेकर अंत तक का लेखा…

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Added by Ram Ashery on January 29, 2016 at 3:00pm — 6 Comments

देखो कानून की परिभाषा कैसे बदल जाती है,

देखो कानून की परिभाषा कैसे बदल जाती है,

नेताओं को बेल और गरीब को जेल हो जाती है ।

यहाँ धनवानों का  सारा ऋण माफ हो जाता है,

किसान की ज़िंदगी ऋण में ही साफ हो जाती है ।

किसी बात पर यूं ही कभी इतबार मत करना,

घट जाए कोई घटना तो तकरार मत करना ।

विश्वास और धोखा एक ही सिक्के दो पहलू है,

एक जीने का मकसद और दूसरा छीन लेता है ।

चंदा और रोशनी एक दूजे के संग में घूम रहे ,

पर दिन में  एक दूसरे के विरुद्ध जंग लड़ रहे ।

गरीब का आरक्षण कुछ…

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Added by Ram Ashery on January 22, 2016 at 10:30pm — 1 Comment

दास्तां अपने धरा की

अजीब दास्तां दोस्तों अपने धरा की,

प्रति पल चलती पर दिखती है स्थिर।

बदलते मौसम बताते गति धरा की

पर बिगड़ने बनने से हम हैं बेखबर ।

ये ऊंचे ऊंचे पर्वत मस्तक धरा की

इनकी उपयोगिता से हम हैं बेखबर ।

मानव जीवन है श्रेष्ठ धरोहर धरा की

उत्थान की पराकाष्ठा से हम बेखबर ।

आज बिगाड़ रहा संतुलन धरा की

हर दिन हो रहे विनाश से बेखबर ।

ये बहती हुई नदियां शोभा धरा की

इनमें बढ़ते प्रदूषण से हम बेखबर ।

प्राण दायिनी वायु है शान धरा की

इसमें घुल रहे जहर से… Continue

Added by Ram Ashery on January 16, 2016 at 5:00pm — 3 Comments

वतन की शान

शिक्षा की जब ज्योति जले, विकसित होवे लोग।  

समाज को जब पंख मिले, खुशियाँ भोगें लोग ॥ 

भूख गरीबी जीत के, निर्भर हुआ अब देश ।

बोए बीज अब प्रेम के, प्रगति कर चला देश ॥  

गलत इरादे दुश्मन के, बढ़ा रहे अब क्लेश । 

हम रखवाले वतन के, जग को दे दो संदेश ॥  

परचम ऊंचा हो तभी, फैले चारों ओर । 

आन मान सम्मान सभी, करें साथ गठजोर ॥ 

करुणा सबके मन जगे, कोई दुखी न होय ।

हृदय से सब गले मिले, नफरत दूरी होय ॥

आतंकवाद के कष्ट को, जल्दी करेगे…

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Added by Ram Ashery on January 15, 2016 at 10:00pm — 5 Comments

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