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sandeep tomar
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"aapka swagat hai bhai"
Feb 23, 2013
बृजेश नीरज left a comment for sandeep tomar
"आपने मुझे मित्रता योग्य समझा इसके लिए आपका आभार!"
Feb 22, 2013
sandeep tomar commented on sanjiv verma 'salil''s blog post ढपोरशंख (लघुकथा) / संजीव ’सलिल’
"मजेदार बात  ये है कि जिन दो राहुलो की तुलना हो रही है उनमे कोई तुलना ही नहीं है फिर भी लघु कथा तो अपनी बात कह गयी। वह मज़ा आ गया पढ़कर "
Feb 19, 2013
sandeep tomar commented on sanjiv verma 'salil''s blog post ढपोरशंख (लघुकथा) / संजीव ’सलिल’
"लघु कथाकार जगदीश कश्यप की याद आती है जब वो नागरिक लघु कथा संग्रह में लघु कथा के तरीके बताते हैं "
Feb 19, 2013
sandeep tomar commented on SANDEEP KUMAR PATEL's blog post "ग़ज़ल "
"विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी ji आप खुद ही कह रहे है अधकचरी जानकारी। फिर क्या कहूँ   इतना जरुर  है की मुकम्मल गजल के लिए अआप दुष्यंत त्यागी को जरुर पढ़ें  हर तुकबंदी गजल नहीं होती तुकबंदी मई भी कर लेता हूँ पर मैं…"
Feb 18, 2013
sandeep tomar commented on SANDEEP KUMAR PATEL's blog post "ग़ज़ल "
"गजल लिखने में कुछ तरीके इस्तेमाल होते है जैसे अगर कोई शेर लघु मात्र से शुरू किया तो अगला शेर भी उसी मात्र से शुरू हो तो गजल सही है  अगर गजल  के शेर का पहला शब्द तीन अक्षर का है ओ हर शेर इअसे ही लिखे।   हर शेर की लम्बाई बराबर…"
Feb 18, 2013
Admin left a comment for sandeep tomar
"आदरणीय संदीप तोमर जी, आपने संदीप कुमार पटेल की ग़ज़ल पर लिखा कि ...... //ye gajal hai hi nahi fir admin ne ise kaise post karaya? isme kafiya radeef kuch bhi sahi nahi hai// मैं बताना चाहूँगा कि ओ बी ओ पर सभी सदस्य एक दुसरे से सीखते हैं, आपकी बातों…"
Feb 18, 2013
sandeep tomar is now friends with KISHAN KUMAR and बृजेश नीरज
Feb 18, 2013
sandeep tomar commented on SANDEEP KUMAR PATEL's blog post "ग़ज़ल "
"ye gajal hai hi nahi fir admin ne ise kaise post karaya? isme kafiya radeef kuch bhi sahi nahi hai"
Feb 18, 2013
sandeep tomar updated their profile
Feb 18, 2013
sandeep tomar posted a photo
Feb 18, 2013
sandeep tomar is now a member of Open Books Online
Feb 17, 2013

Profile Information

Gender
Male
City State
delhi
Native Place
delhi
Profession
teaching
About me
simple man

बिना शीर्षक

(१४ अगस्त को अलीगढ में किसानो पर की गयी बर्बरता पर लिखी गयी कविता )
बिना शीर्षक 

मौत का अर्थ 

 दृश्य का लुप्त हो जाना नहीं है
और अगर तुम
लुप्त हो भी गए तो
मुझे अफ़सोस नहीं
 तुम्हारी गुमसुदगी भी 
एक परचम है
गरीब के हृदय के लिए ;
 
तुम्हारा जाना
एक शाम हो सकता है
की फिर सुबह होगी 
फिर धुँआ उठेगा
फिर आग सुलगेगी 
और बन जाएगी मशाल ,
पथ पर उतरे 
जन सैलाब की/मुठ्ठिया तन जाएँगी 
दुश्मन की छाती पर ;
 
किसान के औजार 
बन जायेंगे हथियार 
गरीब की रोटी की भी होगी
अग्नि परीक्षा 
नंगे बच्चो का शरीर
मिटना ही है तो मिटेगा,पर
बेगार के लिए नहीं 
खुनी सियासत के लिए ;
अनाज पककर होगा लाल
की मजदूर की आँखें स्याह लाल
नारी की चीत्कार की
कहाँ गए उसके लाल;
 
अब पाना होगा जो कि नहीं है
अब खाना होगा जो कि नहीं है
अंधकार के बादल छटेंगे 
अब उजियारा होगा
तुम्हारी मौत व्यर्थ नहीं जाएगी
कि तुम्हारी गुमशुदगी भी
एक परचम है.
मौलिक और अप्रकाशित 

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At 8:20pm on February 22, 2013, बृजेश नीरज said…

आपने मुझे मित्रता योग्य समझा इसके लिए आपका आभार!

At 10:33pm on February 18, 2013, Admin said…

आदरणीय संदीप तोमर जी, आपने संदीप कुमार पटेल की ग़ज़ल पर लिखा कि ......

//ye gajal hai hi nahi fir admin ne ise kaise post karaya? isme kafiya radeef kuch bhi sahi nahi hai//

मैं बताना चाहूँगा कि ओ बी ओ पर सभी सदस्य एक दुसरे से सीखते हैं, आपकी बातों में गूढ़ता नजर आती हैं, आप बहुत ही जानकार लगते हैं, कृपया अपनी बातों को विस्तार दें, हो सकता है एडमिन से भी कोई भूल हुई हो, कृपया यथा शीघ्र |

 
 
 

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