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Sudhir Dwivedi
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घूँघट

“सुन री छोटी ! सीख कुछ मुझसे. जब देखो मुंह उघारे घूमती रहे है, घूँघट काढ़ा कर |” “ना जीजी हम नही बन सके तुम्हारे जैसे पर्देदार ! देखी हैं हम तुम्हारी नजर.. घूँघट के पीछे से घूरे है छुटके देवर जी का शरीर जब देखो तब |” “का फायदा ऐसे घूँघट का..?” देवरानी ने पलट जवाब दे मारा जेठानी पर |

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on May 14, 2015 at 11:39am — 19 Comments

देशभक्ति (लघुकथा)

"अरे इस बॉल पे तो चार रन बन जाते पर सब तो पेप्सी के एड से ही कमाते है..। देश जाए भाड़ में." रेस्टोरेंट में टी वी देखते हुए स्वदेश ने ज्यूँ ही बिल देखा।"अरे ये १४० रूपये टैक्स के क्यों जोड़ दिए कच्चा बिल ही बना देते।"

"पर बाबू जी इसी टैक्स से तो देश चले है। चुप कर जानता है कौन हूँ मैं ?" "सेल्स टैक्स की रेड पड़वा दी तो भूल जाएगा ये देशभक्ति।"

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on April 25, 2015 at 9:47am — 12 Comments

लेडीज फर्स्ट (लघुकथा)

“हमे औरत समझ के कमजोर मत आंकना | आज की औरत मर्दों से कमजोर नहीं है” मिसिज चौबे बस के दरवाजे पर खड़े युवक को हडकाते हुए अंदर घुसी ही थी, कि ठसाठस भरी बस में सामने एक सीट पर बैठे एक बूढ़े आदमी को कमजोर जान चिल्लाते हुए बोली |

“ओ बुढऊ ! कुछ शरम वरम है कि नही, उठो बैठना है हमे, जानते नहीं क्या..लेडीज फर्स्ट”

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Posted on April 18, 2015 at 3:30pm — 6 Comments

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At 4:10pm on April 10, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

At 11:40pm on April 9, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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