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सिंग्ल पैरेन्टस और बच्चों की परवरिश

 

चार दिवारी से मकान बनता है और उसमें रहने वाले लोंगों के आपसी प्रेम, सम्पर्ण, और सद्भावनाओं से एक मकान घर का रूप लेता है । (एक) घर हमें सिर्फ सुरक्षा ही नहीं देता बल्कि हमें संस्कार और संस्कृति से भी समृद्ध करता है । लेकिन आज के इस दौर में जहा एकल परिवारों (Nuclear family) का चलन बढ़ा है तो वहीं तलाक की चक्की में पिसते रिश्तों ने सिंगल पैरेन्ट्स की तादाद भी बढ़ा दी है । आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में भी सिंगल पैरेंट्स की संख्या बढ़ती जा रही है । ऐसी स्थिती में एक ओर सामाजिक ढाचा चरमरा रहा है दूसरी ओर बच्चों के सर्वांगीण विकास पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है । इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक ऐसी ज्वलंत समस्या है जो देश और समाज दोनो की जड़ों में दीमक लगा रही है । लेकिन उससे भी विकट स्थिती यह है कि आज समाज में जो स्त्रिी - पुरूष एकल अभिभावक की भूमिका निभा रहे हैं उनके बच्चे कभी शारीरिक रूप से तो कभी मानसिक रूप से दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं । ऐसी स्थिती में ज़रूरी है उन छोटी - छोटी बातों का ख़्याल रखने की जिससे बच्चों को सुरक्षित जीवन मिल सके और उनका शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक हर लिहाज से सम्पूर्ण विकास हो और वह भविष्य में एक जि़म्मेदार नागरिक के रूप में समाज में अपनी जगह बना सकें । इसलिऐ एकल अभिभावक की जि़म्मेदारी निभा रहे स्त्रिी व पुरूष को हमेशा इस बात का ख़्याल रखना चाहिऐ कि आप अपने व्यक्तित्व में मा और पिता दोनो की ही भूमिका साथ लेकर जियेंगे तभी बच्चे की परवरिश के साथ न्याय कर पायेंगे । इसलिऐ यह ज़रूरी है कि आप......

बच्चे के साथ समय बितायें - बच्चे सिर्फ खिलौने, किताबें या फिर अपनी आपका समय भी चाहते हैं जो ज़रूरी भी है और उनका हक भी है । महज़ ज़रूरतें पूरी कर देने भर से किसी भी अभिभावक की जि़म्मेदारी पूरी नहीं हों जाती । ख़ासकर तब जब आप एकल अभिभावक की हैसियत से पाल-पोस रहीं / रहे हों । इसमें कोई दो राय नहीं कि पुरुष की तुलना में एक स्त्रिी के लिऐ सिंगल पैरेंट्स की भूमिका का निर्वाह करना एक टेड़ी खीर है । क्यों कि आज भी समाज एक अकेली महिला को सम्मान की नज़र नहीं देखता । उस पर आस - पड़ोस के साथ - साथ कई बार घर परिवार के लोग भी बच्चे के दिमाग में उनके अभिभावक के प्रति ग़लत बातें भर देते हैं । इसलिऐ ज़रूरी है कि आप बच्चे के साथ अधिक से अधिक समय बितायें । उनके साथ खेले, उन्हें कहानियां सुनायें, बाहर घुमाने ले जायें, उनके होमवर्क में उनकी मदद करें, बच्चे की हाबीज़ के मुताबिक उसे आगे बढने के लिऐ प्रोत्साहित करें, प्यार दुलार से बच्चे की मन की बातें जाने । अपने बच्चे की उम्र के मुताबिक उसके बाल मन को समझने की कोशिश करें । इससे बच्चा अकेलापन भी महसूस नहीं करेगा और आपके प्यार की गर्माहट उन्हें हमेशा आपके नज़दीक रखेगी ।

बच्चों को आत्मनिर्भर बनायें - यदि आप अकेली ही बच्चों का लालन - पालन करती हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि आपको आर्थिक रूप से भी स्वयं को मज़बूत करने के लिऐ कोई व्यवसाय या नौकरी भी करनी होगी । ऐसी स्थिती में घर और बाहर की सारी जि़म्मेदारी आप ही का निभानी हांेगी । इसलिऐ ज़रूरी है कि यदि बच्चों को बाल अवस्था से ही आत्मनिर्भर बनायें । मसलन जो सामान जहा से उठायें उसे वहीं पर रखें, अपने कपड़े, जूते, स्कूल बैग, किताबें, खिलौने आदि को सलीके से रखें । यदि आपके एक से अधिक बच्चे हैं तो अपने बड़े बच्चे को आप सिखा सकती हैं कि वह छोटे भाई - बहिनों का वह होमवर्क कराये तो वहीं उसके छोटे भाई - बहिनों को सिखायंे कि वह अपने बड़े भाई - बहिन की बात माने । लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि आपका बड़ा बच्चा भी अभी महज़ एक बच्चा है इसलिऐ उसे आत्मनिर्भर बनाने के चक्कर में उस पर बहुत अधिक जि़म्मेदारी न थोपें । उसे वही काम सौंपें जिसे वह सहज ढंग से कर सके और आपको भी मदद मिल सके । उम्र के मुताबिक यदि बच्चे   आत्मनिर्भर होंगे तो आपको भी थोड़ा वक़्त मिलेगा जो आप अपने ही बच्चों के साथ बांट सकेंगी ।

अपने बच्चे की दोस्त बनें - एकल अभिभावकों को दोहरी भूमिका निभाने के साथ - साथ बहुत अधिक जि़म्मेदारियों का निर्वाह भी करना होता है । इस कारण मानसिक और शारीरिक दोनो ही स्तरों पर अतिरिक्त दबाब बढ़ जाता है । और आप न चाहते हुऐ भी बच्चों के साथ या तो बहुत सख़्त हो जाती हैं या फिर बेहद चिड़चिड़ी हो जाती हैं । बेहतर है कि आप समय - समय पर ख़ुद को इस बात का एहसास दिलाती रहे कि आपके अकेलेपन का जि़म्मेदार आपका बच्चा नहीं है । बल्कि यह बच्चे ही हैं / बच्चा ही है जो आपके अकेले जीवन का साथी है । इसलिऐ उसके प्रति अपना दोस्ताना व्यवहार रखें । उसके साथ बैठकर उसकी दिनचर्या सुने, उसके दोस्तों की बातें पूछें तो कभी बस ख़ुद बच्चा बन उसके जीवन को समझने की कोशिश करें । खासकर जब बच्चा किशोरावस्था से गुज़र रहा हो तो बच्चों के साथ नज़दीकी बढ़ाने के लिऐ उनसे दोस्ती करें । यह कभी न सोचें कि आप मा हैं तो आप बच्चे के बारे में सब जानती हैं । यह सोच कई बार आपके और बच्चे के बीच भ्रम की स्थिती पैदा कर देती है और आपके व बच्चों के बीच दूरी बन जाती है । इसलिऐ यह जानने की कोशिश ज़रूर करें कि आपके बच्चे को क्या पसंद है और क्या नहीं । साथ ही साथ इस बात का भी ख़्याल रखें कि आपका बच्चा आपके अपनेपन और प्यार को महसूस कर सके और यह तभी सम्भव होगा जब आप एक माॅ होने के साथ - साथ उनकी विश्वासपात्र दोस्त भी बनेगी (Best Friend)।

बच्चों पर विश्वास करें -  कई बार बच्चे इस बात की शिकायत करते हैं कि ‘‘मम्मी आप हमारी सबसे अच्छी दोस्त तो है लेकिन हम पर भरोसा नहीं करती ।‘‘ बच्चों का यह वाक्य आपको झिंझोड़ देता है और आप सोच में पड़ जाती हैं कि आखिर कहा कमी रह गई कि बच्चे ऐसी शिकायत कर रहे हैं ? यह सच है कि आप बच्चों की बहुत अच्छी दोस्त हैं लेकिन यदि आपने उनमें भरोसा नहीं जताया तो वह भी आप पर भरोसा नहीं कार पायेंगे । इसलिऐ अपने व्यवहार, बातों और भाषा से जताइये कि आप उन पर भरोसा करतीं हैं । साथ ही साथ इस बात का भी ख़्याल रखिये कि बच्चों को कभी क्रास चैक न करें । उनकी कही बात की पुष्टी कभी किसी और से या उनके दोस्तों से उनके सामने न करें । बच्चे को कभी यह कहने का मौका न दें कि ‘‘मम्मी अगर आपको मुझ पर भरोसा नहीं है तो आप मेरे दोस्तों से पूछ लें ।’’ इस प्रकार के वाक्य जब आपका बच्चा कहता है तो वह मानसिक रूप से जानता है कि आप उस पर भरोसा नहीं करती । इसलिऐ बच्चे की कही बात की पुष्टि और अपना संदेह मिटाने के लिऐ आप बच्चे पर भरोसा जताते हुऐ उसके दोस्तों और ख़ुद बच्चे से खेल - खेल में जाने । समय - समय पर स्वयं बच्चों से कहें भी कि आप उन पर भरोसा करती हैं और आपको विश्वास है कि आपके बच्चे उनसे झूठ नहीं बोलेंगे । ऐसे वाक्य बच्चों का मनोबल बढ़ाने के साथ - साथ उन्हें विश्वासपात्र भी बनायेंगे ।

बच्चों का सम्मान करें - कई बार हम यह सोच लेते हैं कि बच्चे भला मान -सम्मान या अपमान को क्या जानें । इन्हें भला कहां इतनी समझ कि यह इज़्जत और बेइज़्ज़ के फर्क को महसूस कर पायें । यदि कर सकते तो यह बच्चों की तरह नहीं बल्कि बड़ों की तरह व्यवहार करते । हमारी यह सोच पूर्णतः ग़लत है । याद रखिये बच्चे भोले होते है लेकिन इसके बावजूद भी वह अपमान और सम्मान के बीच के फर्क को ख़ूब समझते हैं । हमें यह नहीं भूलना चाहिऐ कि जब बच्चे प्यार और अपमान में फर्क करना जानते हैं तो वह इज़्ज़त और बेइज़्ज़ी के फर्क को भी खूब समझते हैं । गोद में खेलने वाला नन्हा शिशु भी इन भावों को खूब समझता है । इसलिऐ एकल अभिभावकों को इस बात का ख़ास ख़्याल रखना चाहिऐ कि वह ग़लती से भी कभी बच्चे को ताने न दें, उन्हें बोझ या बंदिश न समझें अपने जीवन के लिऐ । इसमें कोई शक नहीं कि जो महिलाऐं सिंगल पैरेन्ट के रूप में बच्चों की देखभाल करती हैं उन्हें घर बाहर की दुनिया संभालने के साथ - साथ सामाजिक दबाव और व्यंग वाणों को भी झेलना पड़ता है । ऐसी हालत में मन का गुबार बच्चों पर निकल जाता है और कुछ ऐसे अपमानजनक वाक्य मसलन ‘‘तुम तो अपने बाप की थोपी हुई जि़म्मेदारी हो वह तो सब छोड़कर भाग खड़े हुऐ और मुसीबत मेरे गले बाॅध गये । ’’ इस प्रकार के वाक्य बच्चों के मन - मष्तिषक पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं और बच्चे मानसिक रूप से खुद को दोषी मानने लगते हैं । इसलिऐ जब भी बच्चों पर गुस्सा आये या फिर किसी और का गुस्सा बच्चे पर निकले उस समय सिर्फ इतना सोचिये कि अगर आज यह बच्चे / बच्चा आपकी जि़न्दगी में न होता तो आप कितनी अकेली होती । बच्चे आपका अकेलापन दूर कर आपके जीवन को एक मकसद देते हैं । उनका प्यार आपके एकाकी जीवन में रंग भरता है इसलिऐ बच्चों को प्यार के साथ - साथ सम्मान भी दें और उन्हें दूसरों की इज़्ज़त करना भी सिखायें ।

अपने काम के विषय में बतायें-  बच्चों की देखभाल करना और साथ समय बिताना आपके लिऐ जितना ज़रूरी है उतना ही ज़रूरी है आपका आर्थिक रूप से स्वाबलंबी होना । बच्चों की बेहतर जि़न्दगी और उनकी शिक्षा के लिऐ आपको ही धन अर्जित करना होगा आप किसी और पर निर्भर नहीं रह सकती । इसलिऐ यदि आपके बच्चे दस - बारह साल के हैं तो आप उन्हें अपने काम के बारे में बतायें इससे उन्हें इस बात का एहसास रहेगा कि उनकी मां उनके बेहतर जीवन के लिऐ ही घर से बाहर रह कर काम करती है । कई बार स्थिती इतनी विकट होती है कि बच्चा सिर्फ दो - तीन साल का ही होता है और मां को काम पर जाना पड़ता है । इस विकट स्थिती में आप अपने बच्चे को यह बतायें कि आप उसके खिलौनो, टाफी, और नये - नये कपड़ों के लिऐ काम पर जाती हैं । हांलाकि इतनी छोटो उम्र में बच्चे को कुछ भी समझाना बहुत मुश्किल होता है पर आपको कोशिश करनी ही पड़ेगी । क्यो कि कई बार पास - पड़ोसी और रिश्तेदार बच्चे के सामने कुछ ऐसी बाते बोलते हैं मसलन ‘‘मां तो सारा दिन घर से बाहर रहती है और बच्चे को दूसरों पर छोड़ जाती है ।’’ या फिर ‘‘तुम्हारी मां तो अकेले - अकेले घूमने चली जाती है और तुम्को घर पर छोड़ जाती है ।’’ ऐसे वाक्य बच्चे के नाज़ुक मन पर नकारात्मक प्रभाव तो डालते ही हैं साथ ही मां और बच्चे बीच दूरी बड़ा देते हैं । इसलिऐ अपने बच्चे को अपने काम के बारे में बताने के साथ यह भी एहसास करायें कि आप अपने बच्चे की बेहतर जि़न्दगी के लिऐ घर से बाहर काम पर जाती हैं । इससे आपके बच्चे के मन में आपके प्रति प्रेम और आदर भाव जागृत होगा ।

बच्चों को पैसे की अहमियत बतायें - पैसे हमारे वर्तमान की ज़रूरतें पूरी करता है लेकिन भविष्य को समृद्ध बनाता है । इसलिए अपने बच्चों को पैसे की अहमियत समझायें और उन्हें बचत करना सिखायें फिर चाहे वह दस रुपय ही रोज़ अपनी गुल्क में क्यों न डालें । इससे उनमें पैसा बचाने की आदत जन्म लेगी । एकल अभिभावकों यह बात कभी नहीं भूलना चाहिऐ कि उनकी व बच्चों की ज़रूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ आपको ही पूरी करनी है । इसलिऐ न तो खुद ही पैसे को फिजूल ख़र्च करें और नही बच्चों को करने दें । बच्चे यदि छोटे हैं तो आप उनके लिऐ ऐजुकेशन पाॅलिसी ले सकती हैं बैंक में एफ डी आदि करा सकती हैं इससे पैसे की बचत भी होगी और भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर आपको किसी के आगे हाथ भी नहीं फैलाना पड़ेगें ।

घर में नौकर पूरी जांच पड़ताल के बाद ही रखें - एकल अभिभावकों को घर में मदद के लिऐ एक हैल्पिंग हैंड की ज़रूरत हमेशा होती है फिर चाहे आप अपने बच्चे के साथ अपने माता - पिता के घर में रहें या फिर अकेले रहें । इसलिऐ घर में नौकर रखने से पहले उसकी पूरी जांच पड़ताल कर लें । जिसमें सबसे अहम है नौकर का पुलिस वैरीफिकेशन होना । आजकल कई ऐसी प्लेसमैंट एजेंसी भी बाज़ार में उपलब्ध हैं जो होम सर्वेंट की सुविधा मुहय्या कराती हैं और साथ ही यह नौकर का पुलिस वैरिफिकेशन कराने की भी जि़म्मेदारी लेती हैं । लेकिन एक बात हमेश याद रखिये कि घर में जब भी कोई नौकर रखें तो उसका पुलिस वैरिफिकेशन स्वयं करायें और कुछ महत्वपूर्ण बातों का ख़्याल अवश्य ख़्याल रखें । जैसे......

1.   नौकर का स्थाई पता (Parmanent Address), उसके माता - पिता का फोटो, काम पर आने वाले व्यक्ति के उस घर का पता जहॅा वह रह रहा है और उसके किसी एक जानने वाले का पता भी उससे मांगे ।

2.   नौकर चाहे लड़का हो या लड़की उससे इस बात की पुष्टि पहले ही कर लें कि वह कोई नशा तो नहीं करता । क्यों कि यदि नौकर किसी भी प्रकार का नशा करता होगा तो इससे आपके बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा ।

3.   घर के काम के लिऐ आने वाले व्यक्ति का चाल चलन कैसा है ? वह पहले कहाॅ काम करता था और काम क्यों छोड़ा साथ ही नौकर के पुराने मालिक नाम पता भी ज़रूर जाने । इससे आपको काम पर आने वाले व्यक्ति के विषय में काफी कुछ जानकारी मिल जायेगी ।

4.   काम पर आने वाले नौकर से नौकरी पर आने से पहले ही उसकी पोस्ट कार्ड साइज़ की फोटो, वोटर आई डी कार्ड / राशन कार्ड / या फिर बैंक के पास बुक की फोटो काॅपी मांग कर अपने रिकार्ड में अवश्य रखें ।

5.   घरों में काम करने वाले लड़के लड़कियां ज्यादातर दूसरे शहरों या प्रान्तों से आते है। तो ज़ाहिर सी बात है कि वह अपनी तनख्वाह का कुछ भाग अपने गाॅव या शहर भेजेंगे । इसलिऐ कभी कभार उनके साथ डाकघर या बैंक जा कर पता करें कि वह किस पते पर पैसा मनिआॅर्डर कर रहा है । इससे फायदा यह होगा कि आपको उसके स्थाई पते को क्राॅस चैक करने का मौका मिल जायेगा ।

घर में सिर्फ नौकर रखते वक्त ही सावधानी बरतने की ज़रूरत नहीं है बल्कि जब नौकर घर में काम पर आ जाये तब कुछ ज़रूरी बातों की सावधानी बरतना बेहद ज़रूरी है क्यों कि आपकी गैर मौजूदगी में आपका बच्चा नौकर के ही पास रहेगा । इसलिऐ इन बातों का ध्यान हमेशा रखें जैसे -

6.   यदि आपके बच्चे नौकर के बारे में कुछ कहते हैं या शिकायत करते हैं तो उसे शान्तिपूर्ण ढंग से सुने और उस पर कड़ी नज़र रखें । कई बार घर में काम करने वाले नौकर नौकरानी बच्चों का यौन शोषण कर उन्हें मारपीट कर धमकाते हैं इसलिऐ अपने बच्चे पर हमेशा भरोसा करिऐ और उनकी बातों को नज़र अंदाज़ मत करिऐ ।

7.   नौकर के सामने कभी भी बच्चे को डांटे या मारे नहीं वर्ना कई बार नौकर इसका फायदा उठाकर अपनी ग़लतियां छोटे बच्चों के सर मड़ देते हैं ।

8.   अपने पड़ोसियों से अच्छे संबद्व रखें जिससे वह आपकी अनुपस्थिती में नौकर पर नज़र रखें ।

यह बातें बहुत अव्यवहारिक सी लगती हैं लेकिन यदि हम थोड़ा सर्तक रहेंगे तो घर में काम करने वाले नौकर हमारे हैल्पिंग हैंड बनकर रहें और हमारे हाथ नहीं काटेंगे ।

घर की सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम रखें - दिन-ब-दिन बढ़ते हादसों ने सुकून की जि़न्दगी छीन ली है इसलिऐ अपने घर की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखें । आजकल बाज़ार में अनेक ऐसे उपकरण मौजूद हैं जो आपके घर को सुरक्षित रखने के लिहाज़ से काफी कारगर साबित हो सकते हैं । बाज़ार में मिलने वाली कैमरा डोर बैल (दरवाज़े की घन्टी)। सिक्याॅरिटी अलार्म लगवायें जिससे घर में यदि कोई हादसा हो तो अलार्म बज उठे और पास पड़ोस के लोग आपकी व बच्चों की मदद के लिऐ आ सकें । घर के मेन गेट पर लड़की के साथ साथ आप लोहे का जाली वाला गेट भी ज़रूर लगवायें यदि आपका घर ग्राउन्ड फ्लोर पर है तो आप बालकनी आदि में भी इस आयरन गेट का प्रयोग कर सकती हैं । अपने बच्चों को अपना मोबाइल नंबर के साथ आॅफिस नम्बर भी दें साथ ही पड़ोसियों और कुछ नज़दीकी रिश्तेदारों के भी नंबर ज़रूर दें ।  बच्चों को पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर और फायर ब्रिगेड के 101 नंबर की जानकरी अवश्य दें जिससे कोई अप्रिय घटना होने पर बच्चा इन नंबरों से मदद माग सके । अपने बच्चे को यह ज़रूर समझायें कि आपकी गैर हाज़री में वह न तो किसी अन्जान व्यक्ति के लिऐ दरवाज़ा न खोलें और न ही आपके मित्र के लिऐ दरवाज़ा खोलें । जब आप घर से बाहर काम पर हों तो हमेशा अपने बच्चे से आप फोन पर बात करती रहें और उससे उसका व घर का हाल जानती रहें । 

रिश्तेदारों और मित्रों पर कड़ी नज़र रखें - किसी भी रिश्ते का आधार विश्वास होता है लेकिन मित्रों व रिश्तेदारों पर विश्वास उतना ही करें जिसमें शक की गुंजाइश भी रहे वर्ना कई बार हमारा अंधा विश्वास हमारे बच्चे के जीवन के लिऐ खतरनाक साबित हो जाता है फिर चाहे वह रिश्ते खून के ही क्यों न हों । आज समाज में ऐसे तमाम किस्से सुनने को मिलते हैं कि घर के ही सदस्स ने बच्चे का यौन शोषण किया । जिस समाज में पिता ही अपने बच्चों को यौन शोषण करने में शर्म न महसूस करता हो वहां किसी और से क्या उम्मीद कर सकते हैं । इसलिऐ यदि आपका बच्चा किसी के विषय में आपसे कोई बात कहता है या फिर कोई शिकायत करता है तो उसे ध्यान से सुने और बच्चे को दोषी ठहराये बगैर उसका सहारा दें । याद रखिये बच्चे किसी की न तो बेवजह बुराई करते हैं और न ही वह किसी का शोषण करते हैं इसलिऐ उनकी कही बातों के प्रति हमेशा सचेत रहें । समय - समय पर अपने बच्चे से भी लोगों के व्यवहार के विषय में पूछती रहें ।  

                                                                                                                                              मोनिका जैन “डाॅली”

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Replies to This Discussion

         

        

मोनिकाजी, बहुत बधाई, सामाजिक सरोकार से जुडी
हर सोच हमारी सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखने
के लिए बहुत जरूरी है | आजके टूटते संयुक्त परिवारों
में बच्चे की परवरिश सही नहीं हो प् रही है | ऐसे इस
प्रकार के चिंतन की सख्त आवश्कता है | बच्चो का सही
लालन-पालन करना, उन्हें संस्कारवां बनाना, पराक्रमी
और देश का सुयोग्य नागरिक बनाना है, तो सिंगल
माता-पिता की अहम् जिम्मेदारी खास तौर से माँ
जिसे हमारे देश में मात्र-शक्ति कहते है, और भी अधिक है |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

Dhanyavaad Lakshman ji,

Aapke protsaahan ke liye shukriya parantu aapse ek aur guzarisha hai ki kripa kar ke mujhe ye bhi batayen ki aise singal parent ke prati samaaj ka ya ravaiyya hota hai aur kese wo aise logo ke saath bartaav karta hai.

मोनिकाजी, 
एकल परिवार और संयुक्त परिवारों में बच्चे की परवरिश में बड़ा .
अंतर है | मै आपने दोनों लडको के साथ संयुक्त रूप से रह रहा हूँ |
मेरे मोहल्ले में अधिकांश परिवार वर्तमान में एकल परिवार है |
एक श्रीमन मुथाजी एक दिन बोले "मै मेरी श्रीमतीजी को कहता 
हूँ देखो लडिवालाजी के बच्चे और पोते कितने खुश नसीब है क़ि
उन्हें दादा-दादी का प्यार मिल रहा है |" मेरा दोनों पोते और पोती 
रात्रि को जब तक मै कहानी नहीं सुनाता, तब तक सोते नहीं है |
     फिर भी अब एकल परिवारों में सिक्षा के प्रसार, आप जैसी 
लेखिकाओ के धनात्मक लेख से हमें आशा करनी चाहिए क़ि एकल 
परिवार में बच्चे के माता-पिता  बच्चे को संस्कारी करने का प्रयास 
करेंगे,उन्हें कहानिया सुनाने, बच्चो के साथ समय बिताने,घुमने 
ले जाने, दोस्ती क़ि पहचान करने, बड़ो का आदर करने, अपनी सुरक्षा 
करने, सलीके से पढने, खाने, उठने-बैठने आदि तरतीब सिखाने का 
पृं प्रयास करेंगे, ताकि आज नहीं तो कल पुनः सुंयुक्त परिवार का 
महत्त्व समझ सके और बूढ़े लोगो को पश्चात देशो क़ी तरह वृद्धावस्थ 
आश्रम क़ी तरफ पलायन न करना पड़े | मुझ अपनी बात कहने का 
मौका देने के लिए धन्यवाद | -लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

Manyavar aapne punah is Aalekh apr tippani ki iske liye dhanyavad parantu me yaha ek baat zaruru kahungi ki mera Aalekh Ekal ya Sanyukt parivar par nahi hai balki aisi Mahila aur Purusho se juda hai jo akele hi bachcho ka laalan paalan kar rahe hai. is vishay par me pathko ki Tippani chahti thi parntu yaha shayad Samajik Sarokar se jude Aalekho par kuchh khas dhyan nahi jata pathko ka khai apni apni ruchi hai. aapne apne vichar diye iske liye punah Dhanyavaad.

Saprem

Monika

मोनिकाजी, 

आपके लेख को पूरी  तरह पढ़ लेने के बाद भी और आपका 
मकसद एकल अर्थात स्त्री या पुरुष में से किसी एक के द्वारा 
ही बच्चे का लालन-पालन करने के बारे में है, जानबूझ कर 
सिंगल की जगह एकल शब्द प्रयोग में लिया | क्योकि आज 
भी भारत में समाज में सिंगल स्त्री या पुरुष में से किसी एक 
के द्वारा स्वयं का जीवन यापन करना भी मुश्किल है | बच्चे 
पलना तो और भी कठिन है | क्योंकि घर में बच्चो को किसके
भरोसे छोड़ कर जावे | नौकर की पूरी जाँच पड़ताल के बाद भी 
क्या कोई उसके आचरण, स्वाभाव की गांरंटी दे सकता है ?
मानव स्वाभाव में कब विकृति आ जावे, इसकी क्या गारंटी
है | हां, जहाँ तक हो आप द्वारा सुझाये सुरक्षा और सावधानी 
बरतने पर जरूर ध्यान देने के आवश्यकता है | पर ऐसे लोगो
को और समाज को शिक्षित करने की ओर न तो समाज का 
ध्यान है और न ही सरकारों का कोई कर्य्द्रम है | इसलिए इस 
विषय पर आवश्कता है एक ऐसा संगठन बनाने की जो इस 
कार्य में शिक्षित करने, मदद करने, असुरक्षित सिंगल परिवार
को सुरक्षा की द्रष्टि से कोई आश्रम या आश्रय देने जैसा गुरुत्तर
कार्य कर सामाजिक कल्याण का कार्य करने का बीद उठा सके |
अंत में मै यही कहूँगा कि इस प्रकार के सामाजिक सरोकार 
जैसे विषय पर आप अधिक टिपण्णी कि उम्मीद न करे | मै 
एक सामाजिक कार्यकार्त रहा हु इसलिए यह मेरे लिए तो रूचि 
का विषय था, पर उसको मैंने यु टार्न देते हुए सुरक्षा के मामले 
लेते हुए पूर्व टिप्पणीं करी, क्यों कि काफी हद तक एकल परिवारों 
में भी दादा-दादी के बैगर सिक्षा, सुरक्षा आदि कि समश्याए आ रहे 
है | और मुझे लिखने का बहाना मिल गया था | आपका इस प्रकार 
कालिख लिखने कि हिम्मत करने के लिए मेरे हार्दिक धन्यवाद | 

मोनिका जी

सामाजिक सरोकार में आपके लेख को आखिर अख़बार की 

सुर्खियों में स्थान मिला, इससे आपके लेख का महत्त्व स्वतः 

ही स्पष्ट हो गया, हार्दिक बधाई | आपके लेख सिंगल परिवार 

पर उन सिंगल परिवारों की प्रतिक्रिया मिलाने पर सही आभास

और मूल्यांकन हो पायेगा | इस  विषय पर तो कोई शौध (ph.d) भी कर 

 सकता है 

 Laxman Prasad Ladiwala 

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