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बा-बह्र ग़ज़ल लिखने के लिए तक्तीअ  ही एक मात्र अचूक उपाय है, यदि शेर की तक्तीअ करनी आ गई तो देर सबेर बह्र में लिखना भी आ जाएगा क्योकि जब किसी को पता हो कि मेरा लिखा शेर बह्र में नहीं है तभी उसे सही करने का प्रयास करेगा और तब तक करेगा जब तक वह शेर बह्र में न हो जाए

मात्राओं को गिनने का नियम न पता होने के कारण नए लोग अक्सर बह्र निकालने में या तक्तीअ करने में दिक्कत महसूस करते हैं

कुछ शब्दों को उनके रुक्न के साथ लिखा जा रहा है जिससे आपको रुक्न का विज्ञान समझने में आसानी हो

जैसे बोला जाता है (शुद्ध उच्चारण)  मात्रा भी वैसे ही निकलती है -

राम = २ १

मारा = २२

मरा  = १२

मर = २

सत्य = २१

असत्य = १२१

झूठ = २१

सच = २

सच्चा = २२

आमंत्रण = २२२

राधा = २२

श्याम = २१

आपको = २१२

ग़ज़ल = १२

मंजिल = २२

नंग = २१

दोस्त =  २१

दोस्ती = २१२

राष्ट्रीय = २१२१

जुर्म = २१

हुस्न = २१

जिक्र = २१

फ़िक्र = २१

मित्र  = २१

 

एक नियम है कि यदि किसी शब्द के अंत में बिना मात्रा का व्यंजन आ रहा है और उसके तुरंत बाद का शब्द स्वर से शुरू हो रहा है तो व्यंजन और स्वर का योग किया जा सकता है सकता है | जैसे -

रात आ = २१   २

को

रात+आ = राता = २२ भी किया जा सकता है 

अन्य उदाहरण देखें -

हम और तुम = २ २१ २

हमौर तुम  = १२१२

 

तंग आ चुके = २१ २ १२

तंगा चुके = २२ १२

 

इस नियम को "अलिफ़ वस्ल" कहते हैं (जरूरी नहीं है कि हर जगह अलिफ़ वस्ल हो ही, अक्सर बह्र को निभाने के लिए ऐसा करना पडता है)

एक मशहूर शेर में दोनों स्थिति एक साथ देखें -

दिल -ए- नादाँ तुझे हुआ क्या है

आखिर इस दर्द कि दवा क्या है

- मिर्ज़ा ग़ालिब

(बह्र ए खफीफ : २१२२ १२१२ २२  : ला ल ला ला / ल ला ल ला / ला ला  )

 

दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है  

(इस मिसरे में "दिल ए" को वस्ल नहीं किया गया है क्योकि बह्र कि यह ही मांग थी {"ए" को गिरा कर लघु माना गया है} )

आखिर इस दर्द कि दवा क्या है  (इस मिसरे में {आखिर इस" २२ २} को {आखिरिस २१२}  अलिफ़ वस्ल किया गया है )

 

अब इसके आगे मैं अपने उस्ताद श्री पंकज सुबीर जी की एक पोस्ट का अंश लगा रहा हूँ आशा करता हूँ कि आपको इस पोस्ट से और गुरुदेव की पोस्ट के अंश से तक्तीह प्रणाली को समझने में आसानी होगी  ---

 

पोस्ट का अंश (लेखक श्री पंकज सुबीर)

कैसे ऐसा हो जाता है कि कोई दीर्घ मात्रा, लघु हो जाती है और दो लघु मात्राएं मिलकर दीर्घ हो जाती हैं । दरअसल में ग़ज़ल में असल खेल तो बस ये ही है । चलिये कुछ क्रमांक के हिसाब से बात करें ताकि आसानी रहे


क्रमांक 1 :- दो लघु मिलकर दीर्घ हो जाना ये हमेशा नहीं होता है पर जहां पर उच्‍चारण में ऐसा हो रहा हो कि दो लघु एक साथ बोले जा रहे हों और दीर्घ की ध्‍वनि उत्‍पन्‍न कर रहे हों वहां पर उन दोनों को  एक दीर्घ मान लिया जाता है । जान लें कि तुम, हम, दिल, कब, अब, जिस, कर, पर, मिल, खिल, जैसे शब्‍दों को दो लघु नहीं कहा जाता बल्कि एक दीर्घ में गिना जाएगा । जैसे 'मुझसे' में 'मुझ' जो है वो एक दीर्घ है और 'से' पुन: एक दीर्घ अत: मुझसे को दो दीर्घ में गिना जाएगा । हां उच्‍चारण के हिसाब से कभी कभी बाद का जो से है वो गिर कर एक लघु हो सकता है ।

 

क्रमांक 2 :- दीर्घ का उच्‍चारण में गिरकर लघु हो जाना आपने देखा होगा कि ग़ज़ल में अक्‍सर 'मेरी' या 'तेरी' को 'मिरी', 'तिरी' लिखा जाता है ये दरअस्‍ल में उच्‍चारण के चलते होता है । बात बहुत सीधी है कि जैसी ज़रूरत हो वहां पर वैसा कर लो । चाहे तो अगर आपको ग़ज़ल में दो दीर्घ एक के बाद एक लग रहे हों तो कहिये 'मेरी' अर्थात दो दीर्घ । अगर एक लघु और एक दीर्घ की ज़रूरत हो तो कहिये 'मिरी' अर्थात एक लघु और फिर एक दीर्घ । कई बार तो एसा भी होता है कि पूरा का पूरा शब्‍द 'और' (एक दीर्घ और फिर एक लघु ) को केवल एक दीर्घ की जगह पर उपयोग करते हैं मगर उच्‍चारण करते समय उसे 'और' न कह कर 'उर' कहते हैं अगर कोई उर कह रहा है तो समझ लिया जाता है कि एक दीर्घ की जगह पर और को लगाया जा रहा है । सबसे ज्‍़यादा जो गिरते हैं वो होते हैं मैं, में, वो, तो, जो, ये इस तरह के शब्‍द इनका कुछ भरोसा नहीं होता कि कब ये दीर्घ हो जाएं और कब लघु ।

एक ग़ज़ल है –

तू मेरी बेबसी का हाल मुझये पूछता क्‍या है

मेरी तक़दीर में ग़म के सिवा लिक्‍खा हुआ क्‍या है

इसका वज्‍़न है    

ललालाला-ललालाला-ललालाला-ललालाला

या

मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन

या

 लघुदीर्घदीर्घदीर्घ-लघुदीर्घदीर्घदीर्घ-लघुदीर्घदीर्घदीर्घ-लघुदीर्घदीर्घदीर्घ

या

1222-1222-1222-1222

 

 अब कहने को तो मैंने कह दिया कि 1222 मगर देखा जाए तो शुरूआत ही तू से हो रही है अर्थात दीर्घ सक मगर ये दीर्घ बिचारा गिर गुरा के हो गया है लघु और उच्‍चारण में इसको यूं शुरू किया जाएगा 'तु मेरी बेबसी का हाल....... तु होने के कारण ही ये हो गया है लघु एक मज़ेदार बात  देखें जो कि आपको ग़ज़ल की स्‍वतंत्रता समझने में मदद करेगी ऊपर का ही शे'र है तू मेरी बेबसी का हाल मुझसे पूछता क्‍या है, मेरी तक़दीर में ग़म के सिवा लिक्‍खा हुआ क्‍या है अब मिसरा उला ( पहली पंक्ति) में 'मेरी' का वज्‍़न है 22 दीर्घदीर्घ क्‍योंकि वहां पर फाई है दो दीर्घ ही चाहिये । अब देखें मिसरा सानी (दूसरी पंक्ति ) इसमें मेरी से शुरूआत हो रही है और यहां पर इस मेरी का वज्‍़न हो गया है 12 लघु दीर्घ क्‍योंकि मुफा की आवशयकता है । ये गज़ल आज मैंने इस लिये ही ली है कि आपको शब्‍दों का खेल समझ में आ सके ।

ग़ज़ल को तोड़ कर पढें  -

तु मेरी बे –  मुफाईलुन   -ललालाला

बसी का हा -  मुफाईलुन - ललालाला

ल मुझसे पू – मुफाईलुन - ललालाला

छता क्‍या है – मुफाईलुन - ललालाला

यहां एक और बात देखें कि 'क्‍या' को यहां पर एक दीर्घ माना जा रहा है ऐसा क्‍यो हो रहा है ये क्रमांक तीन में देखेंगें।

 

क्रमांक 3 :- आधे अक्षरों का पास वाले में मिल जाना बात वही है जो ऊपर कही है कि आधा अक्षर कभी कभी अपने से पास वाले में मिल कर उसे एक ही कर देता है । जैसे क्‍या अब वैसे तो उसमें आधा क्‍ है पर उच्‍चारण करते समय इसको का पढ़ा जाता है अर्थात एक दीर्घ ।

 ऐसा अक्‍सर होता है जैसे – “तुम्‍हारे” में होता है तु  म्‍हा रे 122 या 121 अब इसमें आधा म्‍ मिल गया हा के साथ ।

 

इसी में तेरी  जन्‍नत है इसी में तेरी दोज़ख़ है

ज़मीं को छोड़कर आखि़र ख़ला में ढूंढता क्‍या है

 

अब यहां पर जन्‍नत में हो गया है जन्‍ और नत अर्थात दो दीर्घ 22 एक और मज़ेदार बात देखें मिसरा ऊला में दो बार तेरी आया है दोनो ही बार  उसका वज्‍़न है 21 अर्थात मेरी या तेरी को आप 22, 12, 21 इनमें से चाहे जो भी वज्‍़न दे सकते हैं वो आप पर निर्भर है कि आपको क्‍या चाहिये । मिरी 12, मेरी 22, मेरि 21 ये स्‍वतंत्रता ही ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाती है ।

 

वफा दुश्‍मन अनासिर से तिरा झगड़ा है क्‍या स्‍वामी

तू उस पर तंज करता क्‍यूं है आखिर माज़रा क्‍या है

 

यहां पर तिरा हो गया है । अब शायद कुछ वज्‍़न समझने में आपको आसानी हो

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Replies to This Discussion

सर्वप्रथम तो प्रस्तुत आलेख और संलग्न जानकारी को साझा करने पर बधाई स्वीकारें, वीनस भाई.

अभी-अभी इस प्रविष्टि को हमने देखा है. सो तुरत की सूचनात्मक हामी को साझा किया है हमने, बस.  लेख को पढ़ने के बाद आवश्यक हुआ तो पुनः बातें करूँगा.  

 

मेरा तो उन सदस्यों, जो आदरणीय तिलकराजजी की कक्षा में हैं और लाभान्वित हो रहे हैं,  से सादर अनुरोध है कि कक्षा के पाठों के साथ-साथ प्रस्तुत आलेख को भी अवश्य पढ़ें.  कई-कई बेसिक बातें और-और स्पष्ट होती जायेंगी.

 

धन्यवाद सौरभ जी

आदरणीय श्री वीनस जी ! बहुत आभार इस जानकारी को शेयर करने के लिए | ज्ञान साझा करने से बड़ा कोई पुण्य कार्य नहीं ! इस हेतु हार्दिक साधुवाद !! मैं तकतई में सदा अपने को कमज़ोर पाता हूँ | और कई बार इसी कारन फेल भी हो जाता हूँ | मानता हूँ कि इसे सीखना जानना ज़रूरी है | इस लिहाज से ये लेख संग्रहणीय है | इसे बार बार पढना लाभप्रद होगा | और मैं ये कर रहा हूँ |
पुनः आभार !!

आदरणीय श्री वीनस जी !....  :)))))))

 

अरुण जी, ओ बी ओ एक परिवार है और घर के लोग आपस में इतनी फार्मेल्टी से बात करे यह तो अच्छी बात नहीं है,,,  आप मुझे केवल "वीनस" से संबोधित करें, जैसे आप अपने छोटे भाई को घर में करते होंगे 

लेख आपको पसंद आया लिखना सार्थक हुआ |

 

ओ  बी ओ  परिवार से निवेदन है आप लोग इस चर्चा को आगे बढाए तो और भी बातें निकलेंगी और सीखने सिखाने का दौर चलता रहेगा

देखिये अरुण जी ने कितनी बढ़िया बात कही है - ज्ञान साझा करने से बड़ा कोई पुण्य कार्य नहीं !

वीनस भाई बहुत बहुत धन्यवाद इस पोस्ट हेतु, मुझ सहित बहुत लोगो को अब मात्राएँ गिनने में परेशानी नहीं होगी, कुछ शब्दावलियों को आपके माध्यम से जानना चाहता हूँ |

रुक्न

आरकान

अशआर

 

साथ ही रुक्न का नामकरण जैसे फैलुन , मुफैलुन आदि कैसे रखा जाता है, कृपया प्रकाश डाले |

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद गणेशभाई.  कहना न होगा, सवाल ही बताते हैं कि जवाब में क्या चाहिये.

आदरणीय तिलकराजजी की कक्षा के विद्यार्थी अब अपने पाठ को दुहरा सकते हैं. रेफ़ेरेन्स ले सकते हैं.

 

प्रारम्भ हुये इस प्रयास को मनचाही गति व मानक स्वीकृति मिले.  पुनश्च धन्यवाद.

 

बागी जी रुक्न का नामकरण और बह्र का नामकरण तो बहुत बाद कि बातें हैं

अभी तो तख्तीय की प्रक्रिया पर ही रहा जाए

शब्दावली पर कुछ काम कर रहा हूँ अगली पोस्ट में शब्दार्थ ही लगता हूँ

ग़ज़ल विधा में कुछ बातें हैं जो कहने में सहायक होती हैं और कुछ बातें केवल ज्ञानवर्धन के लिये हैं। उदाहरण के लिये रुक्‍न का नाम ही लें, नाम में क्‍या रक्‍खा है, हॉं रुकन का बंधन क्‍या है यह जनना आवश्‍यक है। कहॉं 2 की जगह 11 भी हो सकता है और कहॉं नहीं। रुक्‍न में 11 एक साथ आने पर उनका निर्वाह कैसे होगा जिससे वह 2 न हो जाये यह जानना जरूरी है लेकिन आधार स्‍तर पर नहीं। जैसे जैसे मूल बातें समझ में आती जायेंगी बाकी सरल होता जायेगा। अभी तो इस चर्चा को आरंभ करने का जो उद्देश्‍य है वहीं तक सीमित रहा जाये तो सबके लिये सरल व सहज होगा।

धन्यवाद सर,

 

आपने मेरे दिल की बात कह दी

बागी भाई !
 
- रुक्न को हिंदी में "गण" कहा जाता है, बैसे इसका शब्दकोशीय अर्थ है "सदस्य" !  फाईलुन, मुफाईलुन एवं फाईलातुन इत्यादि आठ तरह की शव्द टुकड़ियां (या गण) रुक्न कहलाती हैं !

-- "अरकान" रुक्न शब्द का बहुवचन है ! 

- "अशआर" शेअर शब्द का बहुवचन है !

- इन अरकान के नाम इनमें लघु-गुरु के क्रम के हिसाब से रखे गए हैं !

धन्‍यवाद योगराज जी,

आपने बात आगे बढ़ाई है तो इसपर संभावित प्रश्‍न को देखते हुए अब यह भी उल्‍लेख कर ही दिया जाये कि इसी रुक्‍न को कुछ व्‍याख्‍याकारों ने लय-खण्‍ड नाम भी दिया है। हिन्‍दी साहित्‍य में 'यमाताराजभानसलगा' यानि यगण (122), मगण (222), तगण (221), रगण (212), जगण (121), भगण (211), नगण (111) और सगण (112) रूप में जो गण हैं वो उर्दू के अरकान से कोई प्रत्‍यक्ष सम्‍बन्‍ध नहीं रखते हैं। एक और बात जो स्‍पष्‍टत: समझ लेना जरूरी है वह यह है कि यमाताराजभानसलगा के गणों में अक्षर संख्‍या 3 पर स्थिर है जबकि उर्दू के अरकान में यह अस्थिर है। उदाहरणस्‍वरूप फ़ायलुन् 212 को लें जो रगण समान है लेकिन

ये न पू/छो कि कै/से कटी/ जि़न्‍दगी

कितने धा/गों से हम/ने बटी/ जि़न्‍दगी

को देखें जो फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, फ़ायलुन् है लेकिन जि़न्‍दगी में 4 अक्षर हैं जो कि हिन्‍दी  छंदशास्‍त्र की गणनानुसार 'न्‍' को विलोपित करते हुए जिदगी वज्‍़न में 112 लिया जायेगा जबकि उर्दू में यही जिन्‍ द गी के रूप में 212 लिया जाता है। इसी तरह दूसरी पंक्ति में कित उर्दू में 2 है जबकि हिन्‍दी छंदशास्‍त्र में यही 11 या लघु लघु है। उर्दू में कितने का ने गिरकर न के रूप में 1 गिना जायेगा जो हिन्‍दी में अनुमत्‍य नहीं है। यही स्थिति 'हम' की है उर्दू में यह इस बह्र में 2 गिना जायेगा जबकि हिन्‍दी में 11 ही रहेगा। 

जहॉं जहॉं उर्दू कहा वहॉं यह ध्‍यान रखें कि ग़ज़ल का जन्‍म उर्दू में नहीं फ़ारसी में हुआ और अरकान के नाम भी फ़ारसी से ही हैं।

 

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