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इस पोस्ट के पहले भाग में आपने ग़ज़ल, शाईरी, शाईरी, शेर, अशआर, मिसरा-ए-उला, मिसरा-ए-सानी, मतला, हुस्ने मतला, मक्ता, रदीफ, मुरद्दफ़ ग़ज़ल, गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल, काफिया, बह्र, रुक्न, मात्राएं, अर्कान, जुज, लाम और गाफ का अर्थ जाना, अब आगे ...   

 

अब वो शब्द  जो बह्र से सम्बंधित हैं ..... 

 

तक्तीह = मात्रा गणना, वह तरीका जिसके द्वारा यह परखा जाता है कि शेर निश्चित लयात्मकता (छंद, बह्र) में है अथवा नहीं  

 

वज्न = मात्रा क्रम, किसी शब्द अथवा किसी मिसरे के मात्रा क्रम को उस शब्द अथवा मिसरे का वज्न कहा जाता है

जैसे –  

शब्द - सादा  

वज्न - फैलुन, २२, लाला  

    

मिसरा – आज भी हम आपको ही याद करके रो रहे हैं   

वज्न   - फाइलातुन / फाइलातुन / फाइलातुन / फाइलातुन

         २१२२ / २१२२ / २१२२ / २१२२,

         लाललाला / लाललाला / लाललाला / लाललाला 

 

अज्जा –ए- रुक्न = मिसरे के वज्न को जब रुक्न के हिसाब से तोडते हैं तो हमें अज्जा -ए- रुक्न प्राप्त होता है  

 जैसे =

शेर – 

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए   

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 

अज्जा -ए- रुक्न - 

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला) 

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

अज्जा –ए- रुक्न के भेद = एक शेर को अज्जा –ए- रुक्न के हिसाब से ६ खंड में बांटा जाता है  

१-     सदर  

२-    अरूज़

३-    हश्व

४-   इब्तिदा

५-   जरब

६-    हश्व

 

१- सदर (शाब्दिक अर्थ – प्रारम्भ) किसी शेर के मिसरा ए उला के पहले खंड को सदर कहते है क्योकि यहाँ से शेर का प्रारंभ होता है |

उदाहरण –

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

२ - अरूज़ (शाब्दिक अर्थ – उत्कर्ष) किसी शेर के मिसरा ए उला के अंतिम खंड को अरूज़ कहते हैं क्योकि यहाँ शेर का उत्कर्ष होता है |

उदाहरण –

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

 

३- हश्व # = (शाब्दिक अर्थ – विकास) किसी शेर के मिसरा ए उला के पहले खंड (सदर) तथा अंतिम खंड (अरूज़) के बीच में जितने भी खंड होते हैं उन्हें हश्व कहते हैं क्योकि यहाँ शेर का विकास होता है |

उदाहरण –

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

४  इब्तिदा = (शाब्दिक अर्थ – आरम्भ) किसी शेर के मिसरा ए सानी के पहले खंड को इब्तिदा कहते है क्योकि शायर शेर लिखते समय पहले दूसरी पंक्ति लिखता है और बाद में पहली पंक्ति की गिरह लगता है तो देखा जाए तो शेर लिखने की शुरुआत इसी खंड से होती है |

उदाहरण –

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

५ ज़रब = (शाब्दिक अर्थ – अंत) किसी शेर के मिसरा ए सानी के अंतिम खंड को ज़रब कहते हैं क्योकि यहाँ शेर का अंत होता है |

उदाहरण –

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

६  हश्व # = (शाब्दिक अर्थ – विकास) किसी शेर के मिसरा ए सानी के पहले खंड (इब्तिदा) तथा अंतिम खंड (ज़रब) के बीच में जितने भी खंड होते हैं उन्हें भी हश्व कहते हैं क्योकि यहाँ भी शेर का विकास होता है |

उदाहरण –

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 


# हश्व एक रुक्न, दो रुक्न अथवा कई रुक्न का भी हो सकता है) जैसे –

जैसे  =

एक रुक्न =

दिल ए नादाँ/ तुझे हुआ/ क्या है          (उला)

आखिर इस दर्/ द की दवा/ क्या है       (सानी)

 दो रुक्न =

हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

 

जो मिसरा केवल दो रुक्न का होता है उसमें हश्व नहीं होता है |

 जैसे =

इतनी मुहब् / बत, बाप रे

   सदर       /   अरूज़

जीने कि आ/ फत, बाप रे

  इब्तिदा    /   ज़रब

 


अज्जा –ए- रुक्न=

  हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए        (उला)

  सदर    /     हश्व     /        हश्व      / अरूज़   

 ......................................................................................

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए    (सानी)

    इब्तिदा    /  हश्व       /       हश्व        / ज़रब

 

रब्त = अंतर्संबंध

 

सालिम रुक्न = पूर्ण रुक्न

 

मुजाहिफ = परिवर्तित रुक्न

 

मुफरद सालिम बह्र = वो मूल बह्र जिनमें कोई मात्रा घट बढ़ न की गई हो

 

मुफरद मुजाहिफ बह्र =  मूल रुक्न की बह्र में कोई मात्रा घट बढ़ की गई हो तथा उप बह्र बनाई गई हो तो उसे मुफरद मुजाहिफ बह्र कहते हैं

 

मुरक्कब सालिम बह्र = वो बह्र जो दो मूल रुक्न के योग से बनी हो तथा जिनमें कोई मात्रा घट बढ़ न की गई हो

 

मुरक्कब मुजाहिफ बह्र = वो बह्र जो दो मूल रुक्न के योग से बनी हो तथा कोई घट बढ़ करके उसकी भी उप बह्र बनाई गई हो उसे मुरक्कब मुजाहिफ बह्र कहते हैं

 

जिहाफ = मात्रा घटना

 

जिहाफत = मात्रा घटाने की प्रक्रिया

 

मुसना = जिस शेर के एक मिसरे में केवल १ रुक्न हो उसे मुसना कहते है इसी प्रकार

एक मिसरे में दो रुक्न हों तो         = मुरब्बा

एक मिसरे में तीन रुक्न हों तो     = मुसद्दस

एक मिसरे में चार रुक्न हो तो     = मुसम्मन

एक मिसरे में पांच रुक्न हो तो     = दुहुम

एक मिसरे में छः रुक्न हो तो      = द्वाजदाह 

एक मिसरे में सात रुक्न हो तो    = चहारदह 

एक मिसरे में आठ रुक्न हो तो    = शाजदह 

कहते हैं

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Replies to This Discussion

वीनस भाई इस दुर्लभ जानकारी को हम सब से साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आप जैसे गुणीजनों की ही वजह से एक दिन हिंदी ग़ज़ल नई उँचाइयों को छुएगी।

धन्यवाद धर्मेन्द्र  जी

वाह वीनस भाई वाह, एक ही जगह आपने पिटारा खोल दिया है, मैं धर्मेन्द्र भाई से सहमत हूँ , वाकई यह दुर्लभ जानकारी है , बहुत बहुत धन्यवाद |

Veenus Bhai,

 

Sach me bahut Sundar Jaankari, aur kaafi upyogi bhi.....

शुक्रिया

दुर्लभ वो ही होता है जिसे छुपा कर रखा जाये, किसी के सामने न आने दिया जाए 

 

अब काहे का दुर्लभ :)

वीनस जी,
ग़ज़ल की महत्वपूर्ण जानकारी साँझा करने के लिये - धन्यवाद, हम कई चीज़ें जानते हुए भी लिखते वक़्त भूल जाते हैं, आपने उदहारण देकर समझाया जो काबिले तारीफ है, विद्या की देवी सरस्वती माता जी हैं, वो उन पर ज़्यादा कृपा करती हैं, जो लोग विद्या को निस्वार्थ लोगों को पढ़ाते हैं, सरल तरीके से समझाते हैं.
सुरिन्दर रत्ती
मुंबई

माँ सरस्वती और गुरुदेव श्री पंकज सुबीर जी का आशीर्वाद ही है जो यह जानकारी आप तक पहुंचा रहा है

आभारी हूँ  

कमाल वीनस भाई ... गज़ब की जानकारी दी है ...

दिगंबर जी आपका सदैव स्वागत है

नायाब पोस्ट ! मुख्य शब्दों और जानकारियाँ साझा करने के लिये शुक्रिया.

शुक्रिया के लिए शुक्रिया :)

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