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विवेक मिश्र's Discussions (159)

Discussions Replied To (152) Replies Latest Activity

"/लहरों का अजीब हैं मचलना सूखे किनारों का घुट के मरना/- क्या खूब कशिश है. /कौन प्यासे…"

विवेक मिश्र replied Jul 8, 2011 to "OBO लाइव महा उत्सव" अंक ९

1024 Jul 11, 2011
Reply by Admin

"/कली-कली का घूँघट उठ जाये भंवरा गाये / एक कोमल सी भावना का हाइकु के माध्यम से सुन्दर…"

विवेक मिश्र replied Jul 8, 2011 to "OBO लाइव महा उत्सव" अंक ९

1024 Jul 11, 2011
Reply by Admin

"/बारिश में उफनती हुई बेबाक नदी तुम , मुझपर कड़ा गुज़रा तेरी हर रात का मौसम/ वाह. हासि…"

विवेक मिश्र replied Jul 8, 2011 to "OBO लाइव महा उत्सव" अंक ९

1024 Jul 11, 2011
Reply by Admin

"बारिश के मौसम में सर्वाधिक दुखी, टूटे छप्पर वाला ही होता है. सजीव चित्रण के लिए कोटि…"

विवेक मिश्र replied Jul 8, 2011 to "OBO लाइव महा उत्सव" अंक ९

1024 Jul 11, 2011
Reply by Admin

"वाह गणेश भाई! शुरुआत से ही बवाल चालू.. बहुत सुन्दर घनाक्षरी. 'बरखा' विषय ही ऐसा है क…"

विवेक मिश्र replied Jul 8, 2011 to "OBO लाइव महा उत्सव" अंक ९

1024 Jul 11, 2011
Reply by Admin

प्रधान संपादक

"आज २-३ दिनों बाद अंतर्जाल से जुड़ सका हूँ. सारी ग़ज़लें एक स्थान पर पाकर पढ़ना और भी…"

विवेक मिश्र replied Jul 1, 2011 to ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-१२ में सम्मिलित सभी ग़ज़लें

24 Apr 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"/आज करते हैं चलो झूठ की फसलों को दफन,आओ सच्‍चाई की बस पौध लगाई जाए/ काबिले तारीफ़ शे'…"

विवेक मिश्र replied Jun 27, 2011 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-१२( Now Closed )

714 Jun 28, 2011
Reply by Er. Ganesh Jee "Bagi"

"धन्यवाद डॉक्टर साहब!"

विवेक मिश्र replied Jun 27, 2011 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-१२( Now Closed )

714 Jun 28, 2011
Reply by Er. Ganesh Jee "Bagi"

"धन्यवाद राणा भाई! बहरो-वज्न की समस्या से पीड़ित हूँ. मशहूर डाक्टरों के चक्कर भी लगा र…"

विवेक मिश्र replied Jun 27, 2011 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-१२( Now Closed )

714 Jun 28, 2011
Reply by Er. Ganesh Jee "Bagi"

"योगराज सर! बधाई तो कबूल कर ली पर सच कहूँ तो केवल ६ अश'आर कहने में ही तारे नज़र आ गए.…"

विवेक मिश्र replied Jun 27, 2011 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-१२( Now Closed )

714 Jun 28, 2011
Reply by Er. Ganesh Jee "Bagi"

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२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
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"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
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दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
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"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
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