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पन्ने जिंदगी के!

पन्ने जिंदगी के!
पलट रहा था मैं यूँही बैठा बैठा ये पन्ने जिंदगी के
कुछ लम्हे ख़ुशी के कुछ नगमे दर्द-ए-गम के
कोई मीठी पुकार, तो कहीं से आरही थी फटकार
कहीं बहा मेरा खून पसीना,तो कहीं बेफिक्री का सोना
बचपन की यादों का मेला ,मेले में एक मदारी
डम-डम डमरू की हुंकार
फिर माँ का प्यार भरा पुचकार
मेरे किशोरोपन में भी कई तस्वीरे बन रही थी
किसी लड़की पे मर जाना,
फिर उससे लड़ना झगड़ना,और मनाना
फिर आ पंहुचा आज में,
एक सड़े हुए कूड़ेदान में,
घर से हजारो मीलों की दूरी,
ऊपर से ये मजदूरी
धुप में जलना, मेहनत करना
फिर शाम को खा कर घुलट जाना
सबकुछ तारो ताज़ा हो गई
फिर पुस्तक में एक खाली पन्ना अगया
मै समझ गया, भूत, वर्तमान ख़त्म अब भविष्यतकाल आगया
तो भैया चलता हूँ रंग भरने इसमें कुछ करने, गुजरने
फिर कभी फुर्सत में उलट पलट कर खुश होऊंगा
ये पन्ने मेरी जिंदगी के...............
-'वीर'

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Comment

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Comment by Biresh kumar on July 29, 2010 at 8:06am
thanks sanjay jee

aap logo ke bahumulye partikariyaayein milti rahe to jarur likhunga....
Comment by Sanjay Kumar Singh on July 25, 2010 at 2:31pm
achha paryas hai,thought badhiya hai, aap badhiya likh saktey hai, lagey rahiyey, thanks ,
Comment by Biresh kumar on July 22, 2010 at 1:40pm
dhanyabad bagi jee!!!!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 22, 2010 at 10:01am
वाह वीर वाह , ओपन बुक्स ऑनलाइन का भी तो यही उद्देश्य है की आप किताब के पन्नो को पलटिये और हमारे साथ सुख और दुःख को बाटिये, कहा भी गया है कि दुःख बाटने से घटता है और सुख बाटने से बढ़ता है , आप की भावना आपकी कविता हुब हू समझा देने में सक्षम हैं, सुंदर अभिव्यक्ति ,

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