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मानव धर्म / भागवत धर्म
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देखा जाय तो ब्रह्म चक्र के क्रमशः संचर और प्रतिसंचर मार्ग में चलते हुए मनुष्य की स्थिति तक पहुंचते हुए जीव 75 प्रतिशत रास्ता तो पूरा कर ही चुका होता है। अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल 25 प्रतिशत रास्ते को पूर करने का कार्य रह जाता है। परंतु, वह 25 प्रतिशत रास्ता पार करना ही तो बड़ा कठिन होता है, क्योंकि इससे पूर्व की स्थितियों में तो प्रकृति ही लगातार आगे की ओर बढ़ाती जाती है परंतु मनुष्य के स्तर पर प्राणी के अहंकार के साथ साथ कर्तापन का बोध भी जाग जाता है अतः वह प्रकृति के अनुकूल भी चल सकता है या फिर अपनी बुद्धि और विवेक का सदुपयोग कर प्रतिसंचर की गति में त्वरण उत्पन्न कर तेजी से आगे जा सकता है या दुरुपयोग कर प्रतिसंचर की गति में मंदन उत्पन्न कर पीछे की ओर भी जा सकता है। वह प्रतिसंचर में आगे जाते हुए ईश्वर सृष्ट संसार में आत्मानुसंधान कर सकता है या फिर अपने कृतित्व से अपना संसार निर्मित कर उसी में भ्रमित होता रह सकता है।
मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि कोई प्राणी प्रतिसंचर क्रिया में सभी स्तरों को पार करते हुए प्रकृति के द्वारा मानव शरीर पा जाता है तो उसे आगे बढ़ाने के लिये कौन सहायक होता है क्योंकि प्रकृति तो अब उसे स्वतंत्र छोड़ देती है? इसका उत्तर है कि सबसे पहले तो जहाॅं वह मानव शरीर पाता है उसी घर के वातावरण और माता पिता के संस्कार उसे अपनी तरह मोड़ने की प्रारंभिक शिक्षा देते हैं, परंतु प्रकृति प्रदत्त बुद्धि और विवेक का उपयोग कर वह अपना रास्ता स्वयं चुन सकता है। यह भी सही है कि यह कार्य इतना सरल नहीं है क्योंकि पूर्व जन्मों के पाशविक संस्कारों का प्रलोभन उसे अपनी ओर खींचता रहता है। इसलिये सबसे पहले तो माता पिता का आचरण ही उसे प्रभावित कर अपने अनुकूल ढालता है, परंतु तार्किक बुद्धि और विवेक के साथ उन कार्यो की सार्थकता पर चिंतन करते हुए उचित मार्गदर्शक की तलाश की जा सकती है जो प्रकृति के इन बंधनों को काटने और प्रलोभनों से मुक्त करने के लिये संघर्ष करने का उपाय बताता है। यदि यह नहीं हो पाता तो अन्यों की तरह वह भी अपना पृथक संसार बनाकर, उसी को सब कुछ समझकर, उसी में आनन्द पाने लगता है, और आवागमन के चक्र में कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहता है, और द्रश्य प्रपंच में फंसा रहता है।

एक अन्य विचार यह भी आता है कि जब यह प्रपंच भी उन परमपुरुष की ही विचार तरंगें है, तो सब कुछ होता तो उन्हीं के मन के भीतर है फिर पृथक संसार निर्मित करने की बात ही कहाॅं उठती है? इसका समाधान यह है कि , यह बिलकुल सत्य ही है कि सबकुछ उन एकमेव अद्वितीय परमपुरुष के मन के भीतर ही होता है, परंतु व्यक्ति अपने इकाई मन (अर्थात यूनिट माइंड) की तरंगों को उन परमपुरुष के मन (अर्थात् कास्मिक माइंड) की तरंगों के साथ साम्य जुटा पाने का अवसर नहीं पा पाता। उसका प्रथम कारण तो माता पिता के द्वारा दिये गये संस्कार और उनकी अपेक्षाओं के अनुसार प्रारंभ से ही मानसिकता बन जाना और दूसरा यह कि पूर्व जन्मों के संस्कारों में अपना ‘विस्तार करने‘ और ‘ इंद्रिय सुखों में ही सर्वाधिक आनन्द पाने की अवधारणा बन जाना‘ होता है। यह दोनों कारण ही अपना पृथक अस्तित्व मानने का आधार बनते हैं। यद्यपि अनेक बार प्रकृति ऐंसे अवसर देती है कि वह अपने विवेक का उपयोग कर यह जानने का प्रयत्न करे कि वह कौन है , कहाॅं से आया है और कहाॅं जाना है आदि, परंतु अहंकार की सघनता उसे वापस इसी जड़त्व की ओर खींच लेती है।

अब कोई तर्क करे कि , जब उसे प्रकृति अपने विवेकानुसार सोचने का अवसर देती है तो फिर उसका जड़ता की ओर वापस हो जाना किस प्रकार संभव है?
तो यह वैसा ही है जैसे बादल छाये रहते हैं परंतु वर्षा नहीं होती, पर उस समय बादलों में पानी की बहुत छोटी छोटी सी बूंदें वायु और धूल के अणुओं पर जम जाती हैं और गुरुत्व के प्रभाव में नीचे की ओर आती हैं परंतु वायु के साथ घर्षण होने से वे फिर से वाष्पित होकर बादल में ही चली जाती हैं, पानी के रूप में वे तभी बरस पाती हैं जब उनका आकार बहुत बड़ा होता है और गुरुत्व के प्रभाव से नीचे गिरते समय अधिकाॅंश भाग वाष्पित होते जाने पर भी जो बचा रहता है वही हमें बूंदों के रूप में धरती पर गिरता दिखाई देता है और हम कहते हैं कि वर्षा हो रही है। इसीप्रकार प्रतिसंचर के रास्ते में भी यही होता रहता है। जब किसी के लिये प्रकृति विवेकानुसार निर्णय लेने की अवसर देती है तो उसके मन पर सच्चाई जानने की उत्कंठा उत्पन्न होती है और वह आगे तेजी से बढ़ता है परंतु उसके अहंकारजन्य संस्कार उसे वाष्पित कर फिर से वापस ले आते हैं और वह परमपुरुष तक पहुंचने में असफल होता रहता है जब तक कि पूर्वकथित उत्कंठा का आकार पर्याप्त बड़ा न हो जाय और परमपुरुष के आकर्षण में उसकी गति अधिक तेज न हो जाये।

अब यह जिज्ञासा होती है कि वह कर्म कौनसा है जिसके करने से हमारी गति लगातार परमपुरुष की ओर बनी रहे और वापस लौटने का अवसर ही न मिले। तो बता दें की वह कर्म चार भागों में बटा हुआ है वे हैं - (1) विस्तार (2) रस (3) सेवा, (4) तदस्थिति।

"विस्तार" का अर्थ यह नहीं है कि अपने घर, परिवार, जमीन जायदाद और भौतिक सुख सुविधाओं का विस्तार करते जाना। भौतिक सुख सुविधाओं और संपदा का आवश्यकता से अधिक विस्तार, हमेशा पूर्व वर्णित बादलों की तरह बूंदों को बरसने ही नहीं देगा, अपने में ही फंसाये रहेगा। विस्तार का सही अर्थ है मन की विस्त्रिति अर्थात् मन को वृहदामुखी करना। इस स्थिति में सब प्रकार के छुद्र भाव, वर्ण, जाति भेद, और अंधविश्वासों के विरुद्ध संग्राम करना पड़ता है मन जब संकीर्णता और अंधविश्वासों में घिरा रहता है तो चारों ओर का वातावरण दूषित हो जाता है किन्तु मनके व्यापक होने पर पुण्य की द्युति स्वप्रकाशित होती है। इसी लिये कहा गया है, ‘‘विस्तारः सर्व भूतस्य विष्णोर्विष्वमिदं जगत् द्रष्टव्यमात्मवत्तस्माद भेदेन विचक्षणैः।’ मनुष्य ही मननचिन्तन कर सकता है, प्रत्येक जीव मनुष्य के शरीर के लिये लालायित रहता है। क्योंकि इस शरीर में ही भागवत साधना कर पाना संभव है। इसीलिये शास्त्र में कहा कि भागवतधर्म का पालन कुमार अवस्था से ही करणीय है। भागवत धर्म का आश्रय लेने वाले संसार की समस्त अभिव्यक्तियों को भगवानका विग्रह मानकर प्यार करते हैं, क्योंकि उनका प्रेम परमपुरुष के साथ होता है।‘‘अनन्यममता, विष्णोर्ममता प्रेमसंगता’’ अर्थात् तुम्हारा प्रेम उनके साथ है जिनकी मानस सत्ता के बीच पूरा जगत स्थित है। उन्होंने जगत की रचना कर अपने को उसी में विलय कर दिया है। एक छुद्र कण, घास का पत्ता और प्राणी सब उन्हीं का विस्तार है इसलिये भागवत धर्म के अनुयायी साधकों के लिये अपने मन का इतना विस्तार करना होगा कि जगत की प्रत्येक वस्तु से प्रेम करें, घृणा नहीं। भागवत धर्म में विभिन्नता को कोई स्थान नहीं है। यह संश्लेषण का पथ है।

और "रस" का अर्थ क्या है? इस को इस प्रकार समझा जा सकता है , विश्व में जो कुछ हो रहा है चाहे प्राकृतिक हो या अतिप्राकृतिक सबकुछ परमपुरुष की इच्छा से ही हो रहा है। उनके मन का प्रक्षेप यह जगत, उनकी मानस तरंग से उत्पन्न हुआ है। हमारे अणुमन (अर्थात् यूनिट माइंड) से उनके भूमामन (अर्थात् कास्मिक माइंड) का पार्थक्य यह है कि हमारी कल्पना का रूपान्तरण वाह्य मानस प्रक्षेप के रूप में होता है जबकि भूमामन में वाह्य कुछ भी नहीं है। समस्त जगत उसकी मानस सत्ता के मध्य स्थित है इसलिये उसकी मानस तरंग हमें वाह्य प्रतीत होती हैं। परमपुरुष का मानस चिन्तन उनका स्वरस है। विभिन्न चिन्तनों के कारण अणुमन में जो तरंगें बनती हैं वे उसका स्वरस हैं। इस स्वरसगत पृथकता के कारण ही प्रत्येक जीव एक दूसरे से अलग अलग होता है। जैसे, बाजार से जाते हुए तुमको एक जूते बनाने वाला तुम्हारे पैरों की ओर, नाई सिर की ओर और धोबी कपड़ों की ओर देखता है। द्रष्टि की यह भिन्नता अपने अपने स्वरस के कारण होती है। प्रत्येक अणुमन का स्वरस परमपुरुष के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित होता रहता है, तुम चाहो या नहीं उनके चारों ओर घूमना ही पड़ेगा । तुम्हारा स्वरस यदि उनके स्वरस के साथ साम्य स्थापित नहीं करता तो तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती। तुम तो हजारों इच्छायें प्रतिदिन करते हो पर उनमें से कितनी पूरी हो पाती हैं? इसलिये सफलता पाने के लिये भूमा तरंग और तुम्हारी स्वरस तरंग में सामंजस्य होना चाहिये। जब मनुष्य परमपुरुष के प्रेम में जकड़ जाता है तो वह उनका स्वभाव जान जाता है और वह अपने स्वभाव को परमपुरुष के स्वभाव में मिला देता है जिससे वह जगत में प्रतिद्वन्द्वता से दूर हो जाता है और अपने क्षेत्र में विजयी होता है। दूसरे समझते हैं कि वह महान पुरुष है पर वह जानता है कि उसकी सफलता का रहस्य क्या है। इसलिये रस साधना का मूल मंत्र यह है कि अपनी इच्छा को परमपुरुष की ओर प्रवाहित कर दो। शास्त्र में इसी को रासलीला कहा गया है। तुम्हारी बुद्धि, शिक्षा, मान सब व्यर्थ हो जायेंगे यदि उन्हें परमपुरुष की ओर परिचालित नहीं करते हो। साधक को चाहिये कि वह यह भावना रखे कि हे प्रभो, मेरे जीवन में तुम्हारी इच्छा पूरी हो।
तथा "सेवा" किसे कहेंगे ? जब किसी को कुछ देकर उसके बदले में प्रत्याशा रखी जाती है तो यह कहलाता है व्यवसाय और जब पाने की प्रत्याशा नहीं की जाती तब वह सेवा कहलाती है। यह दो प्रकार की हो सकती है एक 'आन्तरिक 'और दूसरी 'बाह्य'। ‘‘बाह्य सेवा‘‘ के लिये संपूर्ण जगत को परमेश्वर का विग्रह जानकर प्रत्येक प्राणी की सेवा करना होगी, चाहे गृहस्थ हो या संन्यासी, जीव को शिव जानकर सेवा करना ही होगी। जीव की सेवा के समय मन में यह ध्यान रखना होगा कि परमपुरुष की ही सेवा कर रहे हो, यदि जीव रूप में वह नहीं आते तो यह अवसर कहां मिलता। रोगी, भिखारी के रूप में वे तुम्हारे पास आते हैं और तुम्हारी सेवा की आशा करते हैं, तुम्हारी सेवा से वे कृतज्ञ नहीं होते वरन् तुम ही होते हो क्योंकि यदि वह सेवा का अवसर न देते तो तुम क्या करते? वाह्य सेवा सब कर सकते हैं। ‘‘आन्तरिक सेवा‘‘, जपक्रिया और ध्यान से सम्पन्न होती है। ध्यान और जप के समय सेवा की मनोवृत्ति जाग्रत रखना होगी, प्रत्याशा का त्याग करना होगा। साधना में सोचना होगा कि परमपुरुष की सेवा कर रहे हैं। साधना में सेवा भाव होने पर एकाग्रता सहज ही आ जाती है सेवा भाव नहीं रहने पर योगी की साधना भी निरर्थक हो जायेगी। जब आन्तरिक सेवा ठीक नहीं होती तब वाह्य सेवा भी संभव नहीं है। यह नोट कर लो कि भागवत धर्म के पालन करने वालों का लक्ष्य होता है,‘‘आत्ममोक्षार्थं जगद्हितायच’’, इसका प्रथम भाग, आन्तरिक सेवा करके , अपूर्ण व्यक्तिगत जीवन को पूर्ण करने और द्वितीय भाग वाह्य सेवा करके , जगत को कल्याण पथ पर अग्रसर करने का प्रयोजन है। बाहरी सेवा से मन शुद्ध होता है और इसी शुद्ध मन द्वारा इष्ट की सेवा करना होती है। इन दोनों प्रकार की सेवाओं के करने का अधिकार सब को है। सभी अपनी मानस तरंग को भूमा मन की तरंग में मिलाने का चिन्तन कर सकते हैं। साधना और कुछ नहीं, है केवल केन्द्र विन्दु के सापेक्ष अपनी परिधि को कम करने का प्रयत्न करना। व्यक्तिगत स्वरस से स्नायुओं द्वारा विभिन्न ग्रंथियों की संरचना होती रहती है। मन की विभिन्न विचारधाराओं में विभिन्न स्वरसों के संपर्क में आने से भाव उत्पन्न होता है कि मैं ब्रह्मवत् हूॅं। जानकर या अनजाने में ही प्रत्येक जीव ‘‘ मैं वही, वही मैं’’, ( अर्थात् सो अहम् ) के बीच आवर्तित होता रहता है। वह शिव से पृथक नहीं है। जब तक वह सोचता है कि वह ब्रह्म से पृथक है उसे घूमते रहना पड़ेगा । जब उभय प्रेम का चिन्ह मात्र दूर हो जाता है तब और पृथकता नहीं रहती दोनों मिलकर एक हो जाते हैं। जब तक ऐंसा नहीं होता कोल्हू के बैल की तरह घूमते रहना पड़ेगा। किन्तु जब कोई व्यक्ति विस्तार , रस और सेवा के द्वारा भागवत् धर्म में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब उसकी यात्रा समाप्त हो जाती है और उसे समझ में आ जाता है कि परमपुरुष की लीला क्या थी।

तो अब आता है तदस्थिति। इस का क्या अर्थ हुआ? जब विस्तार , रस और सेवा इन तीनों का अच्छा अभ्यास हो जाता है तो संस्कारों से मुक्त मन शुद्ध होकर कास्मिक माइंड के साथ अनुनादित होकर उसी में मिल जाता है, इसे ही तदस्थिति कहते हैं। दार्शनिक शब्दों में इसे मुक्ति कहते हैं। परंतु जब इसी अभ्यास के क्रम में इकाई चेतना, परम चेतना के साथ अनुनादित होकर उसी में मिल जाती है तो इसे मोक्ष कहते हैं। इसलिये भागवत धर्म ही अनुकरणीय है यही मानव मात्र का धर्म है।
(मौलिक और अप्रकाशित)

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