For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक- 62 की समस्त संकलित रचनाएँ

श्रद्धेय सुधीजनो !

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-६२, जोकि दिनांक १२ दिसम्बर को समाप्त हुआ, के दौरान प्रस्तुत एवं स्वीकृत हुई रचनाओं को संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है. इस बार के आयोजन का शीर्षक था - ’पहल’.


इस बार ओबीओ का अमरीका स्थित सर्वर इतना इर्रैटिक था कि आयोजन के पहले दिन शुक्रवार को कई सदस्यों को बहुत ही दिक्कत पेश आयी. दूसरे दिन सही हुआ तो मैं जिस प्रोवाइडर काप्रयोग करता हूँ, वही सर्वर बैठ गया. वह ठीक हुआ कि मेरा नेट ही बैठ गया. आज सायं से पार्शियली ठीक हुआ है. अब काव्य महोत्सव की सम्मिलित और स्वीकृत रचनाओं का संकलन प्रस्तुत हो रहा है.

पूरा प्रयास किया गया है, कि रचनाकारों की स्वीकृत रचनाएँ सम्मिलित हो जायँ. इसके बावज़ूद किन्हीं की स्वीकृत रचना प्रस्तुत होने से रह गयी हो तो वे अवश्य सूचित करेंगे.
सादर
सौरभ पाण्डेय 
*****************************************************************
१. आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी
पहल (अतुकान्त मुक्त छन्द)
======================
ये आदत है, तबीयत है,
ये सीरत है, रवैया है,
अगर हालात हो मुश्किल तो इंसा खौफ़ खाता है।
तसव्वुर में,
हकीक़त से परे ही फूल खिलता है।
मज़ा आता है दिल को खौफ़ में,
कुछ चैन मिलता है।

नया करने की सोचोगे, बड़ा करने की सोचोगे,
तो दिल का शक,
जो बरसों से है दुबका, जाग उट्ठेगा।
मगर ये भी सही है-
आप जोखिम जो उठाएंगे,
यक़ीनन ही कोई मंजिल सरक कर पास आएगी।

पहल करना ज़ुरूरी है,
मुखालिफ़ चाहे दुनिया हो।
जो मक़सद मिल गया फिर तो ज़माना साथ में होगा।
मसाइल तो हमेशा ही करेंगे आपका पीछा।
न उनसे भागना ऐसे,
न दिल में डर बसा लेना।
मसाइल जो करे पीछा,
तो ठहरो गर्द उड़ते तक।
सड़क फिर आपकी होगी, हवा भी आसरा देगी।
वो दौड़े,
दौड़ने दो,
बस संभालो आप अपना मन।
मसाइल के मुकाबिल फिर धमक कर हो खड़े तनकर।
ठिठक कर फिर वहीँ थम जाएगी, नादाँ मसाइल भी।

मेरे दिलदार!
हिम्मत आपकी फिर रंग लाएगी।
पहल का हौसला होगा तो मक़सद हाथ में होगा।
पहल का हौसला होगा तो मंजिल साथ आएगी।
*****************************************************************
२. आदरणीय गिरिराज भंडारी जी
पहल (अतुकांत)
============
एक सच कहूँ ?
दुनिया के 99.9 प्रतिशत लोग अनुयायी होते हैं
और अनुयायी ही रहना चाहते हैं

प्रश्न, किसके अनुयायी ? उचित नहीं है
क्यों कि , वे किसी के भी हो सकते हैं
और कितनों के भी हो सकते हैं

मर रहे होते हैं . सभी
किसी के भी अनुयायी बन जाने के लिये , कहलाने के लिये

न, न मुझे भी अलग न समझिये
मै भी वही हूँ
और आप भी , ये भी और वे तो हैं ही

कारण ? एक ही है ,
सामने आने के खतरे बहुत हैं
हाथ उठाने में सुरक्षा है
क्यों कि हाथ उठाने वालों से कोई भी कारण नहीं पूछता
कि , आपने क्या ऐसा अच्छा देखा किसी में कि उसके समर्थक हो गये ?
कारण केवल विरोध का पूछा जाता है ,
साथ में ये सुविधा भी है ,
आज इनके समर्थक हैं , कल किसी और के हो जायें ,

आप प्रयास तो कीजिये , पहल का
चाहे सोच समझ के , या बिना सोचे समझे ,
कुछ न बन पड़े , पागल ही हो जाइये हिम्मत करके
नग्न या अर्धनग्न होने की भी सुविधा है
फिल्मी पोस्टरों जैसे

लोग उत्सुक हैं , बंट जाने के लिये
कुछ समर्थन में ,
और बाक़ी के कुछ विचारवान विरोध में

बस , आप पहल कीजिये
ऊल जलूल सी सहीं
बाक़ी प्रचार तंत्र और मीडिया पर छोड़ दीजिये
*****************************************************************
३. आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा ’वात्स्यायन’
ग़ज़ल
======
2222 2222 2222 1212
परिवर्तन का कीर्तन करना, बेमतलब है पहल बिना।
बदलावों की माला जपना, बेमतलब है पहल बिना।।

बैठो सोचो सरकारों से होंगे पूरे सपन तेरे।
आँखों में यह सपना धरना, बेमतलब है पहल बिना।।

जब तक कर्तव्यों से दूरी, अधिकारों का मूल्य नहीं।
अधिकारों की बातें करना, बेमतलब है पहल बिना।।

समरसता की परिभाषा से, जाना जाता संविधान यह।
इससे कुछ भी चाहत रखना, बेमतलब है पहल बिना।।

भारत माता के कण कण का, सबके ऊपर क़र्ज़ बहुत।
पंकज 'ऋण से मुक्त हो' कहना, बेमतलब है पहल बिना।।
*****************************************************************
४. आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी
[१] 'पहल और दख़ल' - [कविता]
======================
किस की पहल, कैसी पहल ?
कभी बनता-संवरता, कभी लुटता-मिटता
ये जहान !
कभी ख़ुद गिरते, कभी गिराते
भटकते, बहकते
ये इन्सान !
कभी बनते, कभी बनाते
सांस्कृतिक, आध्यात्मिक पतन
के निशान !
मस्जिदें बंद, ये कैसा द्वंद्व
चरमपंथी चंद
करते परेशान !
कहीं करते, कहीं कराते
नमाज़, प्रार्थना बंद
दबंगों की है बस
यही पहचान !
कभी बनाते, कभी गिराते
पूजा-स्थान, इबादतगाह
वे हैवान !
कभी तो करते और कराते बंद
किसी चरमपंथी
की ज़ुबान !
सकारात्मक, नकारात्मक आतंक
का डंका या डंक
है शैतान !
कभी सहिष्णु, कभी असहिष्णु
राजनीति, कूटनीति के सब
हैं प्रावधान !
गीता-क़ुरान, वेद-पुराण
के होते
समाज में व्याप्त
अनैतिक व्यवधान!
कभी करते, कभी कराते
दख़ल पहल में
मानवता हैरान !
सही सीखते, सही सिखाते
धर्म ग्रंथ, धर्म-कर्म
और विज्ञान !
देश-प्रेम, विश्व-बंधुत्व की
पहल का
तर्कसंगत, नीति-संगत
विधि-विधान !
पहल करते, पहल कराते
काश गुरूजन, धर्म-गुरु
और
सामाजिक संस्थान !

[२] 'नकल और छल' [कविता]
करते नकल
खोकर
असल अक़्ल
कुछ चपल
करते पहल
प्रबल हलचल
चल-अचल, चंचल
सांस्कृतिक दख़ल
संस्कार को मसल
विकास के दलदल
सद्भावना के मरुस्थल
है यही अटकल
सबल सफल
दुर्बल असफल
धर्म-ग्रंथ निष्फल
हर पल छल
यही पहल दरअसल ।
*****************************************************************
५. आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी
विधवा उद्धार की पहल (आल्हा छंद)
=========================

सोच जवानी में थी मेरी, करूँ किसी विधवा से ब्याह।
बात किसी की मैं ना मानूँ, ना समाज की थी परवाह॥

बड़ी उमर ना बच्चे वाली, यही शर्त मेरी हर बार।
बरसों नहीं मिली मर्जी की, किस्मत थी मेरी बेकार॥

सधवा भी अब माँग भरे ना, फैशन की मारी हर नार।
विधवा जान सभी से पूछा, मिली मुझे सब से फटकार॥

विधवा को पहचानूँ कैसे, मैं जो ठहरा निपट गँवार।
विज्ञापन में खर्च हुए कुल, एक लाख चौबीस हजार।

मित्र पड़ोसी कहा सभी से, कमसिन विधवा ढूंढो यार।
इंतजार में उमर गुजरती, करना है विधवा उद्धार॥

कहा मित्र ने प्रौढ़ हो गये, उम्र तुम्हारी पछपन पार।
नहीं भाग्य में कमसिन विधवा, जो मिल जाये करना प्यार॥

आये कभी नसीबों वाली, ब्याह रचाकर तेरे द्वार।
हो जाये उद्धार तभी, जब, बीबी को पूरा अधिकार॥

लाओगे यदि बीस तीस की, क्या होगा सचमुच उद्धार ?
स्वर्ग लोक तुम पा जाओगे, फिर बन जाये विधवा नार॥

किसी विधुर से हो जाएगी, दोनों आँखें उसकी चार।
ब्याह तिबारा करके अपना, कर लेगी फिर से उद्धार॥

(संशोधित)

*****************************************************************

६. आदरणीया कान्ता राय जी
तुम पहल कैसे करोगे.....
==============
आन -शान के दर्प में ,अहंकार मोल चुकाना है
तुम पहल कैसे करोगे ,तुम्हें सर्वस्व बचाना है
प्रेम - कोमल ,प्राण - निर्मल ,तोल -मोल कर बिकना है
भाई रहा न बंधू कोई ,भाई चारा गुज़रा जमाना है
तुम पहल कैसे करोगे, तुम्हें सर्वस्व बचाना है
.
मन कामना पूर्ती में , है बहुत सी बाधाएँ
जन -कल्याण खाना पूर्ती , बेबस है राधाएँ
देश -द्वेष के नाम पर , व्यर्थ कौन ले विपदाएँ
शान्ति की अभिलाषा में ,छाया का माया रचाना है
तुम पहल कैसे करोगे , तुम्हें सर्वस्व बचाना है
.
पत्ता -पत्ता सब उड़ा , खड़ा रह गया बस ठूंठ है
काया सुध - बुध खो गयी , क्षण भर का सब रूप है
कोकिला की कुक रोये, कुसुम -कलियाँ रूप खोये
दारूण बिजली तड़क -तड़क , सब खाक हो जाना है
तुम पहल कैसे करोगे तुम्हें सर्वस्व बचाना है
.
कौन है अपना कौन पराया , कैसा यह ताना - बाना है
दुर्बल मन कवच चढाये , यह गठरी ढोते जाना है
प्रेम-समागम स्वप्न समान ,दुनिया खेल - खिलौना है
जीवन सारा खेल में बीता , खाली हाथ जमाना है
तुम पहल कैसे करोगे , तुम्हें सर्वस्व बचाना है
*****************************************************************
७. सौरभ पाण्डेय
छन्न पकैया (सार छन्द)
================
छन्न पकैया छन्न पकैया, बिटिया रचे कहानी
उँगली पकड़े पापा बोले, राज करेगी रानी !!

छन्न पकैया छन्न पकैया, गाँव-गाँव में चर्चा !

शुरू करो अभियान सफ़ाई, बचा रहेगा खर्चा !!

छन्न पकैया छन्न पकैया, ऐसी कोशिश कैसी ?
हुई नदी पर बातें लेकिन, वो जैसी की तैसी !!

छन्न पकैया छन्न पकैया, संसद में रण-भेरी
बिदके यार मना लो भइये, करो न अब तुम देरी

छन्न पकैया छन्न पकैया, कुछ तो जुगत भिड़ाओ
रूसा-रूसी छोड़ो, देखो, अब संवाद बनाओ !!

छन्न पकैया छन्न पकैया, कैसे पहल करूँ मैं ?
ऐसी सोच न हावी होवे, अपने कान धरूँ मैं !

छन्न पकैया छन्न पकैया, दौड़े दक्खिन घोड़ी !
बाप-पूत की पहल सुनो जी, क्या पूरी, क्या थोड़ी !!

छन्न पकैया छन्न पकैया, पहल करे मस्ताना !
नहीं बदलता कभी पड़ोसी, दिल से हाथ मिलाना !

छन्न पकैया छन्न पकैया, मैं भी अब सहभागी
छन्न पकैया की पिस्टल से मैंने रचना दागी !!
*****************************************************************
८. आदरणीया कल्पना भट्ट जी
पहल
======
कुछ कदम चल तो लेते
साथ न सही चल तो लेते
एक नयी पहल हो जाती
बात अपनी कुछ बन ही जाती।

कदम से कदम मिल ही जाते
साथ चलते सफ़र कट जाते
एक नयी पहल हो जाती
बात अपनी कुछ बन ही जाती।

घोर अँधेरा तब न डराता
रोज़ एक सवेरा सामने आता
एक नयी पहल हो जाती
बात अपनी कुछ बन ही जाती।

चेहरा तुम्हारा हम देख लेते
आँखों से तुमको हर लेते
एक नयी पहल हो जाती
बात अपनी कुछ बन ही जाती।
*****************************************************************
९. आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी
ग़ज़ल
========
क्या ज़रूरत है अब अदावत की
हो गई जब पहल मोहब्बत की

दोस्ताने की हो पहल कैसे
उनके लब पर है बात नफ़रत की

हाथ हम ने मिलाके कर दी पहल
आज़माइश है उनकी हिम्मत की

वो भला क्या करेगा जनता का
की है जिसने पहल सियासत की

बढ़ न पाएगा सिलसिला ए वफ़ा
गर पहल न हुई क़राबत की

तू मना खैर बाग़बान ए चमन
हो गई है पहल बग़ावत की

अब पहल देखने की कौन करे
हर अदा उनकी है क़यामत की

भर चुका कब का ज़ुल्म का प्याला
कीजिए कब पहल इनायत की

फ़िकरे अंजाम है भला किसको
हम ने कर दी पहल सदाक़त की

याद तस्दीक़ थे गिले किस को
आप ने की पहल शिकायत की
*****************************************************************
१०. आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी
फिर इस बार [ तुकांत ]
===============
तत्पर आतुर पहल लिए हम
मिलने को फिर से तैयार
सीना अपना है लो हाज़िर
खाने धोखा फिर इक बार I

जख्मों का तो काम है रिसना
रोयें क्यों उन पर हर बार
उन पर इक मैदान बनाकर
खेल सजाएँ फिर इस बार I

उस बच्चे से क्या बोलोगे ?
पापा की जो राहें तकता
हर फौजी गाड़ी के पीछे
पापा आये, कहकर भगताI

हर माँ से क्या कह पाओगे ?
सब्र करो, अब सब शुभ होगा
कोई गोली बम विस्फोटक
तेरी गोद को नहीं डसेगा I

बहुत हुआ, अब और नहीं बस
करें पहल हम ये कहने की
इतिहास पलटकर देखें फिर से
बीत चुकी है ऋतु सहने की I
*****************************************************************
११. आदरणीय लक्ष्मण धामीजी
गजल
====
दिया कोई जलाने की पहल कुछ आप ही करते
तमस मन का मिटाने की पहल कुछ आप ही करते /1

ये माना रूठना ऐसे हमारी भूल थी सचमुच
जरा सा पर मनाने की पहल कुछ आप ही करते /2

भले नादानियों में हम घटा पाए न दूरी को
मगर यूँ पास आने की पहल कुछ आप ही करते /3

जमाना तो रूलाने में बहुत मशगूल था हरदम
कभी हँसने हँसाने की पहल कुछ आप ही करते /4

बहुत की कोशिशें लेकिन हमें चलना नहीं आया
पकड़ उँगली चलाने की पहल कुछ आप ही करते /5

वो जालिम है उसे तो बस जलानी रोज बस्ती है
किसी का घर बचाने की पहल कुछ आप ही करते /6

रहे हम तो निरक्षर ही रखा ताना जबानों पर
कभी थोड़ा सिखाने की पहल कुछ आप ही करते /7

भगीरथ हम को तो होना नहीं किस्मत में था लेकिन
कोई गंगा बहाने की पहल कुछ आप ही करते /8

महज बदनामियों से डर न हम पहलू में आ पाए
कभी डर ये मिटाने की पहल कुछ आप ही करते /9
*****************************************************************
१२. आदरणीय नादिर ख़ान जी
पहल
====
(एक)
समस्याएं जन्म लेती हैं
समय के साथ
समस्याओं का हल निकलता है
बैठकों के साथ
समस्या का समाधान
हिंसा - प्रतिहिंसा नहीं....
संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन
विश्व युद्ध के बाद
गवाह है
एक सार्थक पहल का ....

(दो)
ज़िन्दगी ...
सिर्फ कोसते रहने का नाम नहीं
ज़िन्दगी में ज़रूरी है
देखना / परखना
हर मोड़ पर, हर दिशा में
अपनी अना की खातिर
कितनी दूर चले गए हम
अपनों से
कितना बढ़ गया फांसला
दोस्तों के बीच
और ....
कितनी बढ़ गयी दुश्मनी
एक आदम की संतानों में

ज़िंदगी में ज़रुरी है ...
अवलोकन
ज़रुरी है
सकारात्मक सोच
और इन सब के लिये
ज़रुरी है
सही समय में
सही दिशा में
की जाये पहल ....
*****************************************************************
१३. आदरणीय योगराज प्रभाकर जी
(सार छंद/छन्न पकैया)
==================
छन्न पकैया छन्न पकैया, कब सुनते हैं ताने
अपने ही दिल की सुन सुन कर, पहल करें दीवाने
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, बदल गए तकदीरें
धूल सनी दीवारों पर वो, लटके बन तस्वीरें
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, था तारीखी पन्ना
अनुयायी हरदम खबरों में, लेकिन गायब अन्ना
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, कुछ भी रहा न चंगा
भागीरथ भी माथा पीटे, तिल तिल मरती गंगा
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, बेमन हुई सफाई
भले मुहिम सरकारी ही थी, पहल गज़ब थी भाई
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, पहल अमन की जारी
लेकिन दुश्मन भी तो छोड़े, हथियारों से यारी
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, भोंकी पीठ कटारी
करगिल काण्ड दिया बदले में, पहल पड़ी थी भारी
.
छन्न पकैया छन्न पकैया, मंदिर मस्जिद छोड़ो
पहल करो ऐ वीर जवानों, टूटे रिश्ते जोड़ो
*****************************************************************
१४. आदरणीय सुशील सरना जी
उस पहल को जीती ...
==============
सच
उस निशा में
चमकते तारों ने अपनी किरणों से
मेरी देह का शृंगार किया था
मयंक मेरी बेबसी पर
घनों की ओट से
मंद मंद मुस्कुराया था
उस एक पल के लिए
मेरे कई जनम
एक साथ धड़कने लगे थे
अभिलाषाओं के तूफ़ान
अपने चरम पर थे
उन तूफानों से लड़ती
मन के सागर तट पर
अरमानों कई कश्तियाँ
एक साथ आ ठहरी थी
हौले हौले
कोई श्वास
श्वास में घुलने लगी
एक निरभ्र आसमान का
सुदीर्घ सम्मोहन
मुझे अचेत करने लगा
कम्पित अधरों की तृषा
किसे महक में समाहित होने को
आतुर होने लगी
केशों से लिपटी
जूही के पुष्पों की वेणी
बिखरने की प्रतीक्षा करने लगी
क्षण क्षण इक काल सा
प्रतीत होने लगा
एक निस्तब्धता
प्रतीक्षाक्षण का चरम पल
चेतना शून्यता की कगार पर
उफ्फ़
वो अवगुंठन में प्रतीक्षासेज पर
जन्मों की तृषा को तृप्त करती
स्नेहलिप्त छुअन की
उस पहली पहली पहल ने
मेरी मांग के सिन्दूर को
एक अर्थ दे दिया
मैं उस पहल के लम्हों के साथ
आज भी लेटी हूँ
और शायद
उन कस्तूरी से पलों में
उस पहल को जीती
जन्मों तक लेटी रहूंगी
*****************************************************************
१५. आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी
एक ‘पहल’ मेरी भी
============

पहल किया था अन्ना ने, वे भ्रष्टाचार मिटायेंगे
भ्रष्टाचार मिटाने को. वे लोकपाल को लायेंगे.
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या ?
पहल किया था संसद ने भी, लोक पाल बिल ले आया
ऐसा लोकपाल बिल जो, सब सांसद को मन भाया
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या?
पहल किया था जनता ने भी, बदल दिया सरकार को
कठपुतली को हटा दिया, बैठाया चौकीदार को
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या?
पहल किया 'जनसेवक'जी ने, झाड़ू स्वयम लगा देखी
देखा-देखी किया सभी ने, जनता ने फोटो देखी
सच में, साफ़ हुआ है क्या?
पहल किया जब ‘आप’ ने, जनता ने झट दिल्ली सौंपी
ऐसा बहुमत मिला उसे, बाकी सब की बज गयी पीपी
पर, दिल्ली कुछ बदली है क्या?
और कहाँ तक गिने, मिल गए भुजंग-चन्दन कुमार
जनता ने दी कुर्बानी, बन गयी मिली जुली सरकार
देखें, बिहार बदला है क्या?
पहल अभी भी जारी है, बहस अभी भी जारी है
संविधान गुण गाते गाते, हो हल्ला की बारी है
देखें, कुछ बदला है क्या? 

(संशोधित)

*****************************************************************
१६. आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी
पहल (गीत)
=======
जीवन में कब हमने चाहे सुख के शृंगायित सोन-महल
पर इतना तो हक़ बनता है थोडी हो जाये चहल-पहल
निस्पंद सदा रहता है जड़
गति ही तो है जीवन लक्षण
जिस दिन मिट जायेगी गतियां
चेतन माटी होगा उस क्षण
कुछ तो हरीतिमा हो ऐसी जिससे मन जाये विकल बहल
.
जग में मिलते जब दृग से दृग
संयमित कदम होते डगमग
भागा-भागा जग में फिरता
आतुर अकुलाया मानस-मृग
भावना नचाती मेधा को अनुरागी उर से निकल-टहल
.
संग्राम द्वन्द होता उनमे
जब तीक्ष्ण बाण मनसिज मारे
आघात-घात होते प्रतिपल
दोनों जीते, दोनों हारे
असिधारा पर जब हम चलते दुनिया जाती है दहल-दहल
*****************************************************************
१७. आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी
पहल कौन करे ?
===========
ऐसा कोई कारण नहीं था
जिससे दूरियाँ बढती रही
आपस में अभाव खटक रहा है
दुखी मै ही नहीं था,
दुखी वह भी था |
कशमकस चल रही थी
अंतर्मन में उसके थी
लालायित था मै भी
दुरिया मिटे बात करे, पर पहल कौन करे ?

इन निर्जन सी अखियों में
निगाहें थी अकुलाई सी,
खोल किवाड़ बार बार
देखे दूर क्षितिज तक
रस्ता देखे पथराई सी |

फिर एक दिन घन्टी बजी
मैंने कहा - हल्लो कौन
बोलो कौन ? पसरा सन्नाटा !
फिर दरवाजे पर आहट हुई
देखा- भाभी और भाई खड़े थे
पर होंठ उनके सिले पड़े थे !

मैंने कहा आओ भैया !
आ तो गया हूँ देख, सोचकर
छोटे बाप का मै ही सही,
बहुरिया चाय बना ला |
इसे तो रिश्ते की परवाह है नहीं |

बहूँ फफक फफक रो पड़ी !
ऐसी बात नहीं है भैया !
इनको भी कहा चैन था
नैना छलके, पीड़ा इनको भी थी पुरवाई सी,

बस पहल करने में डरते रहे
अतर्मन लिए सकुचाई सा |
पर दिल में भरी थी आशाएं
पल पल हो रही थी धूमिल सारी मुरझाई सी |
*****************************************************************
१८. आदरणीय मनन कुमार सिंह जी
ग़ज़ल
====
2122 2122
मेह जब होता सजल है,
नेह हो जाता नवल है।
मेह-नयनों के सहारे,
नेह-मन जाता बहल है।
ख्वाहिशों की दूब सूखी,
चाहती कुछ तो चपल है।
देह जो बेसुध पड़ी है,
ढूँढती फिर से पहल है।
शब्द कबसे कर रहा अब,
भाव भूले की टहल है।
मौन रुख अब माँग लूँ मैं,
मन अभी जाता मचल है।
देखता हूँ जब तुझे री,
हम तभी जाता टहल है।
जग चुका तब का सपन,तू
रागिनी, पहली गजल है।
होंठ सूखे,जीभ जलती,
लद गये हैं मेघ जल है।
भींग जाने दो अभी भी,
मान तेरा जो अचल है।
मानता हूँ मानिनी मैं,
प्यार तेरा तो अतल है।
मान जा री,मान तज कर,
आखिरी मेरी पहल है।
*****************************************************************
१९. आदरणीय जयनित कुमार मेहता जी
(ग़ज़ल)
=======
1222 1222 1222 1222
बढ़ाकर पाँव अपने, भीड़ से आगे निकलना था
पहल तुमको तो करनी थी,ज़माना जो बदलना था

शिखर पर कामयाबी के नहीं पहुँचा कोई यूँ ही
कि आँखों में तेरी पहले कोई सपना तो पलना था

बुज़ुर्गों की दुवाएँ ज़िन्दगी भर साथ रहती हैं
मिला मुझको सहारा,जिस जगह पर पग फिसलना था

सुखन ख़ुद राह दिखलाती,तुम्हारे साथ चलकर ही
रदीफ़ों-काफियों को बह्र में रखकर तो चलना था

नज़ारा वो भी क्या था 'जय',बड़े बेसब्र थे दोनों
शमा बुझने से पहले एक परवाने को जलना था
*****************************************************************

Views: 1443

Reply to This

Replies to This Discussion

आदरणीय सौरभ सर, परिचर्चा में सुझाव आये थे कि राजनीतिक पुरुषों के नाम यथा संभव न दियें जाएँ, अत: मैंने कुछ संशोधन करते हुए सांकेतिक शब्दों का प्रयोग किया है. अगर आपको उचित लगे तो संशोधित कर दें. रचना का संशोधित रूप नीचे लिख रहा हूँ .. सादर!

पहल किया था अन्ना ने, वे भ्रष्टाचार मिटायेंगे
भ्रष्टाचार मिटाने को. वे लोकपाल को लायेंगे.
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या ?
पहल किया था संसद ने भी, लोक पाल बिल ले आया
ऐसा लोकपाल बिल जो, सब सांसद को मन भाया
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या?
पहल किया था जनता ने भी, बदल दिया सरकार को
कठपुतली को हटा दिया, बैठाया चौकीदार को
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या?
पहल किया 'जनसेवक'जी ने, झाड़ू स्वयम लगा देखी
देखा-देखी किया सभी ने, जनता ने फोटो देखी
सच में, साफ़ हुआ है क्या?
पहल किया जब ‘आप’ ने, जनता ने झट दिल्ली सौंपी
ऐसा बहुमत मिला उसे, बाकी सब की बज गयी पीपी
पर, दिल्ली कुछ बदली है क्या?
और कहाँ तक गिने, मिल गए भुजंग-चन्दन कुमार
जनता ने दी कुर्बानी, बन गयी मिली जुली सरकार
देखें, बिहार बदला है क्या?
पहल अभी भी जारी है, बहस अभी भी जारी है
संविधान गुण गाते गाते, हो हल्ला की बारी है
देखें, कुछ बदला है क्या? 

आदरणीय, यथा निवेदित, तथा संशोधित 

शुभेच्छाएँ 

हार्दिक आभार सर!

परम आदरणीय सौरभ जी सादर

      नेट व्यवधान के बावजूद महोत्सव के सफल आयोजन एवं संकलन हेतु सादर बधाई  निवेदित है आदरणीय.    नेट की समस्या के कारण आयोजन का यथोचित आनंद नहीं उठा पाया किन्तु काव्य महोत्सव में सम्मिलित एवं संकलित रचनाकारों की रचनाओं को एक स्थान पर देखना और पढना मन को इक सुखद अनुभूति का अहसास करा रहा है.  संकलन के माध्यम से  यह सुअवसर उपलब्ध कराने हेतु आपका सादर आभार तथा समस्त रचनाकारों को उनकी प्रतिभागिता एवं उत्कृष्ट काव्य कृति हेतु हार्दिक बधाई. 

सादर धन्यवाद

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सत्यनारायण जी. 

सभी रचनाए सुंदर सभी को बधाई
लक्ष्मण धामी जी बहुत सुंदर गजल

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)
"आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।"
53 minutes ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"आदरणीय रवि साहब, सादर प्रणाम आपकी इस्लाह बहुत कमल की होती है, का का दोष समझ आया मुझे, पहला मिस्र…"
1 hour ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post किसे आवाज़ दूँ (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' भाई, आपकी नवाज़िश और मुहब्बत के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया!"
2 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post किसे आवाज़ दूँ (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, आपकी ज़र्रा-नवाज़ी और हौसला-अफ़ज़ाई के लिए बेहद शुक्रगुज़ार…"
2 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post छत पे आने की कहो- ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा साहिब, इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर आपको दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ।"
2 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' भाई, ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है। आपको कुछ सुझाव देना चाहता…"
2 hours ago
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post उरिझै कवनेउ मंद
"प्रणाम, डा0 प्राची सिंह जी,मैं यह बात पटल पर कई बार कह चुकी हूँ कि मैं किसी विधा  का ख्याल…"
5 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें!"
9 hours ago
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)

बह्र-221/2121/1221/212वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गयाआँखों से प्यार का मेरे मौसम चला गया[1]वो…See More
9 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post छत पे आने की कहो- ग़ज़ल
"आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । वर्षा रितु के हिसाब से उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
10 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२१/२लिखना न मेरा नाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र मेंआयेगा कुछ न काम तेरे ख्वाहिशों के…See More
10 hours ago
Neelam Dixit posted a blog post

गीत- नेह बदरिया नीर नदी बन

नेह बदरिया नीर नदी बनआंखों आंखों स्वप्न सधे हैंकाजल की काली रेखाएंसरिता पर ज्यूँ बांध बांधें हैं।नख…See More
10 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service