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ओबीओ लखनऊ चैप्टर की साहित्य-संध्या माह अप्रैल 2020 –एक प्रतिवेदन                 डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

सशक्त कोरोना (NOVEL CORONA) विषाणु ने पृथ्वी पर संपूर्ण मानव जीवन को संकट में डाल दिया है I वह न केवल मानव की शंका का मूलभूत कारण बना है अपितु उसकी रहन-सहन की शैली को भी बदलने में कामयाब हुआ है I स्थिति की भयावहता इतनी है कि मनुष्य आपस में मिलने से कतरा रहा है I आज अन्य सारे जीव आजाद घूम रहे है और मनुष्य अपने घर की गुफा में शंकित होकर बैठा है I बावजूद इसके उसकी फितरत नहीं बदली I तकनीक का सहारा लेकर वह परस्पर न केवल बतिया रहा है अपितु कांफ्रेंसिंग और परिचर्चायें भी कर रहा है I ऐसे गर्हित समय में ओबीओ लखनऊ चैप्टर के साहित्यिक दीवाने माह मार्च 2020 से नियमपूर्वक ऑन लाइन साहित्य संध्या की अलख जगाकर उस ऊष्मा और आँच का संरक्षण कर रहे है जो मानव और समाज दोनों की संजीवनी है I इस क्रम में माह अप्रैल 2020 की साहित्य संध्या ने लखनऊ में अवध की मशहूर शाम का एक दिलकश नजारा फिर पेश किया I इसमें सभी सहभागी अध्यक्ष थे और संचालक भी I कार्यक्रम के प्रथम चरण में मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज‘ के गीत – ‘बुद्धि के चातुर्य  से आपत्ति का करती दमन I आपके इस रूप का है अनुगमन शत-शत नमन।I’ पर सभी प्रतिभागी साहित्यकारों द्वारा चर्चा की गयी I इस चर्चा में कई तरह के विचार सामने आये I डॉ. अंजना मुखोपाध्याय, कवयित्री संध्या सिंह और गजलकार भूपेंद्र सिंह ने कविता के भाव पक्ष पर प्रकाश डाला I मृगांक श्रीवास्तव, डॉ अशोक शर्मा और आलोक रावत ‘आहत लखनवी’ ने गीत की रमणीयता और उसकी वस्तु की सराहना की i डॉ. शरदिंदु मुकर्जी और डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने गीत की भाव संपदा और उसके शिल्प पर विचार व्यक्त किये I कवयित्री नमिता सुंदर, कुंती मुकर्जी और आभा खरे ने  गीत के सौष्ठव को सराहा I परिचर्चा के अंत में मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ ने लेखकीय वक्तव्य देते हुए कहा कि गीत में नायिका के गुणों की कल्पना है, यदि ये देवी वंदना लगी आप सबको तो लिखना और सार्थक रहा क्योंकि प्रेम का उच्चतर रूप तो दर्शन ही है ।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में काव्य प्रस्तुतियाँ होनी थीं I इसका आगाज डॉ. अंजना मुखोपाध्याय ने अपने गीत ‘अंतर्लीन’ से किया I इस गीत में कवयित्री का चितन अतीत की पृष्ठभूमि पर आधारित है I जीवन के सघर्ष में विपरीत परिस्थतियों में स्वयं को संभालना , दुर्बल क्षणों में अपने को टूटने न देना और इस तरह की चुनौतियों से लड़ना शायद यही कवयित्री की परीक्षा रही है  i आज जब जीवन की ढलान है तब कवयित्री यह सोचती है कि शायद उसने अब तक अपने आत्मसंयम से जीवन को सफलतापूर्क जीने की जो कोशिश की है, वही आज उसकी संतुष्टि का सबसे बड़ा उपादान है I इस संतुष्टि ने कवयित्री के सारे परिताप हर लिए हैं - 

आफत की आंधी में

दूर जाना भी सीखा।

बीतने को है बवंडर

आओ समेटे संताप

संयम हमें निकाल लाया

दूर किया परिताप।।

 अगली प्रस्तुति में कवयित्री नमिता सुंदर नारी के भीतर चलते द्वंद्व को लेकर अपनी बात कहती हैं कि किस तरह वह दूसरों के जीवन को अधिकाधिक सुरभित और सोंधा  अहसास देने के लिय अपने अंतस में अजाने ही गरल संचित करती जाती हैं और वह भी उसके दुष्प्रभाव से बेखबर, निश्चिंत्य I

घर्र घर्र / बिना रूके घूमती है मथानी / मेरे भीतर / निरंतर./ माखन से सोंधे एहसास

/ परोस देती हूँ / अपनो में / गरल बे  आवाज  / बिला जाता है  / मेरे होने में.

 डॉ अशोक शर्मा मूलतः आशावादी कवि हैं I उन्हें फूलों से प्यार है I प्रकृति के उपादानों में वे अपना संगीत तलाश लेते हैं और यह बात उनके उपन्यासों में भी मिलती है I उन्होंने अपनी कविता ‘मुस्कान’ प्रस्तुत की और उसके अनेक कल्पनातीत पहलुओं को छुआ I अपनी कविता में जब वे प्रश्न करते है तो उसका उत्तर मानो उसी प्रश्न में पहले से ही अन्तर्हित रहता है I जैसे- मुस्कानें थोड़ी थोड़ी पागल होती हैं क्या ? मुस्कानें थोड़ी  उच्छृंखल होती हैं क्या ? मुस्कानें पंखुड़ियों सी कोमल होती हैं क्या ? मुस्कानें मृगछौनों  सी चंचल होती हैं क्या ? या फिर मुस्कानें अमृत कि कुछ छींटें होती हैं क्या ?

इसके बाद डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव की कविता ‘आजादी’ दरपेश हुयी I इसमें भी ‘कोरोना’ संकट का सांकेतिक चित्रण है I कवि की धारणा है कि मानव ने प्रकृति के साथ जो अत्याचार किया और जंगलों को काटकर पशु-पक्षी के आवास अदि छीन लिए उसी का दंड प्रकृति कोरोना महामारी के रूप में मानव प्रजाति को दे रही है I स्थितियाँ ऐसी हैं कि अब पशु-पक्षी कहीं भी विचरण के लिये स्वतंत्र हैं और आदमी अपने झोपड़ों या महलों-दुमहलों में दुबकने के लिए बाध्य है I कवि कहता है –आज / हो गए है / कितने ही तुंग शिखर बौने / कल तक जिनकी / लहराती थी पताका / वे सारे शेर / अपनी मांद में हैं कैद / अपनी जान बचाने की / जुगुत में अब कोई / नहीं चाहता / हाथ भी मिलाना / चुंबन, परिरंभण तक / सिमट गए है किताबों में / अब फिर से बनेगी / नई आचार संहिता 

 कवयित्री कुंती मुकर्जी ने दो कवितायें प्रस्तुत कीं I पहली कविता में एक अवसाद दिखता है I उद्दाम यौवन बीत चुका हैं I जीवन का सब रस प्रायशः मिल चुका है I मनुष्य स्वभावतः छोटी- छोटी चीजों में खुशियाँ तलाशता रहता है पर जीवन के ढलान में वह बीती खुशी उन उपादानों में भी नहीं मिलती जिनमे कभी आह्लाद खिल-खिल उठता था और फिर कुंती जी अचानक एक बड़ा संकेत करती हैं I कविता सहसा शिखरस्थ हो जाती है, जब वह कहती हैं –

क्षितिज भी तो रंग बदलने लगा है

सूरज की किरणें भी प्रखर होने लगी हैं

 मैं क्यों बाट जोहूँ सरदी की धूप की

ग्रीष्म की रात बहुत गर्म होने वाली है.

कुंती जी की दूसरी कविता अद्भुत है I अतीत की याद में वे अपने बीते पुराने और सुहाने  दिनों, खासकर दाम्पत्य जीवन को जिस अहसास से बार-बार जीती हैं, वह शृंगार की बड़ी उदात्त शैली है, जिसमे किंचित भी छिछलापन या मांसलता नहीं है, बस एक मौन मधि पुकार है I इसीलिए उनकी यह संवेदना प्रमाता के ह्रदय को अंदर तक भेद देने में समर्थ है, जब वह कहती है -

थोड़ी सी खुशी / थोड़ा सा गम ___/ मुट्ठी में समेट कर / समय से थोड़ा पीछे_ / आ बैठी हूँ यह देखने कि__" तुम जब होते हो / दिल के प्रांगण में / तब__/ मेरी दहलीज का रंग कैसा होता है...?

कुंती जी की कविता में निरूपित मंजिष्ठा राग की मर्यादा पर युवा कवि आलोक रावत ‘आहत लखनवी’ ने अघिक देर तक टिकने नहीं दिया I  अपनी गीत पंक्ति - ‘यद्यपि ये संकेत किया तुम और किसी के सहचर हो I’ से उन्होंने प्रमाता को ‘हरिद्रा राग’ की स्थिति में पहुंचा दिया जहाँ प्रेम या तो इकतरफा होता है या फिर उसका आलंबन कोई परकीया होती है I इस गीत को (16,14) चरणांत SS अर्थात ‘ककुभ छंद’ में रचने का प्रयास कवि ने किया है I आहत अपने गीत में अपनी प्रेयसी से मुखातिब हैं और उससे मनोदशा साझा करते हैं, जो अरण्यरोदन भी हो सकता है, परन्तु उनकी बयानगोई खासकर संयम हारने की बात में एक दिलकश सादगी जरूर है- 

संयम रखना था, संयम का बैर प्रेम से है प्यारे

प्रेम किया जितनों ने भी वो सभी प्रेम से हैं हारे

तो हम भी इस प्रेम कूप में अपना संयम डार गए

सिर्फ तुम्हारी एक झलक पे हम अपना दिल हार गए

 कवयित्री आभा खरे अनुभूतियों को शब्दों में बाँधने का हुनर जानती हैं I उनकी कविता में नारी-पीड़ा का बड़ा ही स्वाभविक चित्रण है I एक नारी जिसके सामने - विकल्प कई थे / पर उसने चुना / स्वयं में बचा लेना ...स्वयं के होने को / कि वो भूल चुकी थी अपने होने को .और जिसे भुला दिया गया स्टोर रूम की अलमारी की तरह I हिदू धर्म की प्राक्तन मर्यादा या परंपरा में नारी की गति और नियति एकमात्र उसका पति है I पति उसके लिए ईश्वर है I पर वह कैसा ईश्वर है इसकी पड़ताल कवयित्री अपनी कविता में इस प्रकार करती हैं –

वैसे भी जिसे सारी दुनिया / ईश्वर कहती है / वो ईश्वर सदा उसके लिये अजनबी ही रहा  / और जिसके लिये / कहा गया था कभी  / कि  / " अब यही तेरा ईश्वर है" / जिसे इंसान कहलाने के लिये भी / कई जन्म कम पड़ते .

 भारतीय दर्शन से अनुराग रखने वाले विचारक मृगांक श्रीवास्तव की प्रसिद्धि उनकी चुटीली रचनाओं से है, जिनकी मारक क्षमता से कभी हम ‘आह’ कर उठते है तो कभी ‘वाह’ I यह उनकी हास्य रसात्मक क्षमता ही है I कुछ उदाहरण देखिये -

1-वैसे तो चायनीज माल,

कम टिकाऊ डुप्लीकेट होते हैं ।

पर दुष्ट का कारनामा देखो,

वायरस असली भेजता है ।

2- वो सोशल डिस्टैसिंग रखती हैं,

तो भी दिल बहकता है।

पहले उनकी खुशबू आती थी,

अब सैनिटाइजर महकता है।

 गजलकार भूपेन्द्र सिंह ने बह्रे-हज़ज मुसम्मन सालिम पर गजल सुनाई, जिसके अरकान हैं- मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन और वज्न 1222 -1222 -1222 -1222 है I इसके चंद अशआर जो दिल को छू लेते हैं, वे इस प्रकार हैं -

बलन्दी पर खड़ा है जो उसे ऊँचा नहीं समझें,

अगर क़द ही न ऊँचा हो तो फिर ऊँचाइयाँ कैसी.

 नहीं हैं सामने तो क्या ख़यालों में तो हर पल हैं,

जब उनकी याद हरदम साथ है तन्हाइयाँ कैसी. 

 इरादा है अगर दिल में तो फिर पूरा भी करना है,

अब इसमें वक़्त की हालात की दुश्वारियाँ  कैसी.

 डॉ शरदिंदु मुकर्जी की संवेदना भी कोविड -19 से प्रभावित हुई और उन्होंने अपनी ‘कोरोना’ नामक कविता में सांग-रूपक का निर्वाह करते हुए इस कठिन स्थिति में संयम और विश्वास को बनाये रखने का संदेश दिया I इस कविता में जीवन, जिजीविषा और आशावाद के स्वर बड़े ही जीवंत और मुखर हैं I यथा-

इस बाग की मिट्टी

फिर स्वस्थ होगी

महामारी का दौर भी बीतेगा,

नए दिन की नई रोशनी में

जगमगाएँगे नए फूल

बिखरेगा  नया सौरभ,

युद्ध जारी रखें

निडर होकर, नि:स्वार्थ होकर

 मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ एक बड़ा मोहक गीत लेकर आये I इस गीत को (12,8) चरणांत में SIS के प्रचलित मीटर पर रचने का प्रयास हुआ है I गीत भाषा और भाव के स्तर पर प्रभावित करती है I कमर के लिए लंक का प्रयोग करना कवि के भाषा सामर्थ्य को प्रकट करता है I इस कविता के कुछ बंध तो अद्भुत हैं , उनमे से एक यहाँ निदर्शन स्वरुप प्रस्तुत है –

कंकणों से  कलाई  भरी  जब  गई,

लंक भी कुछ लचक गुनगुनाने लगी।

मीन-जल,प्राण-तन से  लिपटने लगे,

भक्ति भगवान के  गीत गाने लगी।

 

पाप की नाशिनी जाह्नवी में नहा,

उम्र पूरी  हमारी  अमल हो  गई।

सूखते पोखरों में सुमन खिल उठे,

काल की खुरदराहट कँवल हो गई।

 अंतिम प्रस्तुति कवयित्री संध्या सिंह की एक गीत रचना थी जो सोलह सममात्रिक चतुष्पद में रची गयी है I संध्या जी ने तुकांतता तो नहीं बरती पर मात्राओं पर उनका अधिकार शत-प्रतिशत बना रहा I इसमें कहीं अरिल्ल तो कहीं डिल्ला छंद की झलकियाँ मिलती हैं I भाव और शिल्प से सज्जित ऐसा गीत एक समकालीन रचनाधर्मी की कलम से आया, यह कवियित्री की अन्यतम सफलता है I एक निदर्शन यहाँ प्रस्तुत है -

सागर में भावों की लहर

मगर शब्द सब तट पर ठहरे

उड़ा दूर तक मन पाखी सा

धरे रहे सब तन के पहरे

 

देह भले हो पातालों में 

सपनों की हद अम्बर जैसी

उम्र भले जल की धारा हो

मंजिल की जिद पत्थर जैसी

 औपचारिक रूप से ओबीओ लखनऊ चैप्टर की साहित्य-संध्या निशागमन का पथ प्रशस्त करने के लिए धूमिल तो अवश्य हुयी पर मेरा मन कुंती जी की कविता की भाव-भूमि पर ही अटका रहा- ‘तब__/ मेरी दहलीज का रंग कैसा होता है...?’ मैं सोचने लगा-

प्रणय कुछ भी हो

नहीं हो सकता

वह राग

 

कामना, समर्पण

आलिंगन परिरम्भण

और मांसलता

ये हो सकते है

शारीरिक आवेग 

पर यह न तो

अनुराग है और न राग

 

वह तो

होता है उदात्त

देवधुनि धारा की भांति

निर्मल और स्वच्छ

निष्कलंक 

अकलुषित और निष्पाप

 

राग  

एक स्पन्दन है

अनुभूति है

वह क्रिया नहीं

परिपाक है I   (सद्य रचित)

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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