• कुंडलिया. . . . .

    कुंडलिया. . . .किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।आँखें   उसकी    वेदना, नित्य   करें    साकार ।।नित्य  करें   साकार ,  दर्द  यह  कहा  न  जाता ।उसे  भूख  का  दंश , सदा  ही   बड़ा   सताता ।।पत्थर   पर  ही  पीठ , टिकाई   हरदम   इसने  ।भूखी काली रात , भाग्य  में  लिख  दी  किसने ।।सुशील सरना /…

    By Sushil Sarna

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  • ग़ज़ल

       ग़ज़ल2122  2122  212 कितने काँटे कितने कंकर हो गयेहर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये रास्तों  पर  तीरगी  है आज भीशह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                   आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वेहुक्म आया घर से बेघर हो गये जो गिरी तो साख गिरती ही गईअच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये सहमी-सहमी हर…

    By Ashok Kumar Raktale

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  • दोहा पंचक. . . क्रोध

    दोहा पंचक. . . . क्रोधमानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध । सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम । बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।हर लेता इंसान का, क्रोधी  सदा विवेक । मिटते  इसके ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम । घातक…

    By Sushil Sarna

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  • सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

    २२१/२१२१/१२२१/२१२ * ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१। * भूले हैं सिर्फ  लोग  न  सच को निहारना हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२। * आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३। * बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर सच को…

    By लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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  • सुखद एकान्त है या है अकेलापन

    तारों भरी रात, फैल रही चाँदनीइठलाता पवन, मतवाला पवनतरू तरु के पात-पात परउमढ़-उमढ़ रहा उल्लासमेरा मन क्यूँ उन्मनक्यूँ इतना उदास खुशी ... पिघलती हुई मोम-सीजाने क्यूँ उसे हमेशाहोती है जाने की जल्दीआती है, चली जाती हैआ..ती  है आलोप हो जाती है कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकररुक गया है मेरी छत पर मानोकैसा…

    By vijay nikore

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  • सदस्य टीम प्रबंधन

    नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ

    सूर्य के दस्तक लगाना देखना सोया हुआ है व्यक्त होने की जगह क्यों शब्द लुंठित जिस समय जग अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो कुंद होती दिख रही हो वेग की गति और कर्कश वक्त केंचुल छोड़ता होसाधना जब शौर्य का विस्तार चाहे उग्र का पर्याय तब खोया हुआ है धूप के दर्शन नहीं हैं, धुंध है बस व्योम के उत्साह पर कुहरा जड़ा है…

    By Saurabh Pandey

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  • न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

    १२२/१२२/१२२/१२****सदा बँट के जग में जमातों में हम रहे खून  लिखते  किताबों में हम।१। * हमें मौत  रचने  से  फुरसत नहीं न शामिल हुए यूँ जनाजों में हम।२। * हमारे बिना यह सियासत कहाँ जवाबों में हम हैं सवालों में हम।३। * किया कर्म जग  में  न ऐसा कोई गिने जायें जिससे सबाबों में हम।४। * न मंजिल न मकसद न…

    By लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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  • दोहा पंचक. . . शृंगार

     बात हुई कुछ इस तरह,  उनसे मेरी यार । सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।। मौसम की मनुहार फिर, शीत हुई उद्दंड । मिलन ज्वाल के वेग में, ठिठुरन हुई प्रचंड । मौसम  आया शीत का, मचल उठे जज्बात । कैसे बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।। स्पर्शों की आँधियाँ, उस पर शीत अलाव । काबू में कैसे रहे, मौन मिलन का…

    By Sushil Sarna

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  • देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)

    पहले देवता फुसफुसाते थेउनके अस्पष्ट स्वर कानों में नहीं, आत्मा में गूँजते थेवहाँ से रिसकर कभी मिट्टी मेंकभी चूल्हे की आँच में, कभी पीपल की छाँव मेंऔर कभी किसी अजनबी के नमस्कार में सुनाई पड़ते थेतब हम धर्म मानते नहीं जीते थेगुरुद्वारे की अरदास से लेकर मस्जिद की अजान तकएक अदृश्य डोर थीजो कभी किसी…

    By धर्मेन्द्र कुमार सिंह

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  • आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

    २१२२/२१२२/२१२२ कर तरक्की जो सभा में बोलता है बाँध पाँवो को वही छिप रोकता है।। * देवता जिस को बनाया आदमी ने आदमी की सोच ओछी सोचता है।। * हैं लगाते पार झोंके नाव जिसकी है हवा विपरीत जग में बोलता है।। * जान  पायेगा  कहाँ  से  देवता को आदमी क्या आदमी को जानता है।। * एक हम हैं कह रहे हैं प्यार…

    By लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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