दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक ।।निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच ।पर्दा गिरते ही मिटें , झूठे सभी प्रपंच ।।आदि - अन्त के मध्य को, मंच करे साकार ।इस जीवन के सत्य…
बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से पागल जनता, चुप रहिएपूँजीपति को सारी सुविधा, चुप रहिए प्रश्न किया तो कह देंगे गद्दार सभीअवतारी है अपना राजा, चुप रहिए राजसभा में न्याय खड़ा है घुटनों परकर दीजै फूलों की वर्षा, चुप रहिएसच को फाँसी पर लटकाया…
एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।लबों पर ठहरी…
समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल कुछ यूँ है कि कट जाए हो जैसा भीकहीं गर हो बुरा तो भी ये अनुभव ही कराता है।। बड़ा बलवान होता है समय इसकी बड़ी बातेंकोई कितना भी सँभले पर निवाला हो ही जाता है।। समय को जिन्दगी में जो समझ ले है समय उसकाअजब…
माँ यह शब्द नहींं केवलइस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।माँ यह विषय अलौकिक है परब्रह्म जीव के जैसा ही। माँ इस सृष्टि की अनुपम है कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।माता बच्चों की होती है पालक सर्जक शुभ सुखराशी। माँ की गोदी में पलते हैं अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।हैं…
बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जातीं ? अस्मिता और सवाल उठाने की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप द्रौपदी बन क्यों नहीं जातीं ?अंधे ताज और विवेक तर्क की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप गांधारी बन क्यों नहीं…
पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,फिर हमें परतों में दबाकर,हमारा 'रक्त' मत…
आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत मनुष्य को संवेदनहीन कर रहा है. यह मोबाइल का युग जिसने सबको अपनी गिरफ्त में ले रखा है जिससे नवजात बच्चे तक अछूते नहीं हैं . इसी को ध्यान में रखकर मैंने मुख्य शीर्षक मशीनी मनुष्य के अंतर्गत कई कविताओं को…
कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता हैपता नहीं किसी को फर्क पड़ता है या नहीं पर बेटी के लिए बहुत बहुत पड़ जाता है अचानक बड़ी हो जाती है वो समझाने लग ज़ाती है स्वंय कोमाँ के होते जिस घर आँगन गली चौबारे में चहक लेती…
एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता हैप्यार रूठता नहींप्यार सूख जाता हैवह पहचाना नहीं जाता तबपतझड़ में पत्तों की तरहपीला, सूखा ... कुम्लाहयाएक असहनीय दर्दशब्द गले में अटकेअधरों तक आए, भारीऔर भारीकुछ भी कहने में असमर्थरिश्ते के मुड़े पन्नों…