दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम…
दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा अनुराग ।।प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध…
बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ से कहो फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे सम्विधान तो पर लोकतंत्र व्यस्त हुआ भेदभाव में।२। * करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को फिर से जिला दिया है उसे ताव-ताव में।३। * खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव…
अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार । काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।। अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद । शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।। अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात । कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की…
२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े शरीर आप ही सम्मान हो गये।१। * गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२। * घर में बहार नल से जो आयी गरीब के पनघट हर एक गाँव के वीरान हो गये।३। * भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर सारे ही फर्ज, कौम…
दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान । सोच रहा वह इश्क में, क्या पाया नादान ।।आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम । नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार । जिस्मानी…
दोहा सप्तक. . . . नैननैन द्वन्द्व में नैन ही, गए नैन से हार ।नैनों को मीठी लगे, नैनों से तकरार ।।नैनों की तकरार है, बड़ा अजब आनन्द ।हृदय पृष्ठ पर प्रेम के, अंकित होते छन्द ।।नैनों के संवाद की, होती मोहक नाद ।नैन सुने बस नैन के, अनबोले संवाद ।।नैनों की होती सदा, मौन सुरों में बात ।नैनों की मनुहार…
2122 1212 22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस कीहो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में मुझ से मुझ ही को दूर करने को आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में तुम ख़यालों में आ जाते हो यूंचीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में चाट कर के अफीम मज़हब कीमरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में ए ग़रीबी…
२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।*दूर नफ़रत का जंजाल करले अगरदो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।*खींचने में लगे पाँव अपने ही अबव्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।*तब मनुज देवता हो गया जान लोलोक मन में अगर कढ़ सके…
दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ । वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में संबंध । आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान । संबंधों को लीलती…