• दोहा पंचक - - - - शोखी

    दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत ।।अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल रात ।जिसका डर था हो गई, शर्मीली सी बात ।।बारिश में अच्छा लगे, नजरों को संवाद ।इच्छाओं का मन करे, मिल कर फिर अनुवाद ।।हल्की- हल्की जब पड़ी, यौवन पर बौछार ।प्रणय निवेदन में…

    By Sushil Sarna

    0
  • चौपाइयाँ

    दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ तुम्हारा। हरपल था सुरभित अति प्यारा।।मन   साजन  यह  कैसे  भूले। साथ-साथ   तुम  हम  थे   झूले।।*तुम   थे  झूले   थाम   कलाई। मैं   साजन   कितनी  शरमाई।।तुम  जब-जब  थे  पींग बढ़ाते। हम   इक  दूजे  में   खो…

    By Ashok Kumar Raktale

    2
  • बरसात

    बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते खड़के भीगे लरजेचिड़िया सहमी बादल गरजे,कुत्ते दुबके गैया भागीइक नन्हीं सी गुड़िया जागीसुनकर उसकी तेज रुलाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई सड़कों से बह निकला पानीराहगीरों ने छतरी तानी,छप-छप करते कदम बढ़ातेठोकर…

    By Ashok Kumar Raktale

    4
  • दोहा सप्तक. . . .मंच

    दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द  अतिरेक ।।निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच ।पर्दा गिरते ही मिटें , झूठे सभी प्रपंच ।।आदि - अन्त के मध्य को, मंच करे साकार ।इस जीवन के सत्य…

    By Sushil Sarna

    4
  • रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

    बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से पागल जनता, चुप रहिएपूँजीपति को सारी सुविधा, चुप रहिए प्रश्न किया तो कह देंगे गद्दार सभीअवतारी है अपना राजा, चुप रहिए राजसभा में न्याय खड़ा है घुटनों परकर दीजै फूलों की वर्षा, चुप रहिएसच को फाँसी पर लटकाया…

    By धर्मेन्द्र कुमार सिंह

    3
  • दास्तां

    एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।लबों पर ठहरी…

    By रोहित डोबरियाल "मल्हार"

    0
  • समय

    समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल कुछ यूँ है कि कट जाए हो जैसा भीकहीं गर हो बुरा तो भी ये अनुभव ही कराता है।। बड़ा बलवान होता है समय इसकी बड़ी बातेंकोई कितना भी सँभले पर निवाला हो ही जाता है।। समय को जिन्दगी में जो समझ ले है समय उसकाअजब…

    By Awanish Dhar Dvivedi

    0
  • माँ

    माँ यह शब्द नहींं केवलइस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।माँ यह विषय अलौकिक है परब्रह्म जीव के जैसा ही। माँ इस सृष्टि की अनुपम है कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।माता बच्चों की होती है पालक सर्जक शुभ सुखराशी। माँ की गोदी में पलते हैं अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।हैं…

    By Awanish Dhar Dvivedi

    0
  • बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

    बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जातीं  ? अस्मिता और सवाल उठाने की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप द्रौपदी बन क्यों नहीं जातीं  ?अंधे ताज और विवेक तर्क की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप गांधारी बन क्यों नहीं…

    By amita tiwari

    1
  • गन्ने की खोई

    पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,फिर हमें परतों में दबाकर,हमारा 'रक्त' मत…

    By आशीष यादव

    1