• प्यार से भरपूर हो जाना- ग़ज़ल

     मापनी १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ बहुत आसान है धन के नशे में चूर हो जाना, बड़ा मुश्किल है दिल का प्यार से भरपूर हो जाना.   अगर वो चाहता कुछ और होना तो न था मुश्किल,मगर मजनूँ को भाया इश्क में मशहूर हो जाना.  भले दो गज जमीं थी गॉंव में अपने मगर खुश थे, नगर में रास कब आया हमें मजदूर हो जाना.  कभी तो आदमी को…

    By बसंत कुमार शर्मा

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    ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं(ग़ज़ल)

    2122 2122 2122 212ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहींअपनी सांसों से मेरी फिर गुफ़्तगू होती नहींगर तड़प होती न मेरे दिल में तुझको पाने कीमेरी आँखों में, मेरे ख्वाबों में तू होती नहींउम्र गुज़री है यहाँ तक के सफ़र में, दोस्तो!पर ये वो मंज़िल है, जिसकी जुस्तजू होती नहींये जहाँ गिनता है बस कुर्बानियों…

    By शिज्जु "शकूर"

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  • रानी अच्छन कुमारी

           भारतवर्ष के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान को अपने समय का सबसे बड़ा योद्धा माना जाता है| जिसकी वीरता के किस्से उस समय पूरे भारत में गूंज रहे थे| पृथ्वीराज चौहान अजमेर राज्य का स्वामी बना तो उसके चाचा पृथ्वीराज को चौहान राज्य का वास्तविक अधिकारी नहीं मानते थे। इसी कारण पृथ्वीराज के चाचा अपरगांग्य…

    By PHOOL SINGH

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  • महब्बतों में मज़ा भी नहीं रहा अब तो (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

    बह्रे मुजतस मुसम्मन मख्बून महज़ूफ मक़्तूअ'1212 / 1122 / 1212 / 22क़रार-ए-मेहर-ओ-वफ़ा भी नहीं रहा अब तोमहब्बतों में मज़ा भी नहीं रहा अब तो [1]जहाँ से मुझको गिला भी नहीं रहा अब तोमलाल इसके सिवा भी नहीं रहा अब तो [2]ख़बर जहाँ की मुझे पूछते हो क्या यारोमुझे कुछ अपना पता भी नहीं रहा अब तो [3]जिसे सँभाल के…

    By रवि भसीन 'शाहिद'

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  • काश कहीं से मिल जाती इक जादू की हाथ घड़ी (ग़ज़ल)

    काश कहीं से मिल जाती इक जादू की हाथ घड़ीमैं दस साल घटा लेता तू होती दस साल बड़ीमाथे से होंठों तक का सफर न मैं तय कर पायारस्ता ऊबड़-खाबड़ था ऊपर से थी नाक बड़ीप्यार मुहब्बत की बातें सारी भूल चुका था मैंकिस मनहूस घड़ी में फिर तुझसे मेरी आँख लड़ीलाइलाज है रोग मगर कम हो जायेगी पीड़ागर तू माथे पर रख दे लब की…

    By धर्मेन्द्र कुमार सिंह

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  • ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

    रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों परकोई अंकुश नहीं लगाता इन सरमाया दारों पर।मजदूरों का जीवन देखो कितना मुश्किल होता हैबिस्तर पास नहीं जब होता सो जाते अख़बारों पर।भूक ग़रीबी ज्यों की त्यों क्यों तख़्त नशीं कुछ तो बोलोदोष मढ़ोगे कब तक आख़िर पिछली ही सरकारों पर।वक़्त नहीं है पास किसी के सबको अपनी आज…

    By सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'

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  • दो लघु-कवितायें — डॉo विजय शंकर

    सच्चे मन से ईश्वरमंदिर से अधिकअस्पतालों मेंयाद किया जाता है l जो दृश्य सिनेमा हाल मेंमन को दुखी , द्रवित करअँधेरे में,आँखे नाम कर जाता हैवही दृश्य हमें दिन कीरौशनी में आस पासदिखाई नहीं दे पाता है ,आँखें नम कहाँ  से होंबाहर की दौड़ भाग मेंपसीना तक सूख जाता है। .....1.आज हर आदमी ज्ञानी है ,हर ज्ञानी…

    By Dr. Vijai Shanker

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  • रोटी.....( अतुकांत कविता)

    रोटी का जुगाड़ कोरोना काल में आषाढ़ मास में कदचित बहुत कठिन रहा आसान जेठ में भी नहीं था. पर, प्रयास में नए- नए मुल्ला अजान उत्साह से पढ रहे थे... दारु मृत संजीवनी सुरा बन गयी थी सरकार के लिए भी, कोरोना पैशैन्ट्स के लिए भी और, पीने वालों का जोश तो देखने लायक था, सबकी चाँदी थी...! आषाढ़ तो बर्बादी…

    By Chetan Prakash

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  • ग़ज़ल -पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको

    था सब आँखों में मर्यादा का पानी याद है हमको पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको।भले खपरैल छप्पर बाँस का घर था हमारा पर वहीं पर थी सुखों की राजधानी याद है हमकोवो भूके रहके ख़ुद महमान को खाना खिलाते थे ग़रीबों के घरों की मेज़बानी याद है हमकोहमारे गाँव की बैठक में क़िस्सा गो सुनाता था वही हामिद के…

    By सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'

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  • रोटी

    जीवित रहने के लिए जीव,रहता है जिस पर निर्भर।आटे से बनती है जो औरगोल गोल जिसकी सूरत।।सही पहचाने नाम है उसका,कहते हैं सब रोटी।मम्मी के हाथों की रोटी,बड़े स्वाद की होती।।भूखे को मिल जाए जो रोटी,तो त्रप्ति उसको होती।आत्मनिर्भर बनने के लिए,कमानी पड़ती है रोजी रोटी।।भूल ना जाना तुम ये बात,जब भी पकाओ तुम…

    By Neeta Tayal

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