" आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती अच्छी लघुकथा आपने लिखी है. किन्तु कुछ बातें जो मुझे लगता है सुधार होना चाहिए. जैसे लघुकथा का प्रथम…"
"आदाब। रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी रचना का मर्म और अनकहे के एक पहलू को स्पष्ट करती समीक्षा हेतु और प्रोत्साहन हेतु तहेदिल बहुत-बहुत…"
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी । इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों में आम बात है।
सहयोग राशि किसी अधिकारी के दबाव में दे भी देते हैं तो वे समय का महत्व जानते हैं और…"
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया।
मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते- पत्ते।।........मौसम बदले कपड़े-लत्ते....वाह ! बहुत सुन्दर.
आमों से बाजार भरेंगे,दूजे सब फल खूब जलेंगे।
उनको…"
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥
आम लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में गाने॥
अब आया है चैत महीना। दिन भर टपके खूब पसीना।।
आम लगे हैं सब बौराने। और ख़ास की ईश्वर…"
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर स्पष्ट कहे जाना लघुकथा का चरित्र नहीं है। इस लघुकथा में हमारे विद्यालयों की दशा एक विसंगति है और चपरासी…"