*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये हैं अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ तुम्हारा। हरपल था सुरभित अति प्यारा।।मन साजन यह कैसे भूले। साथ-साथ तुम हम थे झूले।।*तुम…See More
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
" आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है. किन्तु थोड़ी बारिश में ही नगरों की व्यवस्था ध्वस्त हो गई है. सादर "
yesterday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय, अशोक रक्ताले साहब, नमस्कार ! लेकिन यह कैसी "रिमझिम रिमझिम बारिश" है कि नदी नाले उफना जाते है, सड़कों पर पानी बहने लगता है और तो और "…"
yesterday
Shyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता प्रदान की है. आपकी इस अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आपका हृदय से आभार. सादर "
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल हो चला है.
मानव मन की आकांक्षाएँ सदैव अतृप्त रहती हैं. तभी तो मानवीय विकास का प्रमुख कारण बनती हैं.…"
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.
कई दोहे तो एकदम से चकित् अकर दे रहे हैं -
यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।कहीं कहकहे गूँजते,…"
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा अपनी नन्हीं-नन्हीं विस्फारित आँखों से बरसात की अनवरत बनी झड़ियों में आस-पास के गतिविधियों…"