मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।कभी उलझ…See More
जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी मनमर्जी थोपी जाती है नहीं चली तो तोड़ें काठी अहंकार मद भरे विचारों उड़ें हवा में वे गर्दा से .. हठ…See More
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय
//*फिर को क्यों करने से "क्यों " का दोहराव होरहा है। इसकी जगह यह कैसा रहेगा सुझाइए -//
मेरा आशय फिर और क्यों के बीच अदला-बदली से था…"
"आदरणीय जी सादर प्रणाम - अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की हर परत को कुरेद डाला है । एकांत साकार हो गया । इस बेहतरीन 👌 प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई सर । "
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा। निम्न पंक्तिओं को खास दाद देता हूँ।//धूप के दर्शन नहीं हैं,धुंध है बसव्योम के उत्साह परकुहरा जड़ा…"