"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है। दोहों का तुक अच्छा है। अधिकांश दोहों के तृतीय चरण में गेयता बाधित हुई है।
भारत गैस जो न मिले…"
"आदरणीय अशोक भाईजी
सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर परिस्थिति जूझने तैयार रहते हैं। यह संकट तो अल्पकालीन है।
हार्दिक बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिए ।"
"किल्लत सारे देश में, नहीं गैस की यार
नालियाँ बजबजा रही, हर घर औ हर द्वार
गैस नहीं तो क्या हुआ, लोग नहीं मजबूर
नफरती आग से भला, ईंधन क्या हुजूर
पहली मार ग़रीब को, पड़ती है सरकार
लकड़ी लेकर जा रहा, भारत…"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी विस्तृत टिप्पणी और सुझाव के लिए हार्दिक आभार।
निश्चित तौर पर दोहे कमजोर और चित्र की मूल भावना से इतर हो गये हैं। इसका कारण यह भी है कि इनको समय नहीं…"