"शह्र में झूठ का कुछ ऐसा असर है साईं
अब तलक सच की नहीं ख़ैर ख़बर है साईं
याद है या कोई रूहानी असर है साईं
काम करता ही नहीं कुछ भी हुनर है साईं
भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है
अब किसी बात का भी…"
"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"
राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है साईं
जो झुका रहता हो बस बोझ वो सर है साईं
रीढ़ जिस में नहीं वो क्या ही कमर है…"
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है साईंपग नहीं अपने पड़े छाँव जिधर है साईं।२।*वासना ही तो चढ़ी सबकी नजर है साईंरूह का प्यार …"
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। इस प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। हर शेर में सार्थक विचार हैं।
/कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं
चढ़ती हैं आदमी में जो कुर्सी की फितरतें।२।/
मेरे ख़्याल से…"