"आपने खत लिखा उसका ही असर है साईंछोड़ दी अब बुरी संगत की डगर है साईं
धर्म के नाम बताया गया भाई चारापर भरा अब दिलों में खूब ज़हर है साईं
देश हित जान दी जिसने वो हमारा हीरो नाम उसका ही ज़माने में अमर…"
"ग़ज़ल पर अपनी बारीक़-नज़र से टिप्पणी करने के लिए आपका आभार आदरणीय तिलकराज जी।
एक प्रश्न है: इस बह्र में प्रारम्भिक 2122 को 1122 पर लेने की छूट बताई जाती है। उसी के अनुसार 'सुना' को लिया…"
"भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है अब किसी बात का भी होश किधर है साईं। इस पर एक उदाहरण देखें भूल जाउँगा उसे, खुद से कहा करता हूँ पर ये कर पाउँ मुझे होश किधर है साईं
उसकी यादों का मैं ये बोझ उठाऊं…"
" सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं" राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है साईं प्रथम पंक्ति को बह्र की दृष्टि से देखें। एक विकल्प ‘सुनते आये हैं कि मुश्किल ये डगर…"
"कोई सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं अब तो दीदावर न कोई न वो दर है साईं
दीदावर का प्रयोग बह्र में नहीं है।
महज़ होकर रहे अहबाब हैं माँ - बाप सभी है नहीं गौर तो उनकी वो असर…"
"आरंभ से गिरह तक सभी शेर बहुत अच्छे हुए। उर्दू के दृष्टिकोण से 9वें शेर में 'बहर' तथा 10 वें शेर में 'उमर' के प्रयोग पर आपत्ति हो सकती है जबकि सामान्य बोलचाल में ये शब्द ऐसे ही…"
"शह्र में झूठ का कुछ ऐसा असर है साईं
अब तलक सच की नहीं ख़ैर ख़बर है साईं
याद है या कोई रूहानी असर है साईं
काम करता ही नहीं कुछ भी हुनर है साईं
भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है
अब किसी बात का भी…"
"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"
राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है साईं
जो झुका रहता हो बस बोझ वो सर है साईं
रीढ़ जिस में नहीं वो क्या ही कमर है…"