ग़ज़ल2122 2122 212 कितने काँटे कितने कंकर हो गयेहर गली जैसे सुख़नवर हो गये रास्तों पर तीरगी है आज भीशह्र-से जब गाँव के घर हो गये आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि…See More
दोहा पंचक. . . . क्रोधमानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।हर लेता इंसान का, क्रोध सदा…See More
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन की समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दुओं का भविष्य में ध्यान रखा जायेगा । आपका मार्गदर्शन बहुमूल्य है । हार्दिक आभार आदरणीय जी "
२२१/२१२१/१२२१/२१२ * ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१। * भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२। * आदत पड़ी हो झूठ की…See More