"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान भी स्पष्ट किये हैं, यह उचित भी है। यह अवश्य है कि अपने मंच पर इस छंद पर आपने आदरणीय अम्बरीष जी…"
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आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की मान्यता और आजतक इस क्रम में हुई विवेचनाओं को शाब्दिक कर रहा है।
साँसों का आरम्भ है, जीवन का…"
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आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक पंक्ति शीर्षक को सार्थकता से विवेचित कर रही है।
संग खुशी के वेदना, सब जीवन के रंग…"
२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ जाना हो गया है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता फिर दोस्त होंगे क्यों भला आदमी का आदमी से बैर जब।२। * दुश्मनो की क्या जरूरत है कहो रक्त के रिश्ते …See More
"अंत या आरंभ
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ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल फिर अंतअंततः है अंत होना, जो हुआ आरंभदेखते हैं नित्य फिर भी, है हृदय में दंभ
प्रथम पग से पूर्व रखना,…"
"दोहा पंचक . . . आरम्भ/अंत
अंत सदा आरम्भ का, देता कष्ट अनेक ।हरती यही विडम्बना , जीवन भरा विवेक ।।
साँसों का आरम्भ है, जीवन का प्रारम्भ ।अंत दिशा में जीव को, झोंके उसका दंभ…"
"दोहा मुक्तक. . . . .
आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख ।दिखता है आरम्भ पर, ओझल रहता अन्त -वैसी मिलती जिंदगी, जैसे …"