"दोहा छंद
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वार्ता निष्फल शांति की, जारी है फिर युद्ध।
कमी तेल औ’ गैस की, राहें सब अवरुद्ध॥
चूल्हे के दिन आ गये, वहीं धधकती आग।
मजा दे रही रोटियाँ, दाल भात औ' साग॥
फूँक…"
कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता हैपता नहीं किसी को फर्क पड़ता है या नहीं पर बेटी के लिए बहुत बहुत पड़ जाता है…See More
एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता हैप्यार रूठता नहींप्यार सूख जाता हैवह पहचाना नहीं जाता तबपतझड़ में पत्तों की तरहपीला, सूखा ...…See More