"यह रचना #अनुष्टुप_छंद में रचने का प्रयास किया है। हिन्दी में इस छंद का प्रयोग कम है लेकिन मेरा मानना है कि यह छंद अतुकांत या मुक्त-छंद कहने वालों के लिए भी श्रेष्ठ विकल्प हो सकता है।
विधान:…"
"झूठों ने झूठ को ऊँचे, रथ पर बिठा दिया
और फिर उसे खूब, सुंदर सा सजा दिया
पहिये भी गवाहों के, उसमें सौ जड़े गए
फ़र्ज़ी सुबूत सौ-दो सौ, रस्सों में बुने गए
ऊपर की पताका में, अफवाह बुलंद थी
झूठ…"
"शुक्रिया मनजीत जी, बहुत आभार। ।
//तरही मिसरे पर आपका शेअर कमाल है।// हा हा हा, तिलकराज जी हमारे बड़े भाई और बहुत सम्माननीय हैं। ज़रा सी ठिठोली कर ली बस। "