आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं। स्थिति हो विषम भी तो घरें धीर निज हिय , राह अपने लिए जो स्वयँ ही बनाते हैं।। रण ही है जीवन का नाम दूजा मान…See More
चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा विषैली हो गयी, रहा नगर या गाँव। बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।। * बदनामी से नाम नित, जोड़़ रहे सब…See More
"आ. भाई तिलक राज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।
9, 10 शेर के विषय में आपके कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। प्रयास करता हूँ कि कोई विकल्प बन सके। सादर.."
" आदरणीय तिलक राज कपूर साहब, आप मेरी प्रस्तुति तक आये, आपका आभारी हूँ।
// दीदावर का प्रयोग बह्र में नहीं है //
'अब तो हौसला न कोई न वो दर है साईं '. सही होगा, कृपया…"