"2122, 1212, 112**बिसलरी पा नदी को भूल गयाहर अधर तिस्नगी को भूल गया।१।*पथ की हर रौशनी को भूल गयासाथ ही रहबरी को भूल गया।२।*जिसके गम में खुशी को भूल गयाक्या गजब वह मुझी को भूल…"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।
आपकी व भाई अखिलेश जी की आपत्तियों के अनुसार सुधार किया है मार्गदर्शन करने की कृपा करें -
*भरता इससे पेट…"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त चित्र को आपने पूरे मनोयोग से परखा है तथा अंतर्निहित भावों को शाब्दिक किया है ।
हात्दिक बधाई
अलबत्ता, कुछेक पंक्ति में सार्थक तुकान्तता नहीं हो पायी…"
"आदरणीय अशोक भाईजी, आपने प्रस्तुति के माध्यम से प्रदत्त चित्र को पूरी तरह से शाब्दिक किया है -
एक पाँव है चप्पल धारी। दूजे सहती ठण्डक भारी
चित्र में समय को बाँधने का आपका प्रयास…"
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का हार्दिक धन्यवाद
परन्तु, रचना सोलह मात्राओं खे चरण के बावजूद पद्य के मानको पर निबद्ध नहीं है. तुकान्तता पर काम करने की आवश्यकता है.
विश्वास है, आप…"