चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा विषैली हो गयी, रहा नगर या गाँव। बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।। * बदनामी से नाम नित, जोड़़ रहे सब…See More
"आ. भाई तिलक राज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।
9, 10 शेर के विषय में आपके कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। प्रयास करता हूँ कि कोई विकल्प बन सके। सादर.."
" आदरणीय तिलक राज कपूर साहब, आप मेरी प्रस्तुति तक आये, आपका आभारी हूँ।
// दीदावर का प्रयोग बह्र में नहीं है //
'अब तो हौसला न कोई न वो दर है साईं '. सही होगा, कृपया…"
"आपने खत लिखा उसका ही असर है साईंछोड़ दी अब बुरी संगत की डगर है साईं
धर्म के नाम बताया गया भाई चारापर भरा अब दिलों में खूब ज़हर है साईं
देश हित जान दी जिसने वो हमारा हीरो नाम उसका ही ज़माने में अमर…"
"ग़ज़ल पर अपनी बारीक़-नज़र से टिप्पणी करने के लिए आपका आभार आदरणीय तिलकराज जी।
एक प्रश्न है: इस बह्र में प्रारम्भिक 2122 को 1122 पर लेने की छूट बताई जाती है। उसी के अनुसार 'सुना' को लिया…"