महीन है विलासिनी
महीन हैंं विलासिनी तलाशती रही हवा, विकास के कगार नित्य छांटते ज़मीन हैं.
ज़मीन हैं विकास हेतु सेतु बंध, ईट वृन्द, रोपते मकान शान कांपते प्रवीण हैं.
प्रवीण हैं सुसभ्य लोग सृष्टि को संवारते, उजाड़ते असंत - कंत नोचते नवीन हैं.
नवीन हैं कुलीन बुद्ध सत्य को अलापते, परंतु तंत्र - मंत्र दक्ष काटते महीन हैं.
मौलिक व अप्रकाशित
रचनाकार.... केवल प्रसाद सत्यम
Shyam Narain Verma
Jun 18, 2016
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
मात्रिकता की कसौटी पर आपकी रचना सफल है भाई केवल प्रसाद जी. हार्दिक बधाइयाँ.
लघु-गुरु की आवृति में अनंगशेखर वृत्त की रचना सरल नहीं है. प्रमाणिका छन्द के आगे,पंचचामर छन्द और इसके आगे अनंग शेखर दण्डक या वृत्त. इस हेतु आपके प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ.
लेकिन पदों की संप्रेषणीयता यदि सहज नहीं है तो फिर रचना पुनर्प्रयास चाहती हैं. यदि चारों पंक्तियों के निहितार्थ भी स्पष्ट हो सके तो यह उचित होगा.
शुभेच्छाएँ
Jun 19, 2016
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
बहुत सुन्दर छंद प्रवाह बद्ध बहुत अच्छा लगा हार्दिक बधाई केवल प्रसाद जी
Jun 21, 2016
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
आदरणीय केवल भाई , विधान का ज्ञान नही है मुझे पर रचना पढ़ने मे बहुत सुन्दर लगी । हार्दिक बधाइयाँ ।
Jun 21, 2016
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय गिरिराज भाईजी और आदरणीया राजेश कुमारी जी, मैंने भाई केवल प्रसाद जी से इस प्रस्तुति को लेकर प्रश्न किया है. भाई केवल प्रसाद जी का दुबारा आना अभी नहीं हुआ है. अतः, वही प्रश्न आप दोनों से भी मैं सादर कर रहा हूँ. मुझे इस प्रस्तुति का निहितार्थ स्पष्ट नहीं हो रहा है. निहितार्थ न सही, आप दोनों ने इस प्रस्तुति के वाचन से जो कुछ समझा है और तदनुरूप बधाइयाँ दी हैं, उस बिना पर शब्दार्थ ही स्पष्ट कर सके, तो महती कृपा होगी.
सादर
Jun 21, 2016
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
आदरणीय सौरभ भाई , मै व्यक्तिगत तौर अपने विषय मे ही कह रहा हूँ , और ये उचित भी है --
मै भी रचना को समझ नही पाया हूँ , लेकिन मै ये कहने लायक खुद को नहीं समझता । ऐसी प्रतिक्रिया का अधिकार उसी का होता है जो हर एक रचना को समझ पाने की हैसियत रखता है । ऐसी प्रतिक्रिया दे कर जवाब आयी प्रति प्रतिक्रिया का जवाब मै नही दे सकता । वस्तुतः मै खुद मे अभी वैसी समझ नही पाता । इसीलिये मै केवल यह कह के रिक गया कि पढ़ने में रचना अच्छी लगी । ( जिसका आशय गेयता और प्रवाह से है )
ऐसी स्थिति में प्रतिक्रिया को और विस्तार देना मेरे लिये मुश्किल था , और है । पूरी तरह समझ कर तौल के प्रतिक्रिया देने के योग्य मै अभी नही हूँ ।
सादर
Jun 21, 2016
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
आ० सौरभ जी ,आपने बिलकुल सही कहा इस छंद में मैं भी अर्थ ढूँढती रही सब ऊपर से निकल गया इसी लिए सिर्फ प्रवाह अर्थात गेयता को लेकर प्रतिक्रिया दी.चूंकि पंचचामर छंद पर मैंने भी कलम चलाई है किन्तु ये कुछ अलग लगा मन में सोचा भी की इस छंद पर भी प्रयास होना चाहिए सिर्फ इस बात को लेकर सुन्दर छंद कहा है अर्थ की बाबत आप कह ही चुके थे जिसका उत्तर आ० केवल जी दे ही देंगे और देना चाहिए भी इस लिए दुबारा नहीं लिखा |किन्तु ये सच है की इस का अर्थ हम भी सुनना चाहेंगे जो हमारे दिमाग में भी घुस नहीं रहा है |
Jun 21, 2016
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय गिरिराज भाईजी और आदरणीया राजेश कुमारीजी, आप दोनों की जवाबी टिप्पणियों से स्पष्टतः घोर निराशा हुई है. मन मंच पर पाठकीयता के स्तर और इसके प्रति समझ को लेकर वस्तुतः बहुत दुखी है आज.
हिन्दी को एक भाषा के तौर पर व्यापक होने के पूर्व क्षेत्रीय एवं आंचलिक भाषाओं की पद्य रचनाएँ ही उपलब्ध थीं और वही हिन्दी के प्रारम्भिक काल में हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व भी करती थीं. ऐसा कई बार होता कि विद्यापति (मैथिली), मीरां (राजस्थानी), तुलसी (अवधी), सूर (व्रज), भारतेन्दु (व्रज) आदि-आदि की रचनाएँ अलग-अलग क्षेत्रों के भाषा-भाषियों के लिए सहज समझना कठिन क्या समस्या हुआ करती थी. तो लोग उनके अर्थ पूछते थे कि नहीं ? यदि मुझे कोई रचना किसी कारण से समझ में नहीं आयी, तो, भले ही वह अत्यंत उच्च कोटि की हो, क्या उसका रसास्वादन करने से मुझे वंचित रहना चाहिए ? या मुझे खुल कर नहीं पूछना चाहिए ? यदि बिना जाने बूझे मैं उसे ’अच्छा’ या ’सुन्दर’ कहता हूँ, तो यह मेरी कैसी पाठकीयता है ? इससे किसी रचनाकार या इस मंच का कैसा भला हो रहा है ?
आदरणीया राजेश कुमारी जी, मैंने इस प्रस्तुति पर अपनी पहली टिप्पणी में ही कह दिया है, कि ’लघु-गुरु’ की विभिन्न आवृतियों में प्रमाणिका, पंचचामर और अनंगशेखर छन्द होते हैं. तो फिर छन्द को लेकर कोई असमंजस होना नहीं चाहिए था. और छन्द के गण या उसकी मात्रिकता तो मात्र फ़ॉर्मेट हुआ करती हैं. असली काव्य-सृजन तो भाव, उनके निरुपण हेतु शब्द और उनकी सार्थक तथा तार्किक व्यवस्था से हुआ करता है. यदि शब्दों का भावजन्य अर्थ ही स्पष्ट न हो तो वह कैसी रचना है ? क्या इस पर प्रश्न करना किसी रचनाकार के साथ बिगाड़ करना होगा ?
हरिगीतिका हरिगीतिका हरिगीतिका हरिगीतिका .. यह कैसी पंक्ति है ? अवश्य ही, ऐसी आवृति हरिगीतिका छन्द की शुद्ध मात्रिकता है. लेकिन क्या ऐसी कोई पंक्ति किसी छान्दसिक रचना की पंक्ति हो सकती है ? कुछ भी फ़ॉर्मेट में होगा तो हम उसके ’वाचन-प्रवाह’ (?) पर वाह-वाही कर देंगे ?
इस मंच पर हम वरिष्ठ सदस्य हैं. हमारे ऊपर दायित्व है. इसका हम व्यक्ति-निर्पेक्ष हो कर निर्वहन करें. ऐसा करना ही मेरी समझ से सही साहित्य-संवर्धन होगा, सही रचनात्मकता होगी.
सादर
Jun 22, 2016
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
आदरणीय सौरभ भाई , आपकी निराशा का कारण मै बना , इसका ये जान के ह्र्दय दुख से भर गया , आप वो आखरी इंसान हैं जिन्हे मै अपनी वजह से निराश और उदास देखना चहता था । कारण आपका ज्ञान , आपकी लगन , मंच के प्रति आपके भाव और आपसे मिली आत्मियता भी है । पर क्या करूँ ?
अभ्यास शिल्प सिखा सकता है , समझ नही दे सकता , समझ तो अनुभव देता है , और ये जग जाहिर है कि साहित्यिक अनुभव मेरा न के बराबर है । मै कभी अपनी कमियों के लिये तर्क नही देता हूँ , मै मानता हूँ , और यथा संभव सुधार करता हूँ , लेकिन सुधर सकने वाली कमजोरियाँ जियादा तर शैल्पिक ही रहीं है ।
उम्र या वरिष्ठता समझादारी का सबूत नहीं होतीं । कई जगहों पर ( फोन मे भी ) मैने अपनी अनुभव हीनता और अज्ञानता आपसे स्वीकार की है , केवल इसी लिये कि मुझे आपकी उम्मीदें मेरी ताक़त से जियादा लगती थीं । मुझे इस बात की पीड़ा है कि मै फिर भी आपको निराशा से नहीं बचा सका ।
'' जिस समय मुझे कार्यकारिणी मे लिया जा रहा था और फोन से आ. योगराज भाई ने सूचना दी तो मेरा जवाब क्या था , अगर न बातायें हों तो कभी पूछियेगा , वही बात मैने अभी उन्हे भोपाल प्रवास में भी उन्हे फिर से कही है , आपसे विनती है कि , आप उनसे ज़रूर पूछियेगा ।'' कुछ बातें आम न हों तो जियादा अच्छा है , इसलिये बाक़ी कभी आपसे फोन मे बात करूँगा । सादर
Jun 22, 2016
Ashok Kumar Raktale
आदरणीय केवल प्रसाद जी की रचना जब पोस्ट हुई थी मैं भी लपका था यहाँ. किन्तु दो तीन बार पढने पर भी जब कुछ समझ नहीं आया तो खाली हाथ लौट गया. मुझे इंतज़ार था किसी ऐसी प्रतिक्रिया का जो कथ्य को समझ पाने में मेरी मदत करे. अब रचनाकार का इंतज़ार है. सादर.
Jun 22, 2016