दो गजलें- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

(एक)

२१२/२१२/२१२/२१२

जब अंधेरों के आंगन उजाले गये
न्याय के भी बदल रोज पाले गये।१।
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पांत से नीच कह जब निकाले गये
मस्जिदें उठ गयीं सब शिवाले गये।२।
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झूठ को ताज देकर जगत में सभी
सत्य दुत्कार  घर  से निकाले गये।३।
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यूं सियासत ने सपने दिखाये हमें
हाथ आये थे जो भी निवाले गये।४।
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क्या कहा सांकलों द्वार के कान में
चाबियां  रह  गयीं  और  ताले गये।५।
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होना आसान था ज़िन्दगी का सफर
साथ पांवों  के  अपने  तो छाले गये।६।
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राह भटके नहीं फिर 'मुसाफिर' कहीं
दीप   गौधूलि   के   रोज   बाले  गये।७।


(दो)

212/212/212/212


सोच  जीवन  रहा  दोपहर  देख लूं
मौत कहती हैं जीवन सफर देख लूं।१।
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आंखें रोती  हैं  बूढ़ी  सहारा छिना
इस कयामत को कैसे ठहर देख लूंं।२।
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खाक होना है मुझको चमन के लिए
बस तुम्हारी दुआ का असर देख लूं।३।
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मैंने आंखों के सागर निचोड़े विवश
कैसे जलता हुआ एक नगर देख लूं।४।
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खाक होना है मुझको तो हो जाऊंगा
बस चमन को दुआ का असर देख लूं।५।
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जो बनाता महल सो के फुटपाथ पर
उसके हिस्से में भी एक घर देख लूँ।६।
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भाग्य ऐसा कहां मैं तुझे ऐ ! सनम
देवताओं  सा  होते  अमर  देख लूं।७।
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सब से चर्चे  सुने  तो  कहा  चांद ने
आज आंगन में उसके उतर देख लू।८।
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'