जब अंधेरों के आंगन उजाले गये न्याय के भी बदल रोज पाले गये।१। * पांत से नीच कह जब निकाले गये मस्जिदें उठ गयीं सब शिवाले गये।२। * झूठ को ताज देकर जगत में सभी सत्य दुत्कार घर से निकाले गये।३। * यूं सियासत ने सपने दिखाये हमें हाथ आये थे जो भी निवाले गये।४। * क्या कहा सांकलों द्वार के कान में चाबियां रह गयीं और ताले गये।५। *
होना आसान था ज़िन्दगी का सफर साथ पांवों के अपने तो छाले गये।६। * राह भटके नहीं फिर 'मुसाफिर' कहीं दीप गौधूलि के रोज बाले गये।७।
(दो)
212/212/212/212
सोच जीवन रहा दोपहर देख लूं मौत कहती हैं जीवन सफर देख लूं।१। * आंखें रोती हैं बूढ़ी सहारा छिना इस कयामत को कैसे ठहर देख लूंं।२। * खाक होना है मुझको चमन के लिए बस तुम्हारी दुआ का असर देख लूं।३। * मैंने आंखों के सागर निचोड़े विवश कैसे जलता हुआ एक नगर देख लूं।४। * खाक होना है मुझको तो हो जाऊंगा बस चमन को दुआ का असर देख लूं।५। * जो बनाता महल सो के फुटपाथ पर उसके हिस्से में भी एक घर देख लूँ।६। * भाग्य ऐसा कहां मैं तुझे ऐ ! सनम देवताओं सा होते अमर देख लूं।७। * सब से चर्चे सुने तो कहा चांद ने आज आंगन में उसके उतर देख लू।८। * लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
दो गजलें- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
19 hours ago
(एक)
२१२/२१२/२१२/२१२
जब अंधेरों के आंगन उजाले गये
न्याय के भी बदल रोज पाले गये।१।
*
पांत से नीच कह जब निकाले गये
मस्जिदें उठ गयीं सब शिवाले गये।२।
*
झूठ को ताज देकर जगत में सभी
सत्य दुत्कार घर से निकाले गये।३।
*
यूं सियासत ने सपने दिखाये हमें
हाथ आये थे जो भी निवाले गये।४।
*
क्या कहा सांकलों द्वार के कान में
चाबियां रह गयीं और ताले गये।५।
*
होना आसान था ज़िन्दगी का सफर
साथ पांवों के अपने तो छाले गये।६।
*
राह भटके नहीं फिर 'मुसाफिर' कहीं
दीप गौधूलि के रोज बाले गये।७।
(दो)
212/212/212/212
सोच जीवन रहा दोपहर देख लूं
मौत कहती हैं जीवन सफर देख लूं।१।
*
आंखें रोती हैं बूढ़ी सहारा छिना
इस कयामत को कैसे ठहर देख लूंं।२।
*
खाक होना है मुझको चमन के लिए
बस तुम्हारी दुआ का असर देख लूं।३।
*
मैंने आंखों के सागर निचोड़े विवश
कैसे जलता हुआ एक नगर देख लूं।४।
*
खाक होना है मुझको तो हो जाऊंगा
बस चमन को दुआ का असर देख लूं।५।
*
जो बनाता महल सो के फुटपाथ पर
उसके हिस्से में भी एक घर देख लूँ।६।
*
भाग्य ऐसा कहां मैं तुझे ऐ ! सनम
देवताओं सा होते अमर देख लूं।७।
*
सब से चर्चे सुने तो कहा चांद ने
आज आंगन में उसके उतर देख लू।८।
*
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'