अनसुने अनकहे के बीच

                        

अनसुने अनकहे के बीच

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कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बात

उसपर अनकहे एहसासों का भार

अजीब-सी बेचैन बेकाबू धड़कन का

तकलीफ़-भरा भयानक शोर ...

पन्नों पर उतर तो आते हैं यह

पर भरमाया घबराया मन

इनकार भरा

भार कोई हल्का नहीं होता

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पगलाई अन्दरूनी हवाएँ

खयालों-सी वेगवान

झकझोरती आसमानी तूफ़ान बनी

लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ टकराते

सूखे पेड़ों-से छूटे पत्तों की तरह

आढ़ी-टेढ़ी लकीरों को बेतहाशा समेटते

लुढ़क जाती है स्याही

रात अँधेरी बिछ जाती है

लावारिस लफ़्ज़ों की रूह पर

काले कफ़न की तरह

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टूटा-अधटूटा सिफ़र होता

असंग आत्म-विश्वास

बिखर  चुका  है सब  भीतर

परेशान थका-खड़ा देखता हूँ मैं

बदनसीब  कहे-अनसुने  जज़्बातों को

कभी  मृत  हुए अनकहे  एहसासों को

पुरानी  खबर  की  तरह...

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-- विजय निकोर

 

(मौलिक व अप्रकाशित))